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Sunday, February 5, 2017

कविता -- * पूँजी निवेश *

        देखो !
       नन्हा सा बच्चा
       स्कूल जाने की उम्र है जिसकी --
       ' सैनिक ' की दुकान में बर्तन धो रहा है ।
       एक गिलास टूटता इधर
       दस तमाचा खाता उधर --
       महीने भर की पगार सै हरजाना अलग ।
       ' यूनिसेफ ' के कार्ड उसके नाम
       बाल श्रम कार्यशाला उसके नाम
       चाचा नेहरू का 'बालदिवस' भी उसीके नाम ।
       नहीं मालूम उसे --
       मानवाधिकार के हिमायत करने वाले
       कितनी बुलन्द आवाज उठाते हैं
       उसकी बेहतरी के लिए ;
       कितने एनजीओस है उसके लिए
       कितनी योजनाएं ऐलान होती हैं
       हर बालदिवस पर उसीके नाम
       किन्तु हाँ --
       चाय की दुकान पर
       पूँजी निवेश की चर्चा सुनते सुनते
       उसमे भी जग गई
       उम्मीद की किरण;
       उसे भी यकीन होने  लगा है
       कि आजादी के पचहत्तर वर्ष पर
       उसका अपना मकान होगा,
       उसका  अपना एक दुकान भी होगा
       और वह बन जाएगा
       भारत की युवा शक्ति ।
       
       4. 02. 2017

Saturday, February 4, 2017

कविता : * वहीं का वहीं *

  मनोहर साहू गुजर गए
  बेटा हरिहर मालिक बन गए ।
         तिलपट्टी दलपट्टी मूँगफलीपट्टी वहीं
         बन गए अब चिकी पर है सब वही ।
  कालू मोची बूढे हो गये
  जूनियर लालू वहीं बैठ गए ।
         दूध में पानी पिताजी टोका करते
         धंधे की कसम केवल खा लेते;
  पचास साल का बेटा मै अब टोकता
  केवल का बेटा धंधे की ही कसम खाता ।
          कामवाली को मम्मी अक्सर डांटती
          देर व नागा फिर भी वह करती ;
  कामवाली आज भी नागा करती
  मेरी पत्नी आये दिन उसे डांटती ।
          भिखारियों को वे डांट भगाते
           उनके बच्चे भी कहते आगे बढो ।
   बाबू सस्पेंड होते दस रुपए के लिए
   बाबू सस्पेंड हुए अभी दस हजार के लिए ।
          मंत्री धन बटोरता था चुपके चुपके
          मंत्री धन बटोरता अब बेशर्मी से ।
   दहेज वाली सायकिल पिता चलाते
   दफ्तर जाते देर जल्द घर लौटते ;
           दहेज वाली मोटरसाइकिल बेटा चलाता
           जल्दी घर लौट कर टहलने जाता ।
   पडोसी जोरों से ' बिनाका ' सुनता
   पढाई छोड मैं कान लगाता ;
           पडोसी अब जोरो से स्टीरियो बजाता
          पढाई छोड बेटा मेरा डान्स करता ।
   सत्ता का जंग पर चढा और रंग
   पक्ष विपक्ष चलते हैं संग संग ।
           चुनावी मुद्दे सारे वहीं के वहीं
           जनता की उम्मीदें भी वहीँ के वहीँ ;
   कहते हैं लोग जमाना बदल गया
   कहता है कवि सब वहीं तो रह गया ।।

Tuesday, November 22, 2016

21-11-2016 का रेल हादसा जिसने सबका दिल दहला दिया

21- 11- 2016 आधी रात तीन  बजे देश के ज्यादातर लोग सो रहे थे पटना इन्दौर एक्सप्रेस के चौदह डिब्बे पटरी से उतर गए ।
सुबह सुबह नींद टूटते ही इस खबर को सुनना एक सदमे से कम नहीं । पहले बीस मौतों की खबर फिर चालीस पचास नब्बे बढते बढते डेढसौ घायलों की संख्या दो सौ या और ज्यादा ।पूरा देश दहल गया । ट्रेन यात्रा सभी करते हैं इसलिए सब स्थिति को अनुभव कर रहे थे ।
टीवी पर वह दृश्य अत्यंत हृदय विदारक था, तकलीफ सही नहीं जा रही थी ।अभी भी मन भा है सोच सोच कर सिहर उठता हूँ ।
शायद इस वर्ष का यह सबसे मार्मान्तिक घटना है ।रेल हादसे पूर्व में हुए, होते रहते हैं,कभी रे पटरी के कारण,कभी धुन्ध तो कभी किसी की लापरवाही के कारण । हादसे होते हैं, अफरा तफरी, नेता लोग दुख व्यक्त करते, मुआवजा दिया जाता, कौन नेता अस्पताल गया कौन नहीं गया या बाद में गया ,राजनीति होती फिर सब भूला दिया जाता ।
               वक्त की मांग है कि हम इस हादसे को विगत वर्षों में हुए तमाम हादसों से जोडे और कारणों का विश्लेषण करे, समाधान ढूंढे ,बल्कि उस पर काम करे । लगभग चालीस हजार किलोमीटर रेल पटरियां अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही है, बढती भीड और कोच की संख्या में बढोतरी के कारण वे भार सहन नहीं कर पाती । उन्हें बदलने की जरूरत है । चौदह पंद्रह हजार मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग है जिस पर फाटक लगाना अनिवार्य है । फाटक न रहने कारण हर साल सैकडों हादसे होते हैं । सारे सिग्नल नये आधुनिक तकनीक के सिग्नल से रिप्लेस होने की जरूरत है ।
आंकडे कम ज्यादा हो सकते हैं मगर कारण यही है । इस पर युद्ध स्तर पर काम होने की सख्त होने की जरूरत है । हमें आधारभूत बातों पर ध्यान देना चाहिए न कि वाई फाई, हाई फाई पर ।

Sunday, October 25, 2015

पानी पानी

पेड़ लगे
बंग्लादेश में
बादल आया
हिन्दुस्तान में।

बारिश हुई
चेरापूंजी में
चाय उगी
बागान में।

चाय पी
राम ने
चाय पी
रहिम ने।

पानी खिचा
माटी ने
पानी मिला
पानी से।

रोक लगाया
तामिल ने
रोक लगाया
कर्नाटक ने।

आग  लगी
भाषाओं में
मारे गये
दंगों  मे।

हल्ला हुआ
संसद में
हल्ला हुआ
चौराहों पे।

वोट बने
नेताओं के
नाक कटी
देश की।


Monday, October 19, 2015

हाल अपना ठीक है



हाल अपना ठीक है -

हाल अपना ठीक है 
पोखरण पे मतभेद है 
देहरी मैं मनभेद है 
महँगाई का खेद है 
हाल अपना ठीक है 
हरी बोल बोल हरी 

नमक बिना दाल है 
माछ बिना बंगाल है 
प्याज बिना तरकारी है 
नाही कुछ दरकारी है 
हाल अपना ठीक है 
हरी बोल बोल हरी 

बिना चरित मिनिस्टर है 
बिना गणित एस्ट्रोलोजर है
बिना टाई ऑफिसर है 
बिना वेतन टीचर है 
हाल अपना ठीक है 
हरी बोल बोल हरी 

बिना पूछे कवि है 
बिना पूजे रवि है 
छाया ही छवि है 
छवि ही विप्लवी है 
हाल अपना ठीक है 
हरी बोल बोल हरी 

मन में तो डर है 
तन किन्तु निडर है 
अपना ही देश है 
अपने ही लोग है 
हाल अपना ठीक है 
हरी बोल बोल हरी 

कानो में रुई है 
ज़ुबान पे सुई है 
आँखों पे पट्टी है  
धोखे की टट्टी है  
हाल अपना ठीक है 
हरी बोल बोल हरी 

अयोधा की हिस्ट्री है
रामसेतू बनी मिस्ट्री है 
कैसे हुई सृष्टि है 
किसकी कुदृष्टि है 
हाल अपना ठीक है 
हरी बोल बोल हरी 

Sunday, October 18, 2015

मौत आती मेरे पीछे



मौत आती  मेरे पीछे 


मौत आती  मेरे पीछे
ज़िन्दगी मेरे पीछे पीछे।।

अगर कहीं मैं जी गया
कहीँ बुढ़ापा देख लिया
नाना बनकर कहानियाँ सुनाई
बचपन कहीँ मेरा लौट आया।
मौत आती मेरे पीछे
ज़िन्दगी मेरे पीछे पीछे।।

आतंकवादी  मेरे पीछे
गोले हथगोले मेरे पीछे
कट्टरपंथी मेरे पीछे
कट्टा- पत्थर मेरे पीछे।
मौत आती मेरे पीछे
ज़िन्दगी मेरे पीछे पीछे।।

नन्हे - बूढ़े चले संग संग
बारूदी सुरंग करे रंग भंग
मैं बेचारा जग का प्यारा
फूलो से भी डरा डरा
अपनों से ही अब टक्कर
कैसा है ये अब चक्कर।
मौत आती मेरे पीछे
ज़िन्दगी मेरे पीछे पीछे।।

काश कहीँ मैं जी गया
हरी का नाम कुछ जप लिया
क्या कुछ जाने मैंने खोया
मरकर जी कर न पाया
ईश्वर अल्लाह की साया
शीतल तरुवर मनोरम छाया।
मौत आती मेरे पीछे
ज़िन्दगी मेरे पीछे पीछे।।

Friday, April 12, 2013

मेरे दोस्त की माँ


मेरी नयी कहनी ‘ मेरे दोस्त की माँ’ उत्तर प्रदेश हिन्दि संस्थान, 

लखनउ के त्रैमासिक पत्रिका ‘साहित्य भारति’ के ताज़ा अंक जनवरी – 

मार्च, 2013 में प्रकशित हुई है। यह सूचना इस आशय से दे रहा हूँ कि 

मेरे मित्र गढ़ उसे पढ़े और अपनी राय ज़ाहिर करें।