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Thursday, August 31, 2023

वासना

 



       इम्तहान खत्म होने के बाद सीमा जब घर लौटी तो नवजात शिशु की रोने की आवाज़ से वह स्तम्भित हुई । पता चला कि उसकी मां ने एक बेटे को जन्म दिया है । इकलौती सीमा के मन में बचपन से भाई की प्रबल इच्छा थी  । बचपन में दो फुट ऊंचे गुड्डे को भाई मानकर घंटों बातें किया करती , भाईदूज पर टीका लगाती, किंतु आज जब सचमुच भाई होने की ख़बर मिली तो वह मर्माहत हो गई । पिछले आठ महीने से वह घर नहीं आ सकी थी, न ही उसे भाई होने की ख़बर दी गई थी । 
             सीमा अब पच्चीस वर्ष की हो चुकी थी। उसे अपनी जवानी और ख़ूबसूरती की ढलान की चिंता होने लगी थी । नारी के जीवन में यही वह समय है जब वह सबकुछ पा लेना चाहती है। सीमा भी अपना घर बसाने, मां बनने की सपना देख रही थी मगर यह कैसी विडम्बना है कि सीमा को मां सुनने के बजाय दीदी सुनना पड़ेगा ? जब वह बच्चे को गोद में खिलायगी तो लोग उसे क्या समझेंगे: मां या दीदी ? नवजात शिशु के रहते इतनी जगहंसाई होगी कि शादी में भी अड़चन आ सकता है ।
            लाज- शर्म लोगों के ताने-उलाहनो की दुर्भावना-दुश्चिन्ताओं ने उसके अस्तित्व को झकझोर कर रख दिया । जितना सोचती उतनी ही वह परेशानी हो जाती । फ़िज़ूल की  चिंताओं के कारण उसके आचरण में अजीब सा बदलाव आ गया। बात-बेबात वह बौखला उठती, खिसियाती, झगड़ती । देखते देखते उसकी बौखलाहट उद्दंडता में तब्दील हो गई । कुछ समय बाद उसने पिता से बातचीत करना बंद कर दिया । फिर मां और महरी से भी । अपने कमरे में चुपचाप पड़ी रहती । कभी स्टीरियो बजाकर चिल्लाती तो कभी एकदम सन्नाटा पसर जाता, कभी कामवाली पर बेवज़ह गरजती तो कभी मां से झगड़ती । कभी डिनर टेबल पर नमक ज्यादा, मिर्चा ज्यादा चिल्ला कर थाल में पानी उड़ेल देती, तो कभी दो चार कौर खाने के बाद उठ जाती ।
            एक दिन सीमा को जिज्ञासा हुई कि उसकी बद्तमीजी को घर के सारे लोग क्यों
बर्दाश्त कर रहे हैं ? अभी तक किसी ने विरोध क्यों नही किया ? उसके पिता ने उसे फटकार क्यों नहीं लगाईं ? आख़िर माता पिता ने कोई कत्ल तो नहीं किया । बात तो बस इतनी ही है कि बुढ़ापे में पुत्र हुआ है जो अशोभनीय है परन्तु अपने देश में तो यह आम बात है । इस प्रश्न ने सीमा की उद्दंडता पर ब्रेक लगा दिया । कौतूहल फिर भी बना रहा ।
               सीमा ने गौर किया कि उसके माता-पिता में बोलचाल बन्द है । पिता अधिक से अधिक समय घर से बाहर रहते । भोर होते होते टहलने निकल जाते, घर लौट कर जल्द तैयार होकर दफ़्तर के लिए निकल जाते, देर शाम या रात को घर लौटते । छुट्टियों के दिन भी किसी न किसी बहाने लम्बे समय तक घर से बाहर रहते।
सीमा ने गौर किया कि उसके पिता दफ़्तर से लोटकर कभी बेटे से मिलने नहीं गये, बेटे के लिए कभी कोई सामान नहीं ले आए, बेटे को कभी भी गोद में लेकर खिलाये नहीं । सीमा के मन के भीतर एक जासूस का जन्म हुआ । वह जासूसी करने लगी । उसने पिता के कमरे की एक एक सामान को खंगाला, मां की कमरे की चीजों को, एक एक कागजपत्र, अलमारियों में रखी साड़ियों, स्वेटर कुछ भी नहीं छोड़ा और आख़िरकार अलमारी के लॉकर से उसे एक किताब मिली । उसकी मां की लिखी हुई किताब, एक साल पहले की छपी । किताब देख कर वह प्रसन्न तो हुई किंतु ततक्षण उसके मन में प्रश्न जागा : उसे इस किताब की जानकारी क्यो नही दी गई थी इसे छिपाकर रखने का क्या तुक है ? आख़िर कुछ तो बात होगी ।
              एक दिन पोस्टमैन ने एक लिफ़ाफा डाला । सीमा ने उसे लपककर उठा लिया । लिफ़ाफा उसकी मां के नाम था । उसने लिफ़ाफा खोला और खोलते ही वह दंग रह गयी । उसके भीतर उसकी मां की अनेक तस्वीरें थी । उसने अपना कमरा भीतर से बंद कर दिया । तस्वीरों को एक एक करके देखा । सारी तस्वीरें चौंकाने वाली थी । भेजने वाले का नाम था अजय कुमार । यह वही अजय जिसने मां का उपन्यास प्रकाशित किया था । सीमा को अब अपनी मां से सचमुच नफ़रत होने लगी उसने बिना कुछ आगे का सोचे समझे घर छोड़ने का मन बना लिया। कहां जाना मालूम नहीं । पढ़ी लिखी है कुछ न कुछ कर ही लेगी । क्या होगा आगे राम जाने पर इस नर्क में रहना असम्भव । 
                  अगले दिन सुबह सुबह सीमा ने जाने की तैयारी कर ली । एक अटैची में अपना सामान भरा । मां ने पूछा कहां की तैयारी है? कहां जा रही हो ? सीमा निरुत्तर। रात के क़रीब आठ बजे सीमा जब घर से निकलने लगी तो मां ने रास्ता रोका । " कहां जा रही हो ? किसके संग भाग रही हो ? ....इतने दिनों बाद घर लौटी और जब से आई हो मुंह फुलाकर बैठी हो ! तुम्हारी इतनी इच्छा थी कि एक भाई हो, जब भगवान ने भाई भेजा तो तुमने उसे देखा तक नहीं । "
सीमा चीख उठी  " छोडो रास्ता नहीं बताती । मर गई सीमा, मर गई मेरी मां ।" 
सीमा घर से निकलने के थोड़ी देर बाद उसके पिता घर लौटें।
अपने में घुसते ही पत्नी की तस्वीर दूसरे पुरुष के साथ देख उनका पारा चढ़ गया । पत्नी ने सीमा के चले जाने की सूचना दी । वे तत्काल घर से बाहर निकल गये।
इधर उधर देखने के बाद वे रेलवे स्टेशन पहुंचे । पांच नम्बर प्लैटफार्म पर सीमा दिख गई । एक बेंच पर अकेली बैठी थी। उसके निकट जाकर पिता ने कहा " चल बेटी घर चल।" 
सीमा सहम गई । रोते-रोते बोली " पापा आपको मालूम नहीं, मम्मी..." 
उसकी बात काटकर उन्होंने कहा " मुझे सब मालूम । ये सब उन दिनों की बात है जिन दिनों मैं लन्दन में था । तेरी मां उस प्रकाशक के चंगुल में फंस गई थी । उसने तेरी मां को अवार्ड दिलवाने का सपना दिखाया था ।वह वासना का शिकार हो गयी थी ....... गलतियां तो इंसानों से हो जाती है, एक गलती किसी के जीवन भर के समर्पण से बड़ी नहीं हो सकती ... वो तेरी माँ है, सारे जीवन उसने हम सब का ख़्याल रखा, उसी के वजह से तू इस दुनिया में है इस सच को तू झुठला नहीं सकती,  चल घर चल ।"
सीमा बोली " पापा आपके लिए मुझे अफ़सोस है मगर मैं उनके साथ नहीं रह सकती ।
पिता ने बेटी के आंसुओं को पोंछ कर कहा " इस राज़ को राज़ ही रहने दे, हर एक के जीवन का एक 'पास्ट' होता है। हमे आज में जीना चाहिये और आज का सच यही है की तेरी माँ हमारे साथ है। पिता की बातें सुन बेटी की आँखों से अश्रु गिरने लगे ... वो बोली पापा आप कितने नेक इंसान हो... आपका दिल कितना बड़ा है।  
पिता ने उसके आंसू पोंछ के कहा  तुझे तो चंद महीने ही रहना है । तेरे लिए मैंने बर ढूंढ लिया है, बस तिथि तय करनी है । अशोक को तो तू जानती ही हैं। " 
सीमा उठ खड़ी हुई, पिता को प्रणाम किया फिर पिता के वक्ष में सिर रखकर रोने लगी ।

सुभाष चन्द्र गांगुली
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पत्रिका "जगमग दीपज्योति" दीपावली एवं वार्षिक विशेषांक 1999 में प्रकाशित ।

Wednesday, June 14, 2023

कहानी: बेटी


दफ्तर के लिये तैयार होकर बनर्जी बाबू नीचे उतरे और बेटी रानी से बोले "खाना लगाओं।"

-"अच्छा, बैठिये।” कह कर रानी किचन में चली गई। बरामदे में खड़े-खड़े बनर्जी बाबू अखबार देखने लगे। रानी अचानक ऊपर चली गई फिर बनजी बाबू की नज़र बचा कर किचन में घुस गई। चीनी, चावल, आटा, तेल आदि कुछ सामान ऊपर के कमरे में रखना पड़ता था। रानी क्या लाई होगी? बनर्जी बाबू ने सोचा? एकाध मिनट बाद रानी की दीदी भी दनदनाती हुई नीचे उतर कर किचन में पहुँच गई। फिर बड़े वाले कमरे से फ्रिज खोलकर एक कटोरी निकाली और वह भी पिता की नज़र बचा कर किचन में चली गई।

क्या बात है दस मिनट बीत गए, मगर अभी तक खाना नहीं परोसा गया क्या कर रही है ये लड़कियाँ? आज कुक नहीं आई। हर शुक्रवार वह संतोषी माता का व्रत रखती है शुक्रवार छुट्टी। सुबह स्कूल जाने से पहले मिसेज बनर्जी खाना बना कर गई थी फिर देर होने का कारण?

बनर्जी बाबू सोच रहे थे कि किचन में जाएं या न जाएं कि दोनों बहनों की दबी जुबान में बहस सुनाई दी। बनर्जी बाबू के किचन में पहुँचते ही दोनों बहने एक साथ बोल पड़ी-"बैठिये, अभी ला रही हूँ।'

बड़ी बेटी चूल्हे पर एक ओर रोटी सेक रही थी और रानी दूसरे चूल्हे को बगल में खड़ी थी। रानी रूँआसी थी। बनर्जी बाबू ने पूछा- क्या बात है?" बड़ी में जवाब दिया- "माँ ने रानी से कहा था चावल पका लेना, दाल और सब्जी रखी है पर वह सजने-धजने में लगी रही। आपके निकलने के बाद हम लोगों को भी सी०जी०एच०एस० जाना है मगर वह अभी से सजने लगी-फिज में आटा था। में रोटी बना रही हूँ। जल्दी ही जाएगी।"

दीदी की बातों से खिन्न होकर रानी बोली-"मैं भूल गई" थी ना, कहाँ सज रही थी?" बनर्जी बाबू बोले- "कोई बात नहीं रोटी खा लूंगा" कह कर बनर्जी वायू किचन के बाहर निकले ही थे कि रानी रोने लगी। बनर्जी बाबू का दिल धक्क से धड़का। उन्होंने पैरों को वापस खींचा और पूछा- "क्या हुआ? बात क्या हुई?" रानी तब भी रोये जा रही थी। उन्होंने ऊँची आवाज़ में कहा- “क्या हुआ? कुछ कहोगी भी?" फिर बड़ी बेटी से पूछा- "तुमने डॉटा है क्या?" रोते-रोते रानी बोली-"इतनी देर में चावल पक जाता। दीदी ने भात बनाने नहीं दिया। मूंग की दाल और दो मेल की तरकारी है। सारे आइटम भात से खाने के हैं आप रोटी के साथ कैसे खायेंगे? - माँ ने कहा था पर मैं भूल गई थी।”

बनर्जी बाबू भावुक हो उठे। उनकी आँखे नम हो गई। उन्होंने सोचा, अब रानी की सम्वेदना को कुचल कर दफ्तर नहीं जाया जा सकता, दिन भर मन में अशांति बनी रहेगी। मगर मीटिंग ?-मीटिंग सीटिंग चलती रहेगी। कौन सी आफत आ जाएगी। अगर वे मीटिंग में न पहुँचे? बाकी लोग तो रहेंगे ही और अगर उनका रहना उतना आवश्यक है तो बड़े साहब उनके पहुँचने का इंतज़ार कर लेंगे या मीटिंग बाद में रख लेंगे। दफ्तर में देर से पहुँचने का कोई बहाना ढूंढ लिया जायेगा। आधे दिन का सीएल अप्लीकेशन दे दिया जाएगा।

बनर्जी बाबू ने कहा- "नहीं, रानी ठीक कह रही हैं। सारे आइटम भात से ही खाने वाले हैं। मैं भात खाकर ही जाऊँगा, तुम बनाओ। मुझे ख्याल नहीं था, अभी-अभी याद आया है कि मीटिंग तो कल है।"

बनर्जी बाबू भात खाकर दफ्तर पहुँचे। उन्होंने अपनी कहानी सहकर्मी मित्र हरीश जी को सुनाई। सुनते-सुनते हरीश जी भावुक हो उठे और कहानी खत्म होते ही बोले -"पिता से इतना प्यार कोई बेटी ही कर सकती है। वही रख सकती है उनकी पसंद का इतना ध्यान....

आज मेरे पास भी दो बेटियाँ होती! सोनोग्राफी से जब पता चला था कि कोख में लड़की है तो मैंने एवारर्शन करवा दिया था...एक ही लड़का है... बीस वर्ष का. ...हरीश जी की आँखों से दो-चार बूँदे गालों पर लुढ़क गए।


- सुभाष चंद्र गाँगुली 
( "मोक्षदायिनी" कहानी संग्रह से, प्रथम संस्करण: 2021)

कहानी: पोता


"पोता बड़ा या नाती? कर्कश स्वर में लम्बी-चौड़ी कद-काठी के दादाजी ने तीन वर्ष के पोते अमन को प्रश्न किया। प्रश्न को समझने की कोशिश की मुद्रा में अमन दादाजी का मुंह ताकता रहा।

दादाजी ने अपना प्रश्न दुहराया।

थोड़ी देर बाद उन्होंने दूसरा प्रश्न किया-'पहले पोते का नम्बर आता है या नाती का?... बोल पोता बड़ा है या नाती? बोल बात तो कर सकता है ना? 

वैसे ही अमन दादाजी की भारी भरकम आवाज़ से कदाचित सिहर उठता है, उन्हें देख कन्नी काटता, अब वह ज़रा सा भयभीत होकर अवाक् दृष्टि से दादाजी को देखने लगा।

अमन का हाव-भाव देख दादाजी को गुस्सा आया। उन्होंने पुनः दूसरे ढंग से उसी प्रश्न को 'दुहराया जो उनके मन को कुछ दिनों से कचोट रहा था। उन्होंने पूछा- 'बोल में अच्छा आदमी हूँ या तेरा नाना?' 

-'नाना। नाना। अमर ने तपाक से उत्तर दिया फिर 'नाना' 'नाना' कहके उछलने लगा। दरअसल उसे नाना की याद आ गयी।

दादाजी को और बुरा लगा। उन्होंने कहा-'मैं जो तुमसे इतना प्यार करता हूँ मैं अच्छा आदमी नहीं हूँ? गंदा हूँ?' 

-'गंदा, गंदा' बोलकर अमन पीछे पलटा फिर इधर-उधर घूमते-दौड़ते 'गंदा' 'गंदा' रट लगाता रहा मानो उसे एक नया खेल मिल गया हो। अब वह खुशमिज़ाज, मस्त बच्चा दिखने लगा।

दादाजी को अब सचमुच में गुस्सा आ गया। उनका चेहरा लाल-पीला होता गया। वे कुछ ऊँची आवाज़ में बोलने लगे-'पाँच दिन के लिए आकर नाना चला गया वह ज़्यादा प्रिय हो गया और मैं जो रोज़-रोज़ भाग कर अपने पोते से मिलने आ रहा हूँ, टॉफी देता हूँ, कपड़ा-लत्ता देता हूँ में कुछ नहीं? मैं गंदा हूँ?... अमन बीच मैं बोल पड़ा-'गंदा' 'गंदा' 'गंदा', दादाजी बोलते गए 'बुद्ध कहीं के तू इस घर की औलाद है, इस खानदान के परिचय से तेरा परिचय है, तेरा परिचय मेरे नाम से है, मेरे बेटे के नाम से है, नाना-बाना का कोई नाम नहीं लेता.. बाप-दादा का नाम लेगा तभी तुझे वैध संतान माना जाएगा। याद रख पहले पोता, नाती नहीं, पहले दादा नाना नहीं।'

दादाजी ने अपनी भड़ास निकाली, जिसे सुनाना था सुना दिया। उधर अमन अपनी ही धुन में मगन था। कभी कागज पर लकीरें खींचता, कभी दौड़कर माँ को छूकर आता तो कभी बारजे पर बैठे कबूतरों से बातें करता।

दादाजी एकबारगी उठ खड़े हुए फिर अमन की कलाई पकड़कर बोले-'पता नहीं तेरे नाना ने तुझे कौन सा पाठ पढ़ाया, कौन सी घुट्टी पिला दी कि तू बेईमान बन गया है... बेईमान । 

अमन ने अपनी कलाई छुड़ा ली फिर ऊँची आवाज़ में बोला- मैं बेईमान नहीं, मेरा नाम अमन है, अमन।'

-नहीं तू बेईमान है, बेईमान ।' 

-'मैं अमन हूँ। मेरा नाम अमन है। अमन वर्मा, याद रहेगा ना। पूरी ताकत के साथ अमन ने कहा।

दाँत पीसते हुए दादाजी बोले- 'मुझे तेरा नाम याद रहेगा मगर तू याद रख पहले दादा फिर नाना, पोता बड़ा होता है नाती नहीं। फिर उन्होंने आहिस्ता से अमन को एक तमाचा जड़ दिया। अनचाहे तमाचा चेहरे की जगह गर्दन पर पड़ गया और कुछ जोर से पड़ने के कारण अमन फर्श पर गिर पड़ा। गिरते ही वह फूट-फूट कर रोने लगा। फिर चीख उठा- 'मम्मी! देखों, दादाजी ने गिरा दिया... दादाजी ने मुझे मारा।'

अमन की माँ चम्पा तनफनाती हुई किचन से निकल आयी, अमन को गोद में उठाकर घूँघट संम्भालती हुई बोली-'बहुत देर से बकवास किए जा रहे हैं आप, अस्सी के क़रीब उम्र है, मगर इतना ज्ञान नहीं हुआ कि किससे क्या बात करनी चाहिए...इतने छोटे बच्चे से जाने क्या-क्या बके जा रहे हैं... उसे क्या पता पोता क्या होता है और नाती क्या। बच्चा तो बच्चा होता है, यह भी नहीं मालूम आपको.... वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूँ आजकल पोता और नाती में कोई भेद नहीं मानता, संतान चाहे बेटे की हो या बेटी की, मा-बाप के लिए दोनों समान है। कानूनन भी लड़का लड़की दोनों बराबर । 

ससुरजी ने अपना आपा खो दिया-'बहू। यही सिखाया तुम लोगों ने मेरे पोते को... तुम्हारे बाप का कोई बेटा नहीं है तो उसने यह मंत्र दिया तुम्हें और तुम्हारे बेटे को? अपना पोता होने से रहा तो अब नाती को हथियाना चाहता है।' 

चम्पा का चेहरा तमतमा उठा। उसने कहा- मेरे पूज्य ससुरजी मैं कोई गंवारू, अनपढ़, बेजुबान छोरी नहीं हूँ कि आपकी बेसिर पैर की बातों पर आँसू बहाऊँ। लखनऊ शहर की प्रतिष्ठित परिवार की पढ़ी-लिखी लड़की हूँ. आप तो मंदिर- वंदिर  जाते हैं, पूजा-पाठ करते हैं, प्रवचन सुनते हैं। जात-पात, ऊँच-नीच सब मानते हैं, संस्कारों के बारे में भी खूब ज्ञान बघारते हैं तो आपको इस बात का भी ज्ञान होगा कि जो पिता कन्यादान नहीं कर पाता उसके हाथ का जल शुद्ध नहीं माना जाता. ...आप लड़कियों को इतनी हीन दृष्टि से देखते हैं इसीलिए ऊपर वाले ने आपके घर लक्ष्मी नहीं भेजी, ऊपर वाला अपात्र को दान नहीं देता। आप अपनी जीवन भर के लिए गंदी, दकियानूसी सोच मेरे बेटे पर न घोपिए कच्चा घड़ा है... रही बात मेरे पिताजी की तो सुनिए दो बेटियों के बाद उन्होंने ऑपरेशन करवा लिया था, अगर उन्होंने फैमिली प्लैनिंग न करवायी होती तो उनके भी सात-आठ बच्चे होते, हो सकता मेरे भी चार-पाँच भाई रहते। लड़के जन्में तो इसमें आपका कोई कमाल नहीं है।" 

ससुरजी का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। वे चीख उठे-बहू तुम हदें पार कर रही हो। उम्र में मैं तुम्हारे बाप से ढेर बड़ा हूँ, तुम्हें मर्यादा में रहकर बात करनी चाहिए। कुछ नहीं तो सामने वाले की उम्र का लिहाज तो करना ही चाहिए। तुम्हारे बाप ने इतना भी नहीं सिखाया?'

चम्पा ने अपना आपा खो दिया। उसने उसी तेवर में कहा-'बाबूजी मैं आपसे कह देती हूँ अब अगर आपने मेरे पिता के बारे में उल्टा सीधा कहा तो... जब से व्याह के ससुराल आयी हूँ जाने कितनी मर्तबा आपने पिताजी के बारे में भला-बुरा कहा। मेरे पिताजी यूनिवर्सिटी में इंगलिश के प्रोफेसर हैं, उनका काफी मान-सम्मान है, आप उनके सामने कहीं नहीं ठहरते। आपके मन की भावनाओं को ये अच्छी तरह से समझते हैं, इसी कारण से वे कभी भी मेरे यहाँ नहीं आते रहे। शादी हुए ग्यारह साल बीत गए, इस फ्लैट को लिए हुए छह साल अमन भी तीन साल का हो गया है मगर पिताजी ने यहाँ न आने के लिए हमेशा कोई न कोई बहाना ढूंढ लिया। आप ही के बेटे ने कई बार आग्रह किया था तब जाकर वे आने के लिए तैयार हुए थे। इतनी बार दामाद ने न कहा होता तो शायद वे कभी नहीं आते। और उसकी वजह हैं आप, आपकी दकियानूसी सोच।

ससुरजी बोले- बहुत पाँच चलने लगी है तुम्हारी को आज मैं बेटे से तुम्हारी शिकायत करता हूँ। तुम्हें नसीहत देने की जरूरत है। 

चम्पा बोलती गयी जब देखिए तब अमन को डाँटते हैं आप पोते को इतना कोई डाँटता है भला। गुस्सा मेरे पिता पर है या मुझ पर मगर निकालते हैं मेरे बेटे पर... न जाने कितनी बार अमन ने आपसे रिमोट कंट्रोलवाली कार माँगी, आपके पास रूपए की कमी नहीं है, सैकड़ों रूपए इधर-उधर बाँटते फिरते हैं मगर पोते को एक रूपए की टॉफी थमाकर सोचते हैं बहुत कर दिया, पोता आपका पालतू हो जाएगा, दुम हिलाकर आपके आगे-पीछे घूमेगा और उसके नानाजी को देखिए जिस दिन वापस जा रहे थे नाती के कहने की देर नहीं हुई कि उन्होंने पर्स झाड़कर पच्चीस सौ रूपए निकाल दिए, अपने पास रास्ते के लिए मात्र सौ रख लिए थे। रास्ते में पैसे की कमी के कारण असुविधा न हो इसलिए मैंने पाँच सौ रूपए जबरदस्ती वापस कर दिये, वे नहीं ले रहे थे, मैंने कहा आप मनी आर्डर कर दीजिएगा। मनी आर्डर आता होगा। अब तक मोटर कार आ गयी होती मगर मेरा ही मार्केट जाना नहीं हुआ, ऐसे ही अमन नाना को याद नहीं करता। नानाजी पाँच दिन में अमन को जितना प्यार दे गये उतना प्यार आप इतने दिनों में नहीं दे पायें।'

चम्पा की जुबान चालू थी। वर्षों का जमा गुबार खाली हो रहा था। आँसू की धार भी बह रही थी- ससुरजी अब धीरे-धीरे, शान्त भाव से डगों को बढ़ाते हुए फाटक तक आ पहुँचे। दो कदम आगे बढ़कर चम्पा ने विनम्रता से कहा- बाबू जी ! बाबूजी! रुकिए... बाबूजी! आइ एम सॉरी...बाबूजी ज़रा सुनिए ना...बाबूजी !...

ससुरजी पीछे पलटकर बोले-'अब सुनने और कहने के लिए बचा ही क्या बहू" ।ससुरजी फाटक से निकल गए। 

चम्पा फाटक पर खड़े-खड़े आँसू बहाती रही, बिलबिलाती रही।

करीब डेढ़ घंटे बाद सास का फोन आया तो पता चला अमन के दादाजी घर नहीं पहुँचे। चम्पा ने कहा वे तो बहुत देर हुआ निकल गये। शायद रास्ते कोई मिल गया होगा। फिर एक घंटे बाद सास का फोन। अब चम्पा चिन्ता में पड़ गयी। मात्र दस मिनट का रास्ता किधर चले गये? फिर भी ढांढस दिलाती हुई सास से बोली, 'पहुँच जाएंगे, चिन्ता की क्या बात। कोई मिल गया होगा। घर पहुंच जाए तो मुझे खबर कर दीजिएगा। चिंता लगी रहेगी।'

समय गुजरता गया। दिन ढल गया। साँझ भी उतर आयी। दादाजी निखोज । जहाँ कहीं भी आना जाना था, पुराने यार-दोस्त जहाँ वर्षों से आना-जाना भी न था सभी जगह पता लगाया गया। अमन के पिता, चाचा इधर-उधर घूम-घाम कर घर लौट आये। जहाँ जहाँ खबर की गयी थी अब वहाँ से भी फोन आने लगे।

सबसे ज़्यादा हैरान-परेशान हो गयी चम्पा वह अपनी सुध-बुध खो बैठी। ससुरजी उससे रूठ कर घर से निकले थे उस बात की जानकारी पति को देने का क्या अंजाम हो सकता है इस कल्पना से वह सिहर उठती, गला सूखने लगता। चुप रहने में ही उसने अपनी भलाई समझी। 

साँझ भी ढल गयी। रात के करीब आठ बजे घर पर अमन के पिता और चाचा पिता को ढूंढने की तरकीब पर माथापच्ची कर रहे थे कि तभी दादाजी गम्भीर मुद्रा में आ पहुँचे। दोनों बेटे एक साथ जवाब-तलब करने लगे। पिता ने डाँट लगायी चुप रहो मैं तुम्हारा बाप हूँ या तुम लोग मेरे बाप हो?  बेकूफी करते हो मैं कोई बच्चा हूँ जो इधर-उधर दस जगह पूछताछ करते हो।'

दो मिनट बाद अपार्टमेन्ट का गार्ड एक बड़ा पैकिंग बॉक्स लेकर दाखिल हुआ। पैकिंग खोली गयी। एक बड़ी मोटर कार निकल आयी।

दादाजी ने अमन से कहा, 'देखो, क्या लाया हूँ। रिमोट कंट्रोलवाली मोटरकार है। मँहगी है। तुम सायकिल जैसा पैडल मार कर भी चला सकते हो।' कार देख अमन कूदने लगा।

दादाजी ने कार के भीतर अमन को बिठाते हुए पूछा- 'दादाजी अच्छा आदमी है या गंदा? 

अमन ने हाजिर जवाब दिया- 'गंदा गंदा।' 

अमन का सारा ध्यान मोटरकार पर था। वह गाड़ी चलाने की कोशिश में जुट गया। चम्पा की आँखे नम थी।

दादाजी की बाँछे खिल उठी।

- सुभाष चंद्र गाँगुली 
( "मोक्षदायिनी" कहानी संग्रह से, प्रथम संस्करण: 2021)

Sunday, April 23, 2023

मुन्नीबाई ( यह मेरे कहानी संग्रह ' कहानियां पार्क की ' मे है )

              समाचार पत्र में पढा कि साध्वी राधा देवी उर्फ़ मुन्नी माई चुनाव जीत गयी हैं। उन्होंने सत्तारूढ़ दल के दो दशकों से अविजित अपनी प्रतिद्वंद्वी विजय सिंह की जमानत जब्त करा कर ऐतिहासिक जीत हासिल की। जहां जो भक्त थे सबके सब पार्टी बैनर तले गाजा बाजा लेकर सड़को पर उतर आए। मुन्नी माई ने अकल्पनीय जीत हासिल की है, इस कारण से उनका मंत्री बनना तय । पार्टी की ओर से लड्डू बांटे जा रहे हैं और भक्तों के मन में लड्डू फूट रहे हैं कि माई जरुर उनके परिवार में खुशियां उड़ेल देंगी ।
अख़बार  में फोटो बहुत साफ़ नहीं था फिर भी मैं पहचान गया था कि यह तो अपने पार्क की हिफाज़त करने वाली मुन्नी बाई ही है जो तीन साल काम करने के बाद अचानक फ़रार हो गई थी। 
    तब से क़रीब पांच साल बीत गए ,चेहरे पर ख़ास फ़र्क नहीं आया था, उसकी ऊपरी होंठ पर एक कट और माथे पर बड़ी बिन्दी देख कर मैंने उसे पहचान लिया । 
भोली सी सूरत वाली, दर्जा चार तक पढ़ी, मुन्नी बाई, बाई से माई बन गई थी, माई से बहुत बड़े नेता बन गई , अब शिक्षा, रेल सोचकर मैं हैरान हो रहा था और खुश भी हो रहा था कि वह मेरे पार्क की हिफाज़त करती थी कभी। और मुझे भलिभांति जानती है।
लाजुक स्वभाव वाली मुन्नी बाई कहां से कहां पहुंच गई। 
          इस पार्क के एक कोने में विशाल नीम वृक्ष के नीचे, एक छोटा सा कुटीरनुमा पक्का छत वाला कमरा है । कभी वह कमरा बना था चौकीदार के रहने के लिए  किंतु कोई चौकीदार उसमें रहने के लिए तैयार नहीं हुआ क्योंकि पार्क में कहीं भी टॉयलेट नहीं है और ना ही नहाने की कोई जगह है । किचन भी नहीं है । 
 बहुत दिनों के बाद 'वेलफेयर एसोसिएशन' का एक सदस्य अविनाश बाबू एक प्रौढ़ महिला को साथ लेकर  ' वेलफेयर ' एसोसिएशन के अध्यक्ष से बोले कि यह महिला यहां रहने के लिए तैयार हैं । कमरे के पीछे बाउंड्री वॉल के पास एक बहुत छोटी सी जगह में टाइल्स लगाकर यूरिनल की व्यवस्था की जा सकती । भीतर से पाइप डाल देने पर बाउंड्री के पीछे नाली में पानी गिरेगा। दोनों तरफ़ ऊंची बांउड्री वाल और एक तरफ़ घनी झाड़ियां होने से वह जगह कहीं से दिखाईं भी नहीं देती। लैट्रिन के लिए पार्क से थोडी दूरी पर 'सुलभ' है ही । 
            इनके कमरे में एक कोने कमरे में पानी डालने वाला पाइप, खुरपी, कैंची, गदाला, फावड़ा तथा अन्य सामग्री पड़ी रहेगी । वह अपना खाट डाल लेगी। कमरे के बाहर ईंटे का चूल्हा बनाकर अपना खाना बना लेगी । रात को कमरे में रहेगी, पार्क की चाबी इन्हींके पास रहेगी। शाम को  फाटकों पर ताला डालना और सुबह खोलना इनकी जिम्मेदारी होगी । महीने में पांच हजार रुपए लेगी ।
अध्यक्ष महोदय ने अविनाश से पूछा 'फुल टाइम रहना है, छुट्टियां नहीं मिलेगी सब बता दिया है न ? जब पार्क खुला रहेगा आस पास अपने काम के लिए जा सकती।'
- ' जी। बता दिया सबकुछ।'
अध्यक्ष महोदय ने पूछा -' क्या नाम है तुम्हारा ?
-' मुन्नी सिंह। लोग मुझे मुन्नी बाई के नाम से जानते हैं।'
-' कौन लोग ?'
-' आश्रम के लोग।'
- कौन सा आश्रम ? कहां का आश्रम ?'
-' हरद्वार के एक आश्रम में पंद्रह साल से ज़्यादा काम किया था। उससे पहले एक मन्दिर में काम किया था।'
-' फिर यहां क्यों चली आई ?'
-' वहां बहुत काम करना पड़ता। अब हमारी उम्र बढ़ रही है, हमसे उतना होता नहीं। '
- ' पति क्या करता है?'
-' साधु है। वह शादी के पांच साल बाद हमें छोड़कर चले गए थे।'
-' साधु है? कहां गए?'
-' पता नहीं। बहुत दिनों के बाद पता चला किसी ने उनको 'प्रयागराज कुंभ मेला' में देखा था। कहां है मालूम नहीं,अब हमने आसरा देखना छोड़ दिया।'
-' घर दुआर कहां है?'
-' पीलीभीत में था,गांव में। अब वहां मेरे सौंतन का बेटा रहता है।"
-' क्या मतलब ?'
-' साहेब ! मैं उनकी दूसरी बीबी हूं। पहली वाली मरने के बाद मुझसे शादी हुई थी। मेरी कोख बंद निकली। बच्चा न होने के कारण मेरी सास मुझे गाली देती, फिर आदमी भी चला गया घर छोड़कर, सास जल्दी मर गई। हमारे सौंतन का बेटा हमें घर से बाहर निकाल दिया........बस इतना ही है मुन्नीबाई की कहानी।'
-' चलो अब रोना धोना बंद करो। इनसे अपना काम समझ लो, सम्भाल लो...... अविनाश जी, इन्हें रख लीजिए काम पर। समझा बूझा दीजिए।'
-' ओ के सर !'
                      मुन्नीबाई ने काम पकड़ लिया और रहने लगी। कुछ दिनों के बाद वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष से मिलकर अपने कमरे के आगे और पीछे पानी तथा धूप और बारिश की बौछारों से बचने के लिए शेड बनवा देने का अनुरोध किया। उसने यह समझाया कि आगे पीछे शेड बनने से उसे तो लाभ मिलेगा ही, अचानक बारिश आंधी आ जाने पर पार्क में उपस्थित रहने वालों को भी सिर छिपाने की जगह मिल जाएगी।
                        अध्यक्ष को मुन्नीबाई की बात अपील कर गयी। उन्होंने एसोसिएशन की मीटिंग बुलाई।
 मीटिंग में उन्होंने कहा कि मुन्नीबाई को जो कमरा दिया गया है वह छः बाईं सात फिट का है,उसकी ऊंचाई भी मात्र सात फिट है। उसमें पांच फिट ऊंचा दो फिट चौड़ा दरवाज़ा है। 
दरवाज़े के ठीक ऊपर और उसी हाइट पर चारों दीवारों पर कारनिस है। अचानक आई बारिश के दौरान कुछ लोग कारनिस के नीचे पनाह लेते हैं किन्तु केवल मात्र सिर ही बचा पाते हैं।
 वह कमरा दरअसल सामान रखने के लिए बना था। 
             पहले पार्क दिनभर खुला रहता था और उस कमरे में ताला पड़ा रहता था। एक ही फाटक खुलता था, उसी फाटक के सामने रहने वाले रिटायर्ड आदमी के पास चाबी रहती थी, रात को फाटक बंद कर दिया करते थे और सुबह खोल देते। हफ़्ते में एक दिन नगर पालिका का माली दिनभर रहकर काम कर जाता।
                            लेकिन जब से वेलफेयर एसोसिएशन बना तीसों दिन काम करने के लिए माली रख लिया। 
देखते-देखते पार्क में फल-फूलों से बहार आ गई। इसकी रखवाली तभी सम्भव जब पार्क में कोई चौबीस घंटे रहे।
 मुन्नीबाई रहने के लिए तैयार हो गई किन्तु उसने जो प्रस्ताव रखा वह मिनिमम सुविधाएं हैं जिन्हें नकारने से बड़ी मुश्किल से मिली मुन्नीबाई हाथ से निकल जाएगी।
                सभा ने आम सहमति से प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। थोड़े समय बाद वह क्रियान्वित भी हो गया। 
कमरे के पीछे दो दीवारें उठाई गयी, उसमें सामान रखने के लिए ताक़ बनाया गया।
कारनिस के ऊपर से ऍसबेस्टस शीट डाल दिया गया ताकि आंधी बारिश में लोग शेल्टर ले सकें। कमरा और उसके बाहर लाइटें लगा दी गई। सोने के लिए एक तख्त़पोश डाल दिया गया। प्लास्टिक की दो बाल्टियां,मग, झाड़ू आदि छोटी मोटी ज़रूरी चीजें दे दी गई।
मुन्नीबाई बहुत खुश हुई । कमरे के पीछे पार्क के सामान यथा रबड़ की पाइपें, खुरपी, फावड़ा आदि रख दिया। 
दीवाल अलमारियों पर तथा खूंटियों पर अपना कुछ सामान रख दिया। दूसरी दीवाल के पास उसने एक छोटा सा देशी चूल्हा बना लिया । कमरे के अंदर बाहर पोताई करवा दी गई। मुन्नी बाई ने दीवार पर कपड़े टांगने के लिए एक हैंगर फिक्स कर दिया। उसके बगल मे कुछ कीलें ठोंकी फिर देवी देवताओं की तस्वीरें टांग दी।
                मुन्नी बाई ने अपना काम सम्भाल लिया और अच्छी तरह से काम करने लगी। 
शरीर से मजबूत, लम्बी-चौड़ी, कपाल पर बड़ी बिन्दी, मांग में सिन्दूर,गले से मोटी आवाज़। कुल मिलाकर एक रोबीला व्यक्तित्व।
अविनाश बाबू ने काम-काज समझाते हुए कहा कि वह सुनिश्चित करें कि पार्क में किसी प्रकार का ग़लत काम न हो, कोई वैसा काम न हो जिससे पेड़ पौधों को तथा मैदान का नुक़सान न हो। किसी प्रकार की समस्या हो तो उन्हें या अध्यक्ष को सूचित करें।
मुन्नी बाई ने बड़े बच्चों का फुटबॉल, क्रिकेट, गुल्ली-डंडा खेलना बंद कर दिया। बहस करने पर वह बोली कि थोड़ी दूरी पर सदर के पास विराट् खेल का मैदान है, वही जाकर खेलें, पार्क में नहीं चलेगा।
        दो-तीन महीने बाद बड़े बूढ़े जो नन्हे-नन्हे बच्चों को ट्रायसिकल और दुपहिया सायकिल के साथ टहलाने आते उन्हें मना करना शुरू किया, न मानने पर एक दिन कड़ाई से मना कर दिया। 
उसके इस काम से जहां कुछ लोग असंतुष्ट हुए और शिकायत लेकर अध्यक्ष, सचिव से मिले, वही अधिकतर लोग खुश हुए। नाखुश होने वालों में वेलफेयर एसोसिएशन के कुछ मेम्बर्स भी थे।
मगर उनलोगों ने शिकायत करने वालों को समझाया कि नियमित रूप से मशीन से घास की छिलाई होती है,उस पर सायकिल चलने से खूबसूरती नष्ट हो जाती है। पार्क के बाहर चार सड़कों में दो लगभग खाली रहती है, वहां टहला सकते हैं।
सभी नाखुश मेम्बर्स कनविन्सड हो गये। 
देखते-देखते सात आठ महीने में पार्क की रौनक लौट आई। चौतरफ़ा हरियाली ही हरियाली। कालीननुमा मैदान में नन्हे मुन्ने बच्चे बूढ़ों की उंगलियां थामे चलना सिखते, कोई-कोई छोटे-छोटे पांओं से दौड़ते, झूला झूलते, सी-सॉ पर चढ़ते, अत्यंत मनोरम पार्क बन गया।
      वेलफेयर एसोसिएशन की तारीफ़ तो होती ही, मुन्नी बाई का नाम भी ज़रूर आता।
    मुन्नी बाई शुरू से ही भक्तिन रही है, सुबह शाम नियमित पूजा पाठ करती।
अब पार्क में सबकुछ व्यवस्थित हो जाने के बाद मुन्नी बाई को भजन-कीर्तन के लिए और अधिक समय मिल गया।
मुन्नी बाई ने तुलसी माला पहनी, रुद्राक्ष का बड़ा सा माला धारण किया। 
मंगलवार और शनिवार गेरुआ वस्त्र धारण करती और बाकी दिनों में श्वेत वस्त्र।
सुबह पांच सात मिनट पूजा करती फिर शाम को दिया बाती जलाती, शंख फूकती, कमरे के भीतर घंटी बजा कर आरती करती।
लोग मुन्नी बाई के पूजा पाठ से आकृष्ट होने लगे। टहलते-टहलते शंख की आवाज़ सुनने पर एकाध मिनट रुक कर दूर से हाथों को जोड़कर नमन करते। 
कमरे के बाहर दोनों दीवारों पर भक्तों ने राम लक्ष्मण और हनुमान जी के फोटो लगा दिया।
अब मुन्नी बाई का कमरा दूर से रहने वाला कमरा के बजाय छोटा मोटा मंदिर प्रतीत होने लगा।
टहलने वाले लगभग हर कोई राम लक्ष्मण, बजरंगी के पास पहुंच कर दोनों हाथों से नमन करते और आये दिन माई के हाथ में कुछ न कुछ रुपए पैसे देते।
            हर मंगलवार और शनिवार को शाम पार्क लगभग खाली हो जाने के बाद पाठ करती 'सुन्दर काण्ड' पाठ करती। 
कोई न कोई सुनने के लिए थोड़ी देर रुक जाता।
फिर देखा पास पड़ोस से तीन चार महिलाएं आकर कमरे के सामने कारनिस के नीचे हाथों में फूल लिए पाठ सुनती।
चढ़ावा चढ़ने लगा। मिठाई, फूल माला, अगरबत्ती, दियासलाई,धूप, लड्डू,बताशा,फल कुछ न कुछ चढ़ाते। मुन्नी बाई थोड़ा बहुत प्रसाद बांटने के लिए बाकी प्रसाद भक्तों के हाथों में दे देती।
     अब लोग उसे प्रहरी या कामवाली की नज़र से नहीं देखती बल्कि उसमें मां देखने लगें। कोई मुन्नी माई तो कोई कोई माताजी कहके पुकारने लगे।
इस पार्क से एक डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर घनी आबादी वाली गरीबों की बस्ती है जहां आठ दस छोटे-छोटे पक्के मकान दिख जाएंगे बाकी सब झुग्गियां या खपरैले हैं। यहां किसी घर की बात किसी से छिपी नहीं रहती।
घर में जगह की कमी होने के कारण पहले लोग अपनी कन्याओं को किसी मन्दिर परिसर में ले जाते रहे। पिछले दो-तीन सालों से कोई कोई परिवार गोधूलि बेला में पार्क में कन्या दिखाने ले आते ।
            एक दिन एक वाकया हुआ जिससे मुन्नी बाई के जीवन में एक नया मोड़ आया। 
कन्या दिखलाने आईं माता पिता परिवारजनों को मैदान में बिठा कर मुन्नी बाई के दरवाज़े पहुंच कर बेटी की विवाह के लिए आशीर्वाद मांगा।
फर्श पर बैठी मुन्नी बाई ने माला जपते-जपते दायां हाथ उठाकर आशीर्वाद दे दिया।
लड़की देखने में सामान्य थी और उसके पिता दहेज़ देने में असमर्थ थे, फिर भी लड़की पसंद हो गई और विवाह की तिथि भी तय हो गई। 
ऐसी घटनाएं दो तीन और घटित हुई। इससे इतर भी कुछ घटी।
        किसी ने मुन्नी बाई से कहा कि बच्चे को तेज़ बुखार है तो वह एक फूल मां दुर्गा के चरणों पर स्पर्श कर उसे देते हुए बोली कि फूल को बच्चे की तकिया के नीचे रख दे वह ठीक हो जाएगा।
किसी को कहा कि पति के हाथ एक लौंग  छुआकर ले आए। किसी औरत ने कहा कि उसका पति उसकी बात एकदम नहीं सुनता,उसे खूब डांटता पीटता है, मुन्नी बाई ने एक चम्मच चीनी मंत्र फूंक कर पुड़िया में देकर बोली कि उसे पति की तकिया के नीचे रात को रख दें फिर सुबह चाय में मिला दें ।
मुन्नी बाई अब हर समय गेरुआ वस्त्र ही धारण करने लगी । चलते फिरते दुर्गा स्तुति या हनुमान चालीसा पढ़ती।
भक्तों की संख्या लगातार बढ़ती गई। कमरे के सामने हमेशा जमावड़ा बना रहता। एसोसिएशन के अध्यक्ष को यह पसंद नहीं था किन्तु बात धर्म की होने के कारण खुद कुछ कहना उचित नहीं समझे। उन्होंने इस संबंध में एक मीटिंग बुलाकर अपनी बात रखी।
मीटिंग में अधिकांश लोगों ने अध्यक्ष की बात पर सहमति जताई। एक ने सुझाव दिया कि उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए, पीछे बस्ती से कोई मिल जाएगा। इस पर अध्यक्ष ने कहा कि अब वह सामान्य महिला नहीं रहीं, यहां से निकाल देने पर काफी उत्तेजना फैलेगी, पार्क में आने वाले सभी लोग बहुत नाराज़ होंगे।
तीन सदस्यों ने कहा कि वे मुन्नी माई के भक्त हैं, उनलोगो ने कहा कि मंगलवार और शनिवार पार्क बंद होने के बाद वे अपने घरों में सुंदर काण्ड, हनुमान चालीसा पाठ रखेंगे, जो लोग माई से आशीर्वाद लेना चाहते वे पार्क के बजाए उन्हीके घरों पर मिल सकते हैं। इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से मान लिया गया था।
         पार्क वाली मुन्नी बाई अब बन गई साध्वी मुन्नी बाई । मुन्नी बाई को प्राप्त दैवीय शक्ति की ख़बर पूरे शहर में फ़ैल गई। पढ़ें-लिखे लोग आते, धनी लोग आए, नेता लोग भी आए, मठ और आश्रम से कुछ साधु भी आए। 
सबकुछ ठीक ही चल रहा था फिर बिना किसी से कुछ कहे मुन्नी बाई पार्क छोड़ कर चली गई। यह सुबह तब पर चला जब बूढ़े लोग सुबह-सुबह पार्क पहुंचे।
अविनाश बाबू से पूछे जाने से वे बता नहीं सके थे मुन्नी बाई के घर का पता। यह भी नहीं बता पाए कि किसने उनसे अनुरोध किया था काम पर रखने के लिए। सिवाय अपने कपड़ों के कुछ भी नहीं ले गयी थी।
लगभग तीन हफ़्ते बीत गए कहानी को लिखते हुए, कहानी लेखन समाप्त होते होते पता चला है कि मुन्नी बाई को मंत्री मंडल में शामिल किया गया है।
( 'कहानी कहानियां पार्क की'' के अंतर्गत 18/03/2023 से शुरू 20/04/2023को खत्म हुआ)
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© सुभाषचंद्र गांगुली  31/03/2023

Friday, March 3, 2023

डूबता सूरज



           एक दिन कार्यालय का एक कर्मचारी पर्दा हटाकर ' में आई कम इन ?' कह कर सहसा कमरे में दाखिल हुआ। मैंने दीवार की ओर रखी विजिटर्स कुर्सियों की ओर संकेत देकर बैठने को कहा , फिर पूछा - 'बोलिए !'
उसने कहा -' सर यह जानना था कि आपको मेरे पिताजी की चिट्ठी मिल गई है या नहीं ?'
-' किस सम्बन्ध में ? फंड या पेंशन ?'
- ' यह सब नहीं सर, कुछ और होगा। मेरे पिताजी आपको या आपके पिताजी को जानते रहें होंगे ।'
- 'अच्छा बोलिए काम क्या है ?'
-'सर मेरे पिताजी का देहान्त हो गया है। कानपुर में बहन के ससुराल में तीन साल से थे। उन्होंने कभी आपके नाम एक पत्र लिखा था । पिताजी ने जब बिस्तर पकड़ लिया था, बहन के हाथ वह पत्र लगा , पिताजी से पूछने पर उन्होंने कहा कि वे पोस्ट करना भूल गए थे, वह बहुत जरूरी लेटर है, उसके बाद पिताजी ने बहन को याद भी दिलाया था किन्तु लिफ़ाफ़े पर आपका नाम, पदनाम, कार्यालय का अधूरा पता था । बहन ने मुझसे आपके घर का पता मांगा था, मैंने कलेक्ट कर भेज दिया था । लगभग एक महीना हो गया है। बहन ने मुझसे  पता करने को कहा कि आपको पत्र मिल गया है या नहीं ।'
- ' नहीं । कोई लेटर नहीं मिला। नाऊ यू में गो। '
                बड़ा अचरज लगा कि उसके पिताजी को कौन सा जरूरी काम था! किस वज़ह से पत्र लिखे होंगे। ऐसा क्या कि बेटे को भी मालूम नहीं था। वह बोला , चला गया, बाद ख़त्म।
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               महीनों बाद दीपावली से पूर्व घर की सफ़ई चल रही थी, मैं अपनी पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों  को अरेंज कर रहा था, तभी मेरे हाथ एक लिफ़ाफ़ा लगा जिसे खोला ही नहीं गया था। पत्र बांग्ला में था जिसका  अनुवाद --' महाशय, आपका रजिस्टर्ड लिफ़ाफ़ा मिल गया था। फ़ॉर्म जमा करने के तीन महीने बाद मुझे पेमेंट भी मिल गया था। आपका आभार। आप खूब उन्नति करें, सुखी रहें। एक पिता का आशीर्वाद ग्रहण करिएगा। पत्र का उत्तर देने की जरूरत नहीं।'
पत्र में न नाम और न ही ठिकाना था।
बड़ी हैरानी हुई। कुछ समझ में नहीं आया। तरह- तरह के कयास लगाने लगा। शायद इसी पत्र की जानकारी लेने आया था वह कर्मचारी । बहुत माथापच्ची के बाद याद आ गया एक वाक़या ।
उन दिनों मैं अस्वस्थ था । इलाज चल रहा था। रीढ़ की हड्डी का एक्सरे कराने सुबह-सुबह मैं 'कमला नेहरू अस्पताल ' पहुंचा था । कुछ लोग मेरे आने से पहले से ही डटे हुए थे। आठ बजे से काम शुरू होने वाला था। 
जिन्हें आठ नम्बर मिला था वे क़रीब अस्सी वर्ष के बुजुर्ग थे, स्मार्ट, आकर्षक। मेरे पास आकर बैठ गए। वे थोड़ी-थोड़ी देर बाद एक्सरे क्लिनिक में झांकते या फिर अस्पताल के कार्यालय में जाते, फिर वापस आकर अपनी जगह बैठ जाते। 
उनकी बेचैनी देख मैंने उनसे कहा -' चार नम्बर चल रहा है, अभी देर है। आप चाहें तो मेरे टर्न पर चले जाइएगा । मुझे सात नम्बर का टोकन मिला है। '
अब वे थोड़े इत्मिनान से मुझसे बात करने लगे।
' आप कहां के बंगाली हैं ? पूर्व बंगाल या पश्चिम बंगाल के ? 
- 'पता नहीं कहां का। मैं इलाहाबादी हूं। जन्म, शिक्षा, नौकरी सब यहीं।'
-' बांग्ला समझते हैं ? प्रवासी बंगाली तो बांग्ला से दूर हो गये हैं।'
-' जी। बांग्ला जानता हूं। अच्छी तरह। बांग्ला साहित्य भी खूब पढ़ा। किन्तु मैं पक्का इलाहाबादी हूं । हिन्दी जुबान पर पहले आती है मातृ भाषा की तरह।'
-'देश विभाजन के बारे में जानते हैं?' 
'-थोड़ा बहुत।'
-' मैं पूर्वी बंगाल का हूं। ' बांगाल' कहते हैं लोग।चट्टोग्राम का नाम तो जानते ही होंगे। वहीं का हूं। पार्टिशन के समय आया था रिफ्यूजी बन कर। ....... कठिन समय था । बहुत बड़ी आफ़त थी। चारों ओर लूटपाट आगजनी ।  अभूतपूर्व भगदड़ मची थी। हम पागलों की तरह दौड़ रहे थे घर दुआर छोड़ कर, कहां जा रहे थे पता न था, रास्ते में लोग छूट रहे थे, मर रहे थे। 
चट्टोग्राम, फरितपुर,बरिशाल,नोआखालि सब जल रहा था। गांधी जी बार बार शांति की अपील कर रहे थे, अब इतना उन्माद फैल चुका था कि उन्हें कोई सुनने वाला नहीं था। गांधी नोआखली में अनशन पर बैठ गए थे।
 पन्द्रह-सोलह लाख लोग मर गए थे। दो-ढाई करोड़ लोग  बेघर हो गए थे। शरणार्थियों को जगह-जगह स्थापित किया गया था, रिफ्यूजी कॉलोनियां बनाईं गई, लोगों को सरकारी नौकरियों  में रखा गया, गैर सरकारी नौकरियां भी मिलीं। फिर भी अनेक लोग संघर्षरत रहें, आज भी विस्थापित होने का दर्द झेल रहे हैं। '
-' छोड़िए जो होना था हो गया। अतीत लेकर पड़े रहने से कोई आगे नहीं बढ़ सकता।'
क्लिनिक से एक आदमी बाहर आकर बोला- 'टोकन नंबर सिक्स।'
अचानक वह बृद्ध उठ खड़े हुए। 
मैंने उनसे कहा - 'अभी नहीं। इसके बाद चले जाइएगा।'
मुझे अनसुनी कर वह आगे बढ़ गयें । नंबर बोलने वाला भीतर जा चुका था, तब भी वह बृद्ध भीतर झांक कर तुरन्त निकल आयें, फिर अस्पताल के भीतर झांककर लौट आएं ।
 बड़े गुस्से से बोलें -' एक तो लोग टाइम से नहीं आते फ़िर कुछ पूछो तो सीधे मुंह बात नहीं करते । मदद करना दूर उल्टे परेशान करते। लाटसाहेब हैं सब लाटसाहेब हैं। क्या दिन आ गए.... हमारे समय तो.....'
-' क्या हुआ कोई ख़ास प्रॉब्लम?'
उन्होंने जोश में कहा - ' हमारे समय कितना डिसिप्लिन था, लोग पंचुअल और रिस्पांसिबल थै। अब कौन किससे कहेगा, किस मुंह से कहेगा, वे भी तो उसी रंग में रंग गए हैं।' 
मैने बात काट कर कहा- 'ऐसी बात नहीं है, दो चार प्रतिशत हो सकते हैं किन्तु अधिकतर लोग हाथ पर हाथ धरे रहते हैं, डिमाक्रेसी जो है , चले न जायेंगे बाबू लोग किसी नेता को बुलाने, माइनारिटी कमीशन,एस सी एस टी कमीशन,किसी न किसी को शिकायत कर देंगे, कम्यूनल, कास्ट कोई चार्ज लगा देंगे, टोटल सिस्टम फेल।'
उनके अनर्गल प्रलाप से ऊब कर मैंने उनसे कहा-'अभी आपका नम्बर आएगा, शांति से बैठिए यहां। मैं भी सिस्टम का पुर्जा हूं, इसी सिस्टम में रहकर काम करना और काम करवाना पड़ता है, आपका कोई काम हो तो बताइए।'
-' में पेंशनर हूं, थोड़ी सी पेंशन मिलती है उसी मे से कुछ खर्च कर मेडिकल टेस्ट कराया, रुपया पाने के लिए मेडिकल क्लेम करना पड़ेगा मेडिकल क्लेम के लिए फार्म चाहिए जिसके लिए दर-दर भटक रहा हूं। '
--' यहां नहीं मिलेगा, सीजीएच डिस्पेंसरी में मिलेगा, वैसे मेरे कार्यालय में भी मिलता है।'
-'आप किस कार्यालय में हैं?'
-' आडिट आफिस में '
- 'वहीं तो मेरा बेटा है '।
-' क्या नाम है उसका ?'
ख़ामोश हो गये थे थोड़ी देर के लिए। फिर एक रुपए का सिक्का मेरे हाथ में रख कर बोलें-'मै अपने घर का पता लिख देता हूं, लिफ़ाफ़े में फ़ार्म भर कर कांइडलि भेज दीजिएगा।'
हालांकि मैं उनके चेहरे से जान गया था कि उनके साथ उनके बेटे का सम्बन्ध स्वाभाविक नहीं था फिर भी मेरे मुंह से अनचाहे ही निकल गया  ' आपके बेटे का नाम बताइए मैं उसे दे दूंगा।'
उनका चेहरा तमतमा उठा। कानों की बगल की नसें केंचुए जैसे चलने लगें।
 वे बोलें - 'तो फिर मैं आपसे क्यों कहता ? आप अगर भेज सकते तो बताइए मैं घर का पता लिख दूंगा।'
-' प्लीज़ नाराज़ न होइए, घर का पता लिख दीजिए, मैं भेज दूंगा ।'
अपने जेब से नोटबुक निकाल कर पता लिखकर कागज़ का टुकड़ा मुझे दे दिया और एक रुपए सिक्के को मेरे जेब में डाल दिया। सिक्के को मैं लौटाना चाहता था किन्तु उनकी हालत देख मैंने चुप रहना उचित समझा।
इतने में एक्सरे क्लिनिक से वही सहायक निकल कर जोर से बोला -' सात नम्बर ! सात नम्बर !'
मैंने उनसे कहा - ' आप जाइए! '
वह उठ खड़े हुए,चार कदम आगे चलकर फिर पलट कर देखा, आंखों की कोर हल्की गिली थी किन्तु चेहरे पर गम भरी मुस्कान, मेरे निकट आकर से बोलें -' डूबते सूरज को कौन पूजता ?'

 © सुभाषचंद्र गांगुली 
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* Published in October -December issue 1996 'दस्तक ' बहादुरगढ़, हरियाणा, सम्पादक - सूरत सिंह
* Re-written 29/2/2023--3/3/2023

Sunday, February 12, 2023

हस्ताक्षर का मूल्य


       
दफ़्तर से घर लौटते समय ' लुम्बिनी' हास्पिटल के सामने कम्पनीबाग के ॲपोजिट फुटपाथ पर लगी पुरानी किताबों को देख कर मैं चकित हुआ। स्कूटर खड़ी कर किताबें देखते-देखते मैंने पूछा - " यहां कब से दुकान लगाने लगे ? मैं तो तुम्हें वहीं सिविल लाइंस में ढूंढ रहा था बार-बार। इस अस्पताल के सामने बिकती भी है ?"
- " छः महीने से यहीं पर है। खूब बिकती है। इस अस्पताल के भीतर ट्रांजिस्टर, टीवी कुछ भी नहीं चला सकते। जिन्हें  कई-कई दिन ठहरना पड़ता है और जो मरीज़ पढ़ने की स्थिति में रहते हैं उनके लिए भी किताबें जाती हैं। "
- " सच ! जो लोग ठहरते हैं वे पढ़ते भी हैं ?"
-" क्यों नहीं। इस अस्पताल में मामूली लोग थोड़े ना आते हैं। यहां के रेट्स शायद सबसे हाई हैं, यहां सिर्फ़ हैसियत वाले और पढ़ें लिखे लोग आते हैं , वैसे तो अब पढ़े-लिखे लोग भी दूर होते जा रहे हैं। जब भी फ़ुर्सत मिले तो टीवी पर नज़र गड़ाए रहते हैं किन्तु यहां किताब पढ़ना उनकी मजबूरी हो जाती है । "
-"तुम यहां किताब केवल किराये पर देते हो या बेचते भी हो ?"
-" किराये पर क्यों दूं? एक किताब के लिए पचास पैसे या एक रुपया रोज़ से ज़्यादा कोई देना नहीं चाहता। क्या फ़ायदा जब पेट नहीं भरेगा उस तरह से। खरीदने वाले बड़े शौक से खरीद कर ले जाते हैं फ़िर अस्पताल छोड़ते समय हमें हाफ रेट पर बेच जाते हैं, जैसे नहान के अवसर पर एक गाय दिन में सौ-सौ बार बिक कर दान में चढ़ जाती है वैसे ही एक-एक किताब भी महीने में अनेक बार बिक जाती है।"
- " वाह भाई वाह ! क्या दिमाग है उस्ताद !‌‌
हम चलते हैं, हम तो किराये पर लेना चाहते थे। बराबर किराये पर ही लेता रहा।"
-" आप चाहेंगे तो भाड़े पर ही दे दूंगा, आखि़र आप  हमारे पुराने कस्टमर हैं ...... कौन सी किताब लेंगे सर ?" 
--" देखता हूं...... यह कितने में ‌‌‌बेचोगे ? "
- "पचास रुपए में ।"
-" पचास रुपए !!"
- " बाबूजी यह बहुत मशहूर उपन्यास है, इसकी कीमत इस समय चार सौ रुपए हैं। "
--" तुम्हें कैसे पता कि बड़ा अच्छा उपन्यास है और इस समय चार सौ की है। पढ़े थे किताब क्या ?"
-" अरे सर आप भी ख़ूब मज़ाक कर लेते है। मैं तो बस नाम-वाम पढ़ लेता हूं। बाबूजी इतनी जानकारी तो रखनी ही पड़ती है वर्ना धंधा कैसे करेंगे।"
-" मगर किताब तो काफ़ी पुरानी है, उस समय बारह रुपए की थी।"
-" उससे क्या? आज अगर आप इसे खरीदें तो आपको चारसौ देना होगा। "
- " लाओ देखें।"
किताब हाथ में लेकर जिल्द खोलते ही में दंग रह गया। उपन्यासकार ने अपने कर कमलों से         " सादर सप्रेम " लिख कर एक मशहूर साहित्यकार को भेंट किया था । आज की तारीख़ में भेंटकर्ता सिर्फ़ मशहूर ही नहीं बल्कि साहित्य के अभिन्न अंग हैं।
मुझे यह सोचकर हैरानी हुई कि जिस साहित्यकार को वह किताब भेंट की गई थी वह अब भी सक्रिय साहित्यकार हैं और वह उपन्यासकार अब इस दुनिया में नहीं हैं, उनके हस्ताक्षर को फुटपाथ पर पड़े रहने देने में मुझे अजीब कष्ट हो रहा था। इससे पहले कि वह पन्ना किसी दिन अलग हो जाए और किसी के जूते के नीचे आ जाए, मैंने उस किताब को पचास रुपए में ही खरीद लिया।

© सुभाषचंद्र गांगुली               
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पत्रिका ' दस्तक ' बहादुरगढ़ -सोनीपत
के नवम्बर 2001 अंक में प्रकाशित।

Saturday, January 28, 2023

कहानी: 'वेब कैम' में देखिए'



मोबाइल की रिंग बजी और भतीजे अविनाश का नाम देख चाचा अतुल कुमार उठ बैठे ।
-'हाँ बच्चा बोलो! '  
-'प्रणाम गुरुजी ।'
-'खुश रहो। शतायु भवः ! कब आ रहे हो ? इतवार को ही पोते के आने की खुशी में डिनर है। सारा बंदोवस्त हो गया है। गाना-बजाना भी रखा है। शहर की जानी-मानी आर्केस्ट्रा पार्टी को बुक किया है... भाई साहब और भाभी भी साथ आ रहे है ना ?'
-'गुरूजी ! वेरी सॉरी, हम लोगों का आना नहीं होगा।" 
-'क्या ???..... इतने सारे लोगों को दावत दे रखी है, सारे इनविटेशन कार्ड्स बँट गए हैं, जिसे जो एडवांस देना था दे चुका हूँ, और तुम कह रहे हो  नहीं आओगे ? ...इंडिया आने से बहुत पहले तुमसे बात कर ली थी, तुम्हारी रज़ामंदी के बाद ही मैंने सारा आयोजन किया है। पिछले हफ़्ते भाभी और भाई साहब से भी बात हुई थी, उन्हें एक-एक बात की जानकारी है। क्या हो गया अचानक? कौन सी आफ़त आ पड़ी है ?'
-' गुरुजी आपकी बहू सीमा इन दिनों मायके में है। वह कह रही थी कि आपका पोता अमन अपने नाना-नानी से ऐसा चिपक गया है कि नाना-नानी उसे छोड़ना नहीं चाह रहे हैं।' 
"भाईसाहब क्या कह रहे हैं?"
-'पापा कह रहे हैं तुम लोगों को क्या करना क्या नहीं करना तुम लोग तय करो, जो उचित लगे वही करो।'
-'और तुम्हें क्या उचित लगा ? यही कि चाचा से वेरी सॉरी कह दो ? यही कि बूढ़े चाचा-चाची के सेंटिमेंटस को पैरों तले रौंद दो ? ऐसा तो तुम्हारा संस्कार न था !.......कोलकाता से पटना है ही कितना दूर ?... रात को ट्रेन में बैठो और सुबह पहुँच जाओ फिर चाहे इतवार को ही रात की गाड़ी पकड़ लो या अगले दिन सुबह की गाड़ी।' 
- 'ऐसा ही प्रोग्राम बनाने के लिए मैंने आपकी बहू से कहा था मगर उसका मूड ही नहीं है। चाचा जी ! आपकी बहू बड़े घर की बेटी है, सारी सुख-सुविधाएँ भोगती आ रही है, उसके पचास नखरें हैं, मैं जोर-ज़बरदस्ती भी नहीं कर सकता...ये लीजिए सीमा आ गयी है, आप ज़रा उसे समझाइए, शायद आपकी बात मान जाए।'

-'चाचा जी प्रणाम ! मैं सीमा।'
-'खुश रहो। सदा सुहागिन रहो ! तुम लोग कब आ रहे हो ?'
 -"चाचा जी, इस बार आना नहीं होगा। अविनाश ने आपसे नहीं कहा था क्या ? मैंने तो पहले ही उसे बता दिया था कि आपको सूचित कर दें। मात्र पंद्रह दिन की छुट्टी बड़ी मुश्किल से मिल पायी है, छह दिन बीत गए हैं। सात साल बाद आयी हूँ । मायके में रहना जरूरी है, यहाँ रिश्तेदारों से भी मिलना हैं, कई जरूरी काम भी है, बच्चे के साथ इतना भागम-भाग मुझसे नहीं हो पाएगा।' 
-'हवाट ! अमेरिका से इंडिया आ सकती हो और कोलकाता से पटना के लिए भागम-भाग ?'
- 'चाचाजी, अमन रो रहा है, मैं इन्हें देती हूँ...'

- 'हाँ अविनाश ! बहू को सुना। तुम्हारा क्या कहना है ?? 
"मेरा मन तो जाने का था मगर...'
- मगर क्या? पंद्रह दिनों में एक दिन भी चाचा-चाची के लिए नहीं निकाल सकते हो?"
-'चाचा जी ! सीमा यह भी कह रही थी कि आपका छोटा सा दो बेडरूम का फ्लैट है, ए0सी0 भी नहीं है, मई की गर्मी एक ही कूलर अमन को तकलीफ़ होगी. ...मात्र एक साल का, बच्चा अभी तक गर्मी नहीं झेली, कहीं फोड़ा-फुंसी निकल आये या लू लग जाए। जरा सोचिए आप ही का पोता है, कहीं सचमुच कुछ हो जाए तो सीमा मेरी जान खा लेगी।'
-'ओ०के०फाइन। मैं तुम लोगों के लिए होटल 'लवकुश' में दो दिन के लिए लक्जरी रूम बुक करा देता हूँ, एक ए0सी0 कार भी तुम्हारे डिस्पोजल में रहेगी, अपने पोते के लिए, इतना करने का दमखम अभी भी इस बूढ़े में है।'
-'चाचा जी, प्रोग्राम तो आपके घर के सामने खुले पार्क में है ना? मई की गर्मी, रात तक गर्म हवा चलती है।'
- 'पचास बहाने बनाते शर्म नहीं आती तुमको ?... जाने कब से पोते की आस में बैठा हुआ हूँ, कुलदीपक को कलेजे से लगाने के लिए मैं व्याकुल हूँ... तुम्हारी चाची की निष्प्राण सी देह में जान आ जाने की एक आख़िरी उम्मीद भी है मेरा कुलदीपक। सम्भव है कि उसे गोद में लेते ही उसकी बंद जुबान में जुम्बिश आ जाए...मुझे कुछ नहीं सुनना है, बहुत बोल चुके हो, यू विल हैव टू कॅम, यह तुम्हारे गुरू का आदेश है। चाचा की बात नहीं माननी है तो न मानो, गुरु आज्ञा पालन करना तुम्हारा धर्म है। हिंदू धर्म में गुरु का क्या स्थान है यह तुम्हें उपनयन संस्कार के समय ही बता दिया गया था, भूल कैसे गये? तुम धर्म पथ पर रहो, गुरू का शतकोटि आशीर्वाद लो। ईश्वर तुम्हारा मंगल करेगा। कुलदीपक को रिसीव करने के लिए मैं स्टेशन में मौजूद रहूंगा।' अतुल कुमार ने फोन काट दिया।
गुरू होने के नाते चाचा अतुल कुमार भतीजे अविनाश पर कुछ ज़्यादा ही अधिकार जताते हैं और अधिकारपूर्वक बातें करते हैं।

                    पटना आने से पहले अविनाश के पिता और चाचा दोनों के परिवार एक ही मकान में एक साथ वर्षों रहे हैं। अविनाश का जन्म-कर्म सब कुछ चाचा की आँखों के सामने हुआ। विज्ञान के अध्यापक अतुल कुमार ने अविनाश को बचपन से इंटरमीडिएट तक नियमित गणित और विज्ञान विषयों को पढ़ाया, उसे इंजीनियर बनने के योग्य बनाया। उपनयन संस्कार में मंत्र देने के कारण अविनाश उन्हें 'गुरुजी' का सम्बोधन देता है। 
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गुरू होने के नाते चाचा ने अविनाश को अपनी संतान से कमतर कभी नहीं देखा।

            अतुल कुमार चार भाई हैं। चारों भाइयों के बीच अविनाश के पिता के ही दो बेटे हैं बाकी सभी की बेटियाँ है। बेटियाँ अपने-अपने ससुराल में हैं। अविनाश का भाई जो अविनाश से दस वर्ष का बड़ा है पिछले बीस वर्षों से अमेरिका में रह रहा है। उसकी एक ही बेटी है।

जब से अविनाश के घर बेटा जन्मा वह बच्चा अविनाश के ताऊ, चाचा, पिता सभी के आँखों का तारा बन गया। किंतु कुलदीपक अमन के आने की सबसे अधिक खुशी शायद चाचा की हुई है और अविनाश इस बात से अनभिज्ञ नहीं है।

पोते की जन्म की ख़बर पाकर महीने भर बाद अतुल कुमार ने 'अखण्ड रामायण पाठ करवाया, अपार्टमेंट में एक-एक घर जाकर मिठाइयाँ बाँटी मिठाइयाँ देते हुए उन सबों से कहा- "भगवान ने मेरी प्रार्थना सुन ली है, मेरा बेटा तो लौट नहीं सकता मगर भगवान ने मुझे मेरा पोता लौटा दिया है। आप लोग मेरे कुलदीपक को आशीर्वचन दीजिए, उसकी दीर्घायु की कामना करिए।'

महीनों से वे कहते रहे 'पोता आने वाला है। दादा-दादी से मिलने के लिए वह अमेरिका से आ रहा है। उसके आने पर हम खुशियाँ बांटेंगे, भव्य पार्टी देंगे बातें करते-करते खुशी के मारे उनकी आँखें भर आती, कंठ रूंध जाता।

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               अतुल जी का अपना एक बेटा था। बेटे की शादी के दो वर्ष बाद बहू ने पुत्र जन्म देकर खुशियाँ भी झोली में डाली थीं। पुत्र जन्म के एक महीने बाद मायके से लौट कर पोते को दादी की गोद में डालते हुए उसने बड़े दम्भ से कहा था- 'भगवान के लिए अब आप मेरे माता-पिता को कोसना छोड़ दीजिए। मेरे पिता जी मुँह माँगा दहेज तो न दे सके थे पर मैंने मांगी गयी दहेज को सूद समेत लौटा दिया है। मैं पराये घर की बेटी हूँ। यह लड़का तो आपके खानदान का है, सिर्फ़ इस कुल का । आपका वंशज ।

            मगर वंशज प्राप्ति का सुख अतुल कुमार के नसीब में न था । जब वह बच्चा तीन माह का था अतुल कुमार का बेटा अपनी साली की शादी में सपरिवार मीदनापुर गया हुआ था, वापसी में माओवादी हमले में उसकी बस चिथड़ी हो गयी थी, कोई भी न बचा था।
वह हादसा एक ऐसा बज्रपात था कि उसने अतुल कुमार की पत्नी के अस्तित्व को ही हिला कर रख दिया था। काफ़ी दिनों तक वह रोती-बिलखती बहू की बातों को दुहराती वह चीख उठतीं यह तुमने कैसा बदला लिया ? तुम कहती तो तुम्हारे पैरों पर मत्था टेककर माफ़ी मांग लेती। धीरे-धीरे उसकी दुर्बल देह निस्तेज, निष्क्रिय होती चली गई। एक दिन उन्हें तेज बुखार चढ़ा, दिमागी बुखार था। इलाज से बुखार तो उतर गया था किंतु उसकी जुबान हमेशा के लिए बंद हो गयी थी। एलोपैथी, होमियोपैथी, नैचुरोपैथी, वेद-हकीम, तंत्र-मंत्र, मंदिर-गिरजा सभी दुकानें सजी की सजी रह गयीं।

बेजान दीवारों को देखते और पत्नी का निरीह सा चेहरा और शब्दों भरी आँखों को निहारते हुए अतुल कुमार के जीवन के बीस वर्ष बीत गए थे।
पत्नी की दुर्दशा के लिए अतुल कुमार ख़ुद को कोसते हुए कहते हैं-प्रायः मैं उसे बेवज़ह डाँट कर कहता था क्या चपर-चपर करती रहती हो, जब देखो फ़ालतू  बकवक, इतनी बातूनी कि कान पक जाते है। अनावश्यक चिल्लाती रहती हो, धीरे से भी तो बोला जा सकता है। और वह नाराज़ होकर कहा करती आपको मालूम तो है मैं ऊँचा सुनती हूँ, आप चुप रहते हैं तो मुझे लगता आपने सुना ही नहीं, इसलिए जोर से बोलना पड़ता है...मेरे दोनों कान तरस गए हैं उसकी बोली सुनने के लिए एक चलती-फिरती लाश बन गयी है वह... पहले पता रहता तो उसकी आवाज़ टेप करके रख लेता, कितना अच्छा कंठ था उसका, कितना सुंदर गाना गाती थी, मैं अभागा उसके गाने की कदर न कर सका। मुझे प्रायश्चित करना ही था, सो कर रहा हूँ...फिर भी मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी है।'

अतुल कुमार की दर्द भरी दास्तान सुनने की आदी बन चुका था मैं। मार्निंग वाक् में हम दोनों साथ-साथ होते। उनके पास कहने के लिए एक ही कहानी थी। और मुझे मालूम था कि मुझे एक ही कहानी सुननी है फिर भी मैं सुनता क्योंकि मुझे यकीन था कि उसी से उनका जीवन गतिशील बना रहेगा।

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दो दिन बाद अतुल कुमार ने अविनाश को फोन मिलाया- -' हैलो ! अविनाश स्पीकिंग'...
-'चाचा बोल रहा हूं । परसो इतवार है। कब आ रहे हो ? किस गाड़ी से? '
- ' वेरी सॉरी, चाचा जी आपसे तो कह दिया था कि सम्भव नहीं है।' 
-"अरे! मैंने जो इतना सारा इंतज़ाम कर रखा है...'
-'बटन दबाइए मना कर दीजिए, और क्या करना? लोकल मामला ही तो है... बल्कि आप ऐसा करिए कि पटना लोकल न्यूज पेपर या 'विविध भारती' में विज्ञापन दे दीजिए कि विशेष कारणवश प्रोग्राम कैंसिल करना पड़ रहा है । आजकल कोई बुरा-उरा नहीं मानता बल्कि दावत-सावत एवैड करते हैं। टाइम ही किसके पास है, अधिकतर लोग लिफ़ाफ़ा में 'व्यवहार' भेजकर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा देते हैं।'
-'चलो वह मेरी समस्या है। मैं देखूंगा क्या करना, क्या नहीं करना... मगर यह बताओ शिष्य, क्या पोता देखने का मेरा सपना अधूरा रह जायेगा ?" 
-‘अगली मर्तबा आऊँगा तो जरूर मिलूँगा या फिर पहले से ख़बर कर दूँगा आपलोग यहीं आ जाइएगा।'
-'अगली मर्तबा ? शादी करके तुम चले गये फिर अब आये हो सात वर्ष बाद और तुम्हारा बड़ा भाई, शादी करके गया तो गया, अठ्ठारह वर्ष बीत गए।' 
-"नहीं चाचाजी, यहाँ माता-पिता है, आना तो होगा ही।
"कल क्या होगा किसने जाना ! अस्सी के क़रीब पहुँच रहा हूँ, पचास ठो रोग है, आँखों की रोशनी लगभग जा चुकी है और तुम्हारी चाची मुझसे पाँच साल की छोटी, पर लगती है मुझसे दस साल बड़ी... खैर ! कर ही क्या सकता हूँ, सब प्रभु की मर्जी । पोते का दर्शन हो जाता तो मन तृप्त हो जाता।'
-'अरे! अभी तक आपने पोते का दर्शन नहीं किया?'
-"क्या? क्या बोला?"
'फेसबुक' 'हवाटस ऐप पर पोते के सैकड़ों फोटो मैंने लगा रखा है, आप भी अपना एक प्रोफाइल बना लीजिए या फिर आप अपना 'मेल आइडी' बताइए मैं 'ई-मेल' कर दूंगा। आपके पास तो कम्प्यूटर होगा ही, नेट का कनेक्शन भी होगा।'
-'न मेरे पास कम्प्यूटर है और ना ही मुझे उसका ज्ञान है... और फिर जिसे कभी नहीं देखा उसका फोटो देखकर मन भी तो नहीं भरेगा....एक बार आ जाते मैं अपने लाल को देख लेता... तुमने गुरु आज्ञा भी नहीं माना...।'
-'चाचाजी, बुरा न मानिएगा, मेरे पापा मुझ पर इतना दबाव नहीं डालते जितना आप डाल रहे हैं...पापा तो 'फेस बुक' में फोटो देखकर मस्त रहते हैं। 
-"तुम्हारे पापा अमन के पैदा होने से पहले तुम्हारे पास चले गये थे, तीन महीने पहले ही लौटे हैं, पोते को दिन-ब-दिन बड़े होते देखे, उसे गोद में खिलाये, वे तो बिना फोटो देखे ही पोते को मन-मस्तिष्क में महसूस कर सकते हैं, मगर जरा मेरे बारे में सोचो मैंने उसे कभी नहीं देखा, उसका फोटो और किसी बच्चे का फोटो मेरे लिए एक बराबर, है कि नहीं?... आख़िर तुमने गुरू, की बात भी नहीं मानी... आई एम वेरी सॉरी माई सन। शायद मेरी ही गलती थी, मैं कुछ ज़्यादा ही 'गुरु दक्षिणा' पाने की उम्मीद कर रहा था।'
-'गुरू जी, प्लीज नाराज़ न होइए मै अमेरिका पहुँचकर आपको फोन करूंगा, टाइम बता दूंगा, आप किसी 'साइबर कैफे' में चले जाइएगा, मैं अमन को आपसे मिला दूंगा। उसे आप 'वेब कैम' में देखिएगा चलता-फिरता, जीता-जागता, शरारत करता हुआ, तुतलाता हुआ हर हरकत की झलक आप देख पायेंगे, आप उसे जी भर देखिएगा, जी भर बातें करिएगा।'
-"तुमने मेरे सारे अरमानों पर पानी फेर दिया, माठा कर दिया। होपलेस !'
-"पता नहीं क्यों आजकल के बूढ़े चीजों को समझना नहीं चाहते, खामख़ाह सेंटिमेंटल हो जाते हैं, वही घिसी-पिटी बातें, वही दकियानूसी सोच... पता नहीं मैंने क्या माठा कर दिया, बेवज़ह तिल का ताड़ बना रहे हैं। बी प्रैक्टिकल, लिव विद द टाइम चाचाजी ! लाइफ़ इज मूविंग वेरी फ़ास्ट़ मैंने कहा ना आपको अमन को देखने की इतनी इच्छा है तो 'वेब कैम' में देखिए।' 
अतुल कुमार की आँखों से आँसू बहने लगे, दिल की धड़कने तेज हो गयी, गला भर आया।

             शायद अविनाश ने फोन काट दिया था। आगे बोलने और सुनने के लिए कुछ शेष न था । मगर थरथराते होठों से अतुल कुमार अपनी बातें फोन पर मुँह लगाये कहते गये- 'मैं तुझे कैसे समझाऊँ दूधमुँहे पोते को इन बूढ़े हाथों में लेकर सीने से लगाकर कैसी सुखानुभूति होती है, पता नहीं कोई मुझसे ज्यादा पढ़ा-लिखा विद्वान आदमी या कोई कवि उस अनुभूति को शब्दों में कैद कर पाया है या नहीं, मैं तो इतना ही जानता हूँ कि दूध मुँह पोते के गालों में गाल लगाकर उसकी देह-गंध को जेहन में एक बार उतार लेता तो मेरे जर्जर क्षीण शरीर में एक दैविक ऊर्जा संचारित हो जाती... कुलदीपक का वह कोमल पावन स्पर्श मेरी अंतिम सांस तक मेरे अंतरमन में बना रहता...रुको रुको मेरी पत्नी को शायद दूसरा सदमा पहुँचा है, उसकी आँखों की पुतलियों कुछ क्षणों से स्थिर देख रहा हूँ..।' 

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© सुभाष चंद्र गाँगुली 
( "मोक्षदायिनी" कहानी संग्रह से, प्रथम संस्करण: 2021)
* ' साहित्य भारती ' उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की पत्रिका में 2011 में प्रकाशित।
'वैब कैम में देखिये' में  सुख, सुविधा ने सहजता को कितना बेदखल कर दिया है चाचा जो गुरु भी है, दुर्घटना में अपना सब कुछ खो चुके हैं और जीवन की इस रिक्तता को अमरीका में रह रहे भतीजे के बेटे  की साल गिरह अपने घर पर  मनाकर भरना चाहते है, उस पोते को हाथ से छूकर, गोद में बिठाकर जिस खुशी को पाना चाहते हैं उसे घर छोटा, समय नहीं है, पत्नी को मायके भी जाना है आदि अनर्गल कारण बताकर सारे आयोजन को ख़त्म कर देना, चाचा के प्रेम, पढाना लिखाना सब भूल जाना,उनके आग्रह पूर्ण निवेदन तक को अस्वीकार कर जन्मदिन को वैब कैमरा में देखने की बात कहकर मनोभावों पर आधात करता है ।
प्रोफेसर सुनीता त्यागी
( रिटायर्ड )
पीजी कॉलेज, बिजनौर 



Thursday, January 12, 2023

कहानी : बनवारी जीत गया


वकील ने जब बनवारी से कहा कि उच्च न्यायालय ने उसके पक्ष में निर्णय सुनाया है, पाँच-सात दिन में जजमेन्ट की कापी मिल जाएगी, फिर आदेश की कापी लेकर वह दफ्तर जाकर ड्यूटी ज्वाइन करें तो वह खुशी से झूम उठा। 'बनवारी जीत गया' 'बनवारी जीत गया' बोलकर घर में बच्चों जैसा चिल्लाने लगा। मिन्नत पर रखी हुई दाढ़ी बनवाकर गंगा नदी में बहाया, गंगा किनारे स्थित लेटे हनुमान जी के मन्दिर पर ग्यारह किलो लड्डू चढ़ाकर प्रसाद बाँटा। वकील साहब के घर भी एक किलो लड्डू दे आया। दो दिन बाद पति-पत्नी ने सत्यनारायण की कथा सुनी।

मगर उसकी सारी खुशी तब गम में तब्दील हो गयी जब वह अदालत का अंग्रेजी में दिया गया चार पेज का आदेश लेकर वकील के घर पहुँचा। बहुत देर तक आदेश पढ़ने के बाद वकील ने कहा कि जजमेन्ट में यह लिखा हुआ है कि दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुँची है कि बनवारी के आचरण में कोई दोष अवश्य रहा होगा तभी उसे नौकरी से निकाल दिया गया था किन्तु उसे उसके दोषों से अवगत नहीं कराया गया था और न ही सुधरने का अवसर दिया गया था। जो कि 'नैसर्गिक न्याय' के विरूद्ध था। इसलिए अदालत ने यह राय जाहिर की है कि बनवारी को अभी भी अवसर प्रदान किया जा सकता है। कोर्ट के आदेश के मुताबिक प्रशासन बनवारी को दुबारा काम पर रख कर परख सकता है कि इस समय वह नौकरी में रखने योग्य है या नहीं।

वकील की बात सुनकर बनवारी चीख उठा- 'क्या ? शुरू से शुरू ? सात साल की सर्विस बेकार? इतने बरस बेकार ? छियालिस की उम्र में फिर से कैजुअल लेबर ?. ..मुझसे सारे जूनियर रेगुलर हो गये, कई पढ़े-लिखे लड़के बाबू बन गए और मैं... यह कैसा आदेश ? यह कैसा इन्साफ वकील साहब ?... इस दो टूक फैसले के लिए बारह वर्ष लग गए ?... छह साल फालतू ट्रिबुनल में पड़ा रहा, छह साल यहाँ। तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख। जब देखिए सरकारी वकील गायब रहते। मुश्किल से तारीखें लगती, उसके लिए भी रूपए देने पड़ते, आप भी अर्जी लगा देते थे बार-बार आपने मेरी लाइफ चौपट कर दी है। मुझे झूठा दिलासा देते रहे, रूपए ऐंठते रहें। मैं तो बर्बाद हो गया हूँ। बुढ़ापे के लिए कुछ रूपए पिताजी ने बचा कर रखा था, वो भी पाई-पाई निकल गया। मुकदमें के चक्कर में मेरे बच्चे अनपढ़ रह गये। आपको पहले बता देना चाहिए था कि मुकदमें में दम नहीं है।'

बनवारी ने अपना आपा खो दिया। वह अनर्गल बकने लगा। चीखने चिल्लाने लगा। वकील साहब के बेटे और दो अन्य लोगों ने उसे यह कहते हुए घर से निकाल दिया- 'ऑर्डर लेकर दफ्तर जाओ देखो क्या होता है। तुम्हारा भला ही होगा। तुम जीत गये हो। ठंडे दिमाग से काम लो।'

घर लौट कर बनवारी गुमसुम बैठा रहा। न कुछ खाया-पीया, न किसी से बातचीत की। शाम से रात, रात से भोर। बनवारी बिड़बड़ाता रहा, कभी घर के भीतर और कभी घर के बाहर चबूतरे पर लेटता। भोर होते-होते वह घर से निकल गया किसी से कुछ कहे बिना ।

दिनभर की इंतज़ारी के बाद जब शाम तक बनवारी घर नहीं लौटा तो उसके पास पड़ोस के दो-चार लोग तथा परिवार के सभी उसे ढूँढ़ने के लिए निकल पड़े। 

* * *

अपने भाई बहनों में वह अकेला ग्रेजुएट था। पढ़ाई में ठीक-ठाक था। किन्तु बी0ए0 पास करने के बाद तमाम प्रयासों के बाद भी तीन साल तक जब कोई नौकरी नहीं जुटा पाया तब मोटरकार ड्राइविंग सीख कर गाड़ी चलाने लगा। अपना काम और अपनी कमाई से उसने समझौता कर लिया था। जब कभी ज़्यादा पैसों की ज़रूरत होती तो वह दूर का सफर पकड़ लेता।

महीनों बाद बनवारी के पिता ने एक सरकारी दफ्तर के बड़ेबाबू के मार्फत दैनिक मजूरी के आधार पर दफ्तर की गाड़ी चलाने का काम ढूँढ़ निकाला और बनवारी को ज्वाइन करवाया। यही था बनवारी के जीवन का टर्निंग पाइन्ट । संघर्ष की शुरूआत।

कैजुअल लेबर बनने के बाद उसकी आमदनी आधी हो गई। बीबी बच्चों की जरूरतें पूरी नहीं कर पाता। एक दिन उसने नौकरी छोड़ने का मन बना लिया किन्तु उसके पिता ने उसे रोका। उन्होंने समझाया कि तीन-चार साल काम करने के बाद उसकी सेवा नियमित हो जाएगी, पढ़ा लिखा होने के कारण वह आगे चलकर बाबू, बड़ा बाबू बन जाएगा, विभागीय इम्तहान पास कर लेने पर अधिकारी तक बन सकता है। कई ऐसे लोगों के नाम गिनाते हुए उन्होंने कहा कि सरकारी नौकरी तो मिलने से रहा, पीछे के रास्ते से नौकरी पाने का यही एक उपाय है। उन्होंने समझाया कि सारी सुख सुविधाएँ, पदोन्नति, पेंशन सब कुछ हासिल करने के एवज में चार-पाँच साल की तंगी, तकलीफ क्या मायने रखती। बनवारी को बात समझ में आ गयी और उसने वही नौकरी जारी रखी।

सात वर्ष कैजुअल लेबर की हैसियत से काम करने के बाद एक दिन बनवारी को पंद्रह दिनों के लिए बिठा दिया गया। पंद्रह दिनों के बाद जब बनवारी दफ्तर गया तो लेबर इंचार्ज ने दस रोज बाद मिलने कहा। यह सिलसिला करीब दो महीना चला फिर एकदिन लेबर इंचार्ज ने कहा कि वह घर बैठे जब ज़रूरत होगी, बुला लिया जाएगा। 

इंचार्ज से बिना कुछ कहे बनवारी सीधा अनुभाग अधिकारी से मिला और पूछा "बताइए मुझे क्यों बैठा दिया गया?"

'जगह नहीं है।' अधिकारी ने कहा।

-'जगह नहीं? दसियों जगह खाली पड़ी हुई है। मुझसे जूनियर लोग सब लगे हुए हैं, तीन नये लड़कों को मेरे साथ बैठा दिया गया था वे भी रख लिए गये हैं। बताइए मुझे क्यों नहीं ड्यूटी दे रहे हैं? मैं काफी पुराना हूँ। मेरे साथ ऐसा अन्याय नहीं कर सकते। क्या कारण है बताइए।'

अधिकारी ने कहा- 'आई एम सॉरी ऊपर का आदेश है मेरी मर्जी नहीं चलेगी।'

-बड़े साहब के घर का नौकर थोड़े ना हूँ जो उनकी मर्जी चलेगी? दफ्तर के नियम-कानून क्या ताक पर धरे रह जायेंगे?' बनवारी ने उत्तेजित होकर कहा।

-'तुम जो कुछ कह रहे हो हम समझ रहे हैं, तुम्हारे साथ हमारी हमदर्दी है।

'हमें किसी की हमदर्दी नहीं चाहिए। हक चाहिए। इतने वर्षों से मेहनत करता आ रहा हूँ, बीस दिन का पगार तीसों दिन की ड्यूटी। दिन-दिन भर, रात-रात भर गाड़ी चलायी और क्या करता? लगातार दो वर्ष प्रतिवर्ष दो सौ छह दिन काम करने के बाद कैजुअल लेवर को रेगुलर कर दिया जाना चाहिए। मेरे नीचे कई लोगों की नौकरी साल भर की भी नहीं हुई थी कैसे रेगुलर कर दिया गया? सरकारी आदेश के अनुसार मेरा हक बनता। आप ही ने फाइल नहीं बढ़ायी होगी।

-'हम तभी फाइल बढ़ाते हैं जब साहब का हुकुम होता है। साहब तुमसे इतना खफा है कि वह तुम्हारी सूरत तक नहीं देखना चाहते। मैंने तुम्हें कई बार समझाया था मगर तुमने सुना नहीं।...तुम्हें जिस काम पर साहब ने लगाया था उसे ठीक से नहीं किया था।' 

-'किसने कहा आपसे? साहब ने जासूसी करने कहा था हमने किया था। हमें जितनी जानकारी मिल पाती थी हम बता दिया करते थे और क्या करना था हमें? मेरे कहने से क्या अध्यक्ष महोदय हड़ताल बंद करते? मैं ठहरा कैजुअल लेबर बाबू लोगों के आन्दोलन से मेरा क्या लेना-देना?"

-'तुम्हारे कारण बड़े साहब की कितनी बदनामी हुई, पूरा दफ्तर बदनाम हुआ, सारे लोग जाने क्या कुछ बक रहे हैं और तुम पूछते हो कि क्या किया? बड़े लोग बड़े होते हैं, साहब ने ज़रा सा इम्पटिंस क्या दिया तुम्हारे पर निकल आये।

-'उनके बारे में किससे क्या छिपा है? किसे नहीं पता था कि दफ्तर के चौकीदार मिलिटरी कैन्टीन से दारू लाकर साहब के घर पहुँचाते थे?...फौआरा चौराहे वाला किस्सा किसे नहीं मालूम? अख़बार में ख़बर छपी थी। सड़क के किनारे गाड़ी खड़ी करके गाड़ी के अंदर क्लर्क निशिकुमारी के साथ...डॉ0 मनीष ने उन्हें मोटरकार से उतार कर नाम पूछा था फिर दो थप्पड़ मारकर उनका नशा उतार दिया था..... बताइए आपको मालूम था कि नहीं? निशि कुमारी के साथ साहब का अवैध सम्बन्ध किससे छिपा है ? देर रात तक साहब के घर पर ठहरती है, कॉलोनी के लोग क्या अन्धे हैं?'

अधिकारी का चेहरा तमतमा उठा। उन्होंने गुस्सा झाड़ा-'शट अप ! इतने दिनों में अनुशासन में रहना नहीं सीखा नौकरी क्या करोगे? अपने लिए ज़रा सा पछतावा तो दूर उल्टा जुबान लड़ा रहे हो? गेट लॉस्ट ।'

फिर उन्होंने अपने अनुभाग के लोगों को इशारा किया कि बनवारी को बाहर निकाल दिया जाए। एक ने कॉलर पकड़ा, एक ने हाथ, फिर सबों ने मिलकर उसे बाहर निकाल दिया।

बाहर निकलते-निकलते बनवारी चीखता रहा- 'साहब के घर आलमारी भेजी, कालीन, पर्दे और जाने क्या-क्या भेजा। दफ्तर का सामान बिना नियम भेजा। आप ही लोगों ने चमचागीरी कर सिर चढ़ाया। आप ही लोगों ने नेताओं से बहुत कुछ कहा...प्रशासन के दलाल हैं आप सब।
चमचे, चापलूस, कायर हैं सब के सब...मैंने किसी से कुछ नहीं कहा। मैंने कोई गलत काम नहीं किया है।'

अधिकारी ने केयरटेकर को लिखित आदेश देकर कार्यालय के भीतर बनवारी का प्रवेश वर्जित कर दिया। 
एक दिन ऑफिसर्स कॉलोनी में जाकर बनवारी ने जब साहब से मिलना चाहा तो गार्ड ने यह कह कर उसे रोक दिया कि साहब का ऑर्डर है कि उसे कॉलोनी के भीतर न घुसने दिया जाए। बनवारी ने जब जोर-जबरदस्ती घुसने की कोशिश की तो गेटकीपर ने उसे बताया कि उसकी बात न मानने पर उसे पुलिस के हवाले कर दिया जाएगा, नौकरी पर लौटने की थोड़ी-बहुत उम्मीद जो बची हुई है वह भी ख़त्म हो जाएगा।

निरुपाय होकर बनवारी ने रजिस्टर्ड डाक द्वारा कार्यालय को पत्र भेजा। पत्र में उसने जानना चाहा कि उसे किस वज़ह से बिठा दिया गया। उसने यह भी अपील की कि अगर अनजाने में उससे गलती हो गयी हो तो उसे माफ़ कर दिया जाए एवं उसे तत्काल ड्यूटी पर बुला लिया जाए।

एक महीने बाद उत्तर न पाकर उसने रिमांइडर भेजा। थोड़े-थोड़े दिनों के बाद कई रिमांइडर भेजने के बाद बनवारी ने मान लिया कि पत्र लिखने से फायदा नहीं है। उसने अपना प्रयास जारी रखा। परिवार चलाने के लिए वह फिर से प्राइवेट टैक्सी चलाने लगा।
* * *

दुबारा नौकरी हासिल करने के लिए ट्रेड यूनियन के नेताओं को काफी मशक्कत करनी पड़ी। विभिन्न कर्मचारी संगठनों द्वारा उनसबों का मुद्दा उठाया गया। विभिन्न संगठनों द्वारा सामूहिक हड़ताल करने की धमकी दी गयी। राजनेताओं द्वारा दबाव डाला गया तब जाकर धीरे-धीरे एक-एक करके सबकी वापसी हुई। किन्तु बड़े-बड़े राजनेताओं के दबाव के बावजूद सभी को कुछ न कुछ सज़ा मिली। किसी को चार तो किसी को पाँच इन्क्रिमेन्ट पीछे धकेल दिया गया, और किसी किसी की नौकरी नये सिरे शुरू हुई।

यूनियन के सारे नेताओं को बिना शर्त माफी मांगनी पड़ी। आंदोलन के दौरान काम-काज का जो नुकसान हुआ था उन सभी को उसकी जिम्मेदारी लेनी पड़ी। आरोप-पत्रों में उल्लिखित सत्य-मिथ्या आरोपों को स्वीकारना पड़ा।

नेताओं की वापसी के थोड़े समय बाद यूनियन की मान्यता बहाल कर दी गयी किंतु यूनियन चलाने के लिए कठिन शर्तें भी लगा दी गयी। यूनियन का पुनर्गठन हुआ। नेता लोग दुबारा अपने-अपने पदों के लिए चुन लिए गए। उन सबों का मनोबल टूट चुका था। यूनियन दन्त विहीन हो गया था। प्रशासन के विरूद्ध चूँ बोलने की हिम्मत किसी में नहीं थी। प्रशासन के साथ मिल-मिलाकर, चिरौरी कर अगर काम बन जाता तो ठीक अन्यथा समस्याएँ अनसुलझी रह जाती।

अपनी समस्या से निजात पाने के लिए बनवारी प्रायः नेताओं से मिला करता पर हर बार उसे एक ही उत्तर मिलता-'इस साहब के रहते तुम्हारा भला नहीं होना है।' इस पर बनवारी ने एक दिन धमकी दी कि अगर उसका मामला नहीं उठाया जाता तो वह खुदकुशी कर लेगा। यूनियन ने प्रशासन के साथ होने वाली तिमाही मीटिंग का जो एजेंडा बनाया उसमें बनवारी का मुद्दा शामिल कर लिया। मगर प्रशासन ने उसके मुद्दे को एजेंडा में शामिल करने की अनुमति नहीं दी। प्रशासन का कहना था कि कैजुअल लेबर कर्मचारी ट्रेड यूनियन के दायरे में नहीं आता। प्रशासन ने यह भी सूचित किया कि अब कुशल-अकुशल किसी प्रकार श्रमिक विभाग द्वारा नहीं रखा जाएगा। आउट सोर्सिंग होगी यानी कि ठेकेदारों के मार्फत मजूर रखा जाएगा।

नेताओं ने बनवारी को कोर्ट जाने की सलाह दी और कोर्ट में लड़ने के लिए उन सबों ने चंदा इकट्ठा करके कुछ रूपए बनवारी को दे दिए। 
* * *

पिछले आन्दोलन में हुए नुकसान के कारण सारे नेता इतने सहमे हुए थे कि यूनियन की आमसभा बुलाने से पहले जब वे एजेंडा देने जाते तभी वे कह आते कि कर्मचारियों के दिल जीतने के लिए वे लोग प्रशासन के खिलाफ कुछ औपचारिक नारेबाजी करेंगे, दो-चार शब्द प्रशासन के खिलाफ भी कहेंगे जिसे वे अन्यथा न लें।

एकाध स्वार्थपरायण नेता तो आमसभा समापन के तुरंत बाद बड़े साहब को सूचित कर देते कि मीटिंग में क्या-क्या बातें हुई, अगर किसी ने उलुल-जुलूल बका था तो किसने बका था।

उस दिन एक ऐसी ही मरियल आमसभा कार्यालय परिसर में नीम पेड़ के नीचे चल रही थी। चूँकि अखिल भारतीय कर्मचारी संघ के आह्वान पर आमसभा बुलायी गयी थी, और मुद्दा वेतन आयोग गठन करने तथा महंगाई भत्ता बढ़ाने का था, इसलिए कर्मचारियों की उपस्थिति कुछ ठीक-ठाक थी।

भाषण के दौरान अचानक एक टैम्पो हहराती कार्यालय के भीतर प्रवेश कर नीम पेड़ के पास जाकर रूक गई। गाड़ी से कई लोग उतरे। दो औरतें भी उतरी। गाड़ी के भीतर से बनवारी की लाश उतारी गयी। चारों ओर सन्नाटा पसर गया।

पाँच-छह लोगों ने बनवारी का शव ढोकर नीम के पेड़ के नीचे चबूतरे पर रखा। बनवारी की पत्नी ने चबूतरे पर चढ़कर माइक थाम लिया। वह बोली-"भाइयों! बहनों! मेरा पति मुकदमा जीत गया...फिर से कैजुअल लेबर पद पर रखने का आदेश हुआ है। छियालीस साल की उम्र में फिर से शुरू? इस आदेश से उन्हें इतना धक्का लगा कि उन्होंने आत्महत्या कर ली। नहीं रहे मेरे बच्चों के बाप, नहीं रहे मेरे.... (रुदन)... कोर्ट के चक्कर में घर का लोटा कम्बल तक बिक गया, मेरा घर उजड़ गया (रूदन) ....साहब ने उन्हें निकाल दिया था। साहब ने आरोप लगाया था कि उन्होंने ठीक से जासूसी नहीं की थी, आप लोगों का साथ दिया था....आप लोग उनके लिए कुछ नहीं कर सके, कोर्ट का रास्ता दिखा दिया...जब तक आप लोग गुलाम बने रहेंगे, डरते रहेंगे, गरीब लोगों का शोषण होता रहेगा, गरीब लोग इसी तरह मरते रहेंगे।... प्रार्थना है आप लोगों से कि कृपया दूसरा बनवारी न बनने दें।" उसके हाथ से माइक छूट गया। वह फूट-फूट कर रोने लगी। भीड़ में से किसी ने आवाज लगायी 'इनकलाब जिन्दाबाद ! भ्रष्ट प्रशासन मुर्दाबाद!"

-'मुर्दाबाद! मुर्दाबाद!' के नारे गूंज उठे। - बनवारी की बीबी को नौकरी दो!'

-"नौकरी दो! नौकरी दो!'

-'इन्साफ दो!'

-इन्साफ दो ! सैकड़ों लोगों की भीड़ बनवारी की लाश और उसके परिवार के साथ बड़े साहब के कमरे की ओर चल पड़ी।

© सुभाष चंद्र गाँगुली 
( "मोक्षदायिनी" कहानी संग्रह से, प्रथम संस्करण: 2021)


Tuesday, October 18, 2022

लघुकथा : देशद्रोही


       
            अख़बार में ख़बर छपी थी--" पाकिस्तान में आतंकी हमले में तीस लोग मरे और अनेक घायल। मृत और घायलों में अधिकांश बच्चे थे। " अख़बार का नाम याद नहीं है, इस ख़बर को मैंने किसी ई-पेपर में पढ़ी थी। पढ़कर मैंने कमेंट किया था - " आतंकी हमले सर्वथा, सर्वत्र निन्दनीय है । ऊपर वाला सबको सद्बुद्धि दें, घायल बच्चे शीघ्र ठीक हो जायें यही कामना करता हूं।"
एक ने प्रतिक्रिया दी - " जैसी करनी वैसी भरनी। सब साले आतंकी हैं । सब के सब । साले जानवर हैं, कुकुर की मौत मिलनी चाहिए । "
मैंने उत्तर दिया- "आतंकवादी सिर्फ़ और सिर्फ़ आतंकवादी होता है । आतंकियों का न कोई धर्म होता और न ही कोई जात । अफसोस ! अधिकतर भोले-भाले निर्दोष लोग ‌‌‌मर जाते हैं और लोग जाति और धर्म के आधार पर झूठी सम्वेदना जताते हैं। मासूम बच्चों की क्या ग़लती ? नादान- नासमझ होते हैं वे, अभी तो ठीक से चलना भी नहीं सीखे थे और दुनिया से जाना पड़ा, अधर्मी लोगों के कारण । पता नहीं जितने लोग घायल हैं उनमें से कितने बच्चे बच पाते हैं, सही सलामत हो पाते हैं। पाकिस्तानी बच्चा, हिंदुस्तानी बच्चा, रुसी बच्चा क्या अंतर है ? बच्चा तो बच्चा है। कठुआ की रेप पीड़िता और हाथरस की रेप पीड़िता में क्या अंतर है ? बच्चा हो या वालिग, आतंकी हमले में कहीं कोई इंसान पर हमला होता है दिल दहल जाता है मेरा । आखि़र हम सब ख़ुदा के बन्दे जो हैं। "
उसने तीखी प्रतिक्रिया दी। गालियां दे डाली फिर लिखा- " अभी भी गुलाम मानसिकता नहीं छोड़ पा रहे हो बुरबक कहीं का। याद रखना हमें अंग्रेजों ने नहीं, मुसलमानों ने गुलाम बनाया था। जाहिल हैं वे, खाते हमारा और गाते पाकिस्तान का ।"
फिर थोड़े दिनों बाद हिमाचल रेंज में भूचाल आया। पाकिस्तान का ऊपरी हिस्सा प्रभावित हुआ। काफ़ी जान माल का नुक़सान हुआ । भूचाल ने कश्मीर को भी अपने चपेट में ले लिया था। ख़बर से दुखी होकर मैंने लिखा- " भूचाल से मरने वालों की आत्माओं को शांति मिले ! पीड़ित परिवारों के साथ सहानुभूति है, मैं उनके लिए दुआएं मांगता हूं।"
थोड़े दिनों के बाद उसी आदमी की प्रतिक्रिया आयी । उसने लिखा -" आपको मुसलमानों की इतनी चिंता है तो आप चले जाओ पाकिस्तान, मुसलमान बन कर वहीं रहो । देशद्रोही कहीं का ।" 

© सुभाषचंद्र गांगुली
21/08/2018
15/092022

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Tuesday, September 6, 2022

कहानी- असली बी० ए०

कौशल किशोर उर्फ 'किंग' असली बी० ए० है मगर यह उसकी विडम्बना है कि है आये दिन उसे लोगों को यकीन दिलाना पड़ता है कि वह असली बी० ए० है।

जब उसने कैजुअल लेबर की हैसियत से दफ़्तर ज्वाइन किया था, बी० ए० पास होने के कारण लोग उसकी ख़ास कदर करते। लगभग सौ लेबरों के बीच वह अकेला ग्रेजुएट था। दो-चार इण्टर थर्ड क्लास और बाकी दर्जा आठ या उससे कम, लिहाज़ा वह अन्धो में कनवा राजा बन बैठा। राजा भी ऐसा-वैसा नहीं, अंग्रेजी जाननेवाला राजा था और इस वज़ह से लेबर इंचार्ज घनश्याम जिसे अंग्रेजी का तनिक ज्ञान न था राजा को 'किंग' कह के पुकारने लगा था। फिर घनश्याम की देखा-देखी कौशल के संगी-साथी भी किंग कहने लगे थे।

अपनी कमी को छिपाने के चक्कर में इंचार्ज किंग का इस्तेमाल करता, लिखा पढ़ी का ख़ास काम यानी नोटिंग, ड्राफ्टिंग, लेबरों का बिल आदि किंग से करवाता फिर उसे अपने हाथ से उतार लेता। किंग की इस अहमियत के कारण उसका अपना कद लेबरों के बीच इतना बढ़ा कि वह सबों का नेता बन बैठा। हरेक समस्या का निदान किंग की अगुवाई में होता। धीरे-धीरे उसका स्टेटस ऐसा बन गया कि उसे 'लेबर' का एक धेला काम नहीं करना पड़ता और न ही इंचार्ज उससे कोई काम लेता। औरों की अपेक्षा किंग को ड्यूटी भी अधिक मिलती यहाँ तक कि कदाचित् इंचार्ज अपनी कुर्सी पर ही बैठा रहता और किंग को मोर्चा सँभालने की जिम्मेदारी सौंप देता।

सात वर्ष कैजुअल रहने के बाद किंग चपरासी के पद पर रेगुलर हो गया। चपरासी बनने के बाद भी किंग को बी० ए० पास होने का सम्मान व फ़ायदा मिलता रहा। अमूमन लोग उससे चपरासी का काम नहीं लेते बल्कि उसके साथ हमदर्दी रखते और कहते 'आजकल नौकरियों की हालत ख़राब है क्या करें लोग ? बैक डोर से आना पड़ता है, जिसे जो मिल जाए वही सही, पर पढ़े-लिखों से ऐसा-वैसा काम कैसे करवाया जाय ? वैसे ही बेचारा भाग्य का मारा है।

नौकरी मिलने के तीन साल बाद किंग के साथ रेगुलर हुए कई लोग क्लर्क बन गये मगर किंग रह गया जबकि नियुक्ति के समय यानी सीनियरटी के हिसाब से उसका दूसरा नम्बर था। लोगों को कौतूहल हुआ। एक ने किंग से पूछा-"क्या बात है तुम्हारा प्रोमोशन क्यों नहीं हुआ ?"

-"मैंने इम्तहान ही कहाँ दिया था ? पत्नी की तबीयत खराब थी", किंग ने उत्तर दिया।

अगली मर्तबा फिर जब चार प्रोमोशन हुए और किंग का नहीं हुआ तो उसने वही उत्तर दिया, किन्तु तीसरी मर्तबा जब किंग की सर्विस पाँच साल की हो चुकी थी और बिना इम्तहान के सीनियरटी के आधार पर एक दर्जन प्रोमोशन हुए और किंग रह गया तब खलबली मच गयी। पूरे दफ़्तर में यह चर्चा का विषय बन गया। किंग ने साथियों को कनविंस करने की कोशिश की- "शायद मेरा करक्टर रोल (सी० आर०) ठीक नहीं है।"

भैरोशरण जिसका किंग से चोली-दामन का साथ था, ने तीखी प्रतिक्रिया की "झाँसा मारते हो ? ग्रुप डी का सी० आर० कहाँ लिखा जाता ?"

-"मेरा मतलब मेरे ख़िलाफ़ कोई ख़राब रिपोर्ट होगी" किंग ने अपना बयान बदला।

- "कब तक झाँसा मारते रहोगे बच्चू ? सच, सच बताओ मामला क्या है ?" भैरोशरण ने ऊँची आवाज़ में कहा।

किंग को उसकी बात पर बेहद क्रोध आया। उसने सोचा इस भैरोशरण के लिए उसने क्या कुछ नहीं किया, उसके लिए लिखा-पढ़ी करना, इंचार्ज की चिरौरी करना, प्रशासनिक अधिकारी के सामने गिड़गिड़ाना और विनती करना, यहाँ तक कि उसका काम दूसरे से करवाकर उसके खाते डाल देना। एक नम्बर का कामचोर, जुआड़ी, अपना नाम तक ठीक से लिख नहीं पाता उसकी संती बड़े भाई ने हाईस्कूल का इम्तहाल दिया था। और आज जब किंग आगे बढ़ गया है तब ऊँची आवाज़ में बोल रहा है।

किंग की इच्छा हुई कि यही सब कहते हुए दो-चार हाथ जमाकर दिमाग ठिकाने ला दे मगर मुश्किल से खुद को संयत रखकर उसने कहा- "मेरा मतलब मैं नेतागिरी करता हूँ, तुम सबों के लिए लड़ता रहा हूँ, तुम्हारी वकालत करते समय अधिकारियों के साथ ठीक से बर्ताव नहीं किया होगा, रेगुलर होने के बाद तो देख ही रहे हो कभी काम बँटवारे के मुद्दे पर, कभी वर्दी के मुद्दे पर प्रशासन को धमकी देता आया हूँ, खरी-खोटी सुनाता आया हूँ इस वज़ह से मेरे खिलाफ़ अधिकारियों ने मेरी सर्विस बुक में गुप्त रिपोर्ट लगा रखी होगी।"

मगर भैरोशरण को उसकी बात रास नहीं आयी। उसने कहा- "यह नामुमकिन है, ऐसा क्यों होगा भला ? तुमने ऐसा कुछ कभी किया भी तो नहीं और न कभी सस्पेण्ड हुए या भूख हड़ताल पर बैठे, दो-चार बार जुलूस में तुम आगे-आगे जरूर थे पर तुम्हारे पीछे हम सभी थे।" एक दिन किंग के कई साथी एकजुट होकर, किंग से बिना कुछ कहे प्रशासनिक अधिकारी से मिले। उनसे पता चला कि किंग हाईस्कूल पास नहीं है। इस समाचार से सभी लोग स्तब्ध, हतप्रद हो गये। अधिकारी महोदय से मिलने के बाद सबों ने आपस में विचार-विमर्श किया। सबों का मानना था कि अधिकारी महोदय ने झूठ बोला होगा क्योंकि प्रमोशन के लिए मात्र हाईस्कूल होना अनिवार्य है, किंग बी० ए० पास न सही इण्टर तो अवश्य होगा वर्ना वह इतना लिख-पढ़ कैसे लेता, धड़ाधड़ अंग्रेजी कैसे बोल पाता ? कईयों ने किंग को दुबारा कुरेदा और बोला- "हम तुम्हारे लिये क्या करें ? हम तुम्हारी मदद करना चाहते हैं।"

किंग खफा हो गया-"मैं बी० ए० पास हूँ। असली बी० ए०, नकलछाप नहीं हूँ, मेहनत करके डिग्री ली है.. ..मेरे ख़िलाफ़ एडवर्स रिपोर्ट अवश्य होगी, ऐसी रिपोर्ट गुप्त रखी जाती है, इस कारण अधिकारी महोदय ने तुम लोगों से नहीं कहा होगा...तुम लोगों को पूछने की ज़रूरत पड़ गयी ? मुझ पर विश्वास नहीं है क्या ? बाबू बनते ही तुम सबों का मुझसे भरोसा उचट गया ? अरे तुम्हारे कहने से थोड़े न तरक्की कर दी जायगी, मेरा जब होना होगा हो जाएगा ख़ुदा के लिए मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो, ऐसे ही मैं परेशान हूँ।"

मगर भैरोशरण चुप नहीं बैठा । वह अपनी प्रमोशन के सम्बन्ध में आयोजित पार्टी में किंग को सपरिवार निमन्त्रण देने किंग की अनुपस्थिति में उसके घर पहुँचा। उसने किंग की पत्नी से कहा-“भाभी! आप उन्हें समझाइए ना फ़ालतू नेतागिरी के चक्कर में अपना और आप सबों का नुकसान कर रहा है, नेतागिरी छोड़ दे, क्या रखा है। इसमें.......बी० ए० पास है, उसका तो कब का प्रमोशन हो गया होता मगर अब जब तीसरी मर्तबा सीनियरटी के आधार पर प्रमोशन हुआ तो उसमें भी वह रह गया।"

-"क्यों भाई साहब! उन्होंने ऐसा क्या किया ? बी० ए० पास हैं, शरीफ़ भी हैं, जहाँ तक मुझे मालूम है, शादी हुए चार साल हो गये इन्होंने वैसा कुछ नहीं किया और न ही इस बीच आपके दफ़्तर में किसी प्रकार की अशान्ति हुई। पर मुझे भी प्रमोशन न होने पर हैरानी होती है, शादी होते समय इन्होंने कहा था जल्दी बन जाएँगे, उसी बात पर ना-नुकुर करते-करते मैं राजी हो गयी थी वर्ना मैं ख़ुद एम• ए• हूँ, ईश्वर ने चेहरा-मोहरा भी ठीक-ठाक दिया है, मेरे पिता ने खर्चा भी किया था, चपरासी से कतई शादी नहीं करती.......चलिए आपके आने से कम-से-कम इतना तो पता चला कि पिछले तीन साल से लगातार प्रमोशन हो रहे हैं, वे तो मुझे यही कहते आ रहे हैं कि प्रमोशन नहीं हो रहा है, सब ठप्प हैं, सरकार ने रोक लगा रखी है ....... बड़ा झूठ ? झूठ या मक्कारी ? अभी ये घर आएँ ख़बर लेती हूँ।"

आशा का रौद्र रूप देख भैरोशरण सकते में आ गया। उसने कहा-"भाभी ! आपसे एक अनुरोध है, कृपया मेरा नाम न लीजिएगा। हमसे खामख्वाह दुश्मनी हो जाएगी, मैंने तो अपना समझकर आपसे कहा है. ..मुझ पर उसका काफ़ी अहसान है, उससे मैं आगे निकल गया, जो कम पढ़े-लिखे थे वे भी हाईस्कूल पास करके आगे निकल गये और वह बेचारा वहीं रह गया, मुझे बड़ा बुरा लग रहा है. ..अच्छा भाभी, मैं चलता यहाँ मैं आया था कृपया किंग से न कहिएगा, मैं उसे दफ्तर में दावत दे दूँगा, अगर वह ले आये तो आइएगा।"

-"ठीक है भाई साहब आपका जिक्र नहीं करूंगी, निश्चिन्त रहिए, आपने मेरा उपकार किया है, मैं आभारी हूँ.......आज मैं इनकी ख़बर लूँगी, इतना बड़ा झूठ! मेरा पति मक्कार ! हे भगवान ! किस जन्म के पाप की सजा दे रहे हैं ?"

मगर आशा ने ठण्डे दिमाग से काम लिया। किंग से कुछ कहे बिना अगले दिन वह पति के कार्यालय में पहुँची। उसकी बातों को सुनने के बाद प्रशासनिक अधिकारी ने सर्विस बुक व पर्सनल फाइल मँगवाकर किंग के हाथ का लिखा एप्लिकेशन दिखा दिया जिसमें किंग ने अपना क्वालिफिकेशन कक्षा आठ लिखा था, उन्होंने यह भी दिखा दिया कि कक्षा आठ के प्रमाण-पत्र के अलावा और कोई योग्यता प्रमाण-पत्र उपलब्ध नहीं है।

आशा के पैरों के नीचे ज़मीन खिसकने लगी। उसकी आँखों के सामने गहन अन्धकार उतर आया। उम्मीद की किरण दूर-दूर तक दिखायी न दी। उसे इतना सदमा पहुँचा कि वह अपने पति से कुछ न कह सकी।

किंग को कुछ पता न था कि क्या कुछ घट चुका था मगर वह अपनी पत्नी की उदासीनता और मौन से परेशान हो गया। उसने तरह-तरह के कयास लगाए, घुमा-फिरा कर बार-बार उससे परेशानी का कारण पूछा, उसे रिझाने की कोई कसर नहीं छोड़ी मगर एक दिन जब दफ़्तर से लौटकर उसे पड़ोसी से पता चला कि उसकी पत्नी बेटे के साथ एक अटैची ढोती हुई कहीं चली गयी तो उसकी बुद्धि फेल हो गयी।

कमरा खोलते ही उसे एक कागज मिला जिस पर आशा ने लिख रखा था-"मैं अपने मायके वापस जा रही हूँ। फ़िलहाल लौटने का इरादा नहीं है। आपको असली बी० ए० होने का सबूत देना होगा। प्रमोशन न होने का सही कारण बताना पड़ेगा तब मैं दुबारा सोचूँगी वर्ना मैं आपको तलाक़ दे दूँगी। तलाक़ इसलिए दूँगी ताकि आपकी आधी तनख़्वाह मुझे मिलती रहे जिस पर मेरा अधिकार है क्योंकि आपने मेरे साथ धोखा किया है, आपको अपने किये की सजा मिलनी चाहिए, मेरी ज़िन्दगी के साथ आपने खिलवाड़ किया है। मैं आपको माफ़ नहीं करूंगी, मुझे आसानी से तलाक़ मिल जाएगा क्योंकि आपके दफ़र के ढेर सारे लोग हकीकत जान चुके हैं, उन्हें मालूम है कि आप 'किंग' नहीं बल्कि बेगर यानी भिखारी हैं, जी हाँ, आप भिखारी हैं। कृपया मुझसे अपने सुख-चैन की भीख माँगने न आइयेगा। हो सकता है कि मेरा जवान भाई आपके साथ बदसलूकी करे, उस अपदस्थ स्थिति में मैं आपको देखना नहीं चाहूँगी क्योंकि कल तक आप हमराह, हमसफ़र, हमनवाज़ थे।"

अचानक आये झंझावात से किंग का वज़ूद चरमराने लगा। इस विषम संकट से कैसे बाहर आये उसे समझ में नहीं आ रहा था। वह अपनी सुध-बुध खो बैठा और ऐसी चुप्पी साध ली जैसे कि साँप सूँघ गया हो। कई दिनों के बाद वह अपने पुराने इंचार्ज घनश्याम से मिला। घनश्याम की हमदर्दी आशा के साथ थी। उसने कहा- "तुमने अन्याय नहीं, अपराध किया है बल्कि पाप किया है, तुम्हें जानना चाहिये था कि पाप का घड़ा आज नहीं तो कल फूटता ज़रूर है, तुम्हें जानना चाहिए था कि तुमने जो ताज़ पहन रखा है वह कभी-न-कभी उतरेगा ही और तुम किंग से बेगर बन सकते हो। वह तुम्हारी अर्धांगिनी बननेवाली थी, उससे फ़रेब नहीं करना चाहिए था भले ही तुम असली बी० ए० हो मगर यह तो कह देना चाहिए था कि तुम चपरासी हो, प्रमोशन दफ्तरी या रिकार्ड शॉर्टर में होगा, क्लर्क बनने में समय लग सकता है, हो सकता वह तुम्हें उसी तरह क़बूल कर लेती, और कुछ नहीं तो शादी के बाद तो सब कुछ साफ़-साफ़ कहना ही चाहिए था। तुमने जो कुछ किया उससे सदमा पहुँचना स्वाभाविक है। कहीं अगर उसने आत्महत्या कर ली तो मौत के लिए तुम जिम्मेदार होगे, बच नहीं पाओगे।"

किंग ने आर्त्तनाद किया- "नहीं ! नहीं ! हम ऐसा नहीं होने देंगे हम आशा के बिना नहीं रह पाएँगे. ....... घनश्याम भाई! आप हमारी मदद करिए, आप ही हमें बचा सकते हैं, आप मेरे इंचार्ज थे, आशा आपको मानती भी है, कम-से-कम उसे इतना तो बता ही दीजिए कि मैं असली बी० ए० हूँ, सकता है उसका गुस्सा ख़त्म हो जाए ।" -"ठीक है, अगर मेरे कहने से वह मान जाए तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती ? कल सुबह गोमती एक्सप्रेस से चला जाए, तुम मेरे घर आ जाना मैं तैयार रहूँगा।"

कौशलकिशोर उर्फ किंग अपने इंचार्ज घनश्याम को साथ लेकर ससुराल पहुँचा। उसे देख उसके घरवालों ने आँखें टेढ़ी कर ली और कहा कि आशा बात नहीं करेगी मगर घनश्याम के अनुरोध पर वे सुनने के लिए तैयार हो गये। किंग ने कहा- “मैं असली बी० ए० हूँ, यह रहा उसका सबूत, हाईस्कूल से बी० ए० तक के मार्कशीट और सर्टिफिकेट्स, आप लोग देख लीजिए।"

आशा ने बिना देखे तपाक से पूछा- "दफ़्तर के रिकार्ड में ये सब क्यों नहीं है ? ये सब फ़र्जी हैं, मैं किसी प्रकार के बहकावे में नहीं आती, असली बी० ए० हुए होते तो पहली बैच में प्रमोशन हो गया होता। इम्तहान में क्यों नहीं बैठे? औरों की आँखों मैं धूल झोंकिएगा, मैं आपके कार्यालय गयी थी, सारे कागज़ अपनी आँखों से देखा है।”

अप्रत्याशित हमले से किंग सकपका गया, उसके हाथ-पाँव फूलने लगे। वह असहाय होकर घनश्याम को देखने लगा, गुस्से से लाल आशा उठकर भीतर जाने लगी तो घनश्याम ने कहा- "भाभी। यही सब कहने यानी सच्चाई कहने के लिए मैं इसके साथ आया हूँ, सुन तो लीजिए इसके बाद फैसला करिएगा। गम्भीर मामला है, आप दोनों के जीवन का सवाल है।" आशा रुक गयी।

घनश्याम ने कहा- "सात साल कैजुअल रहने के बाद जब रेगुलर होने की नौबत आयी तो पता चला कि जिस तारीख़ को ये कैजुअल लेबर की हैसियत से आया था इसकी उम्र हाईस्कूल सर्टिफिकेट के मुताबिक पच्चीस वर्ष से दो महीने ज़्यादा थी लिहाज़ा वह नौकरी के अयोग्य था और वह नौकरी नहीं पा सकता था, कैजुअल में ज्वाइन करते समय ही ओवर एज था, उस समय मेरी जगह जो काम करता था उसे देख लेना चाहिए था। इसने कोर्ट जाने की बात कही पर मैंने इसे मना किया था क्योंकि पहले भी एक दो लोग ऐसे ही मामले में कोर्ट जा चुके थे पर कोर्ट ने लेबर के पक्ष में निर्णय नहीं दिया था। कहीं इसके केस में भी अदालत वहीं निर्णय सुना देती तो इसका दरवाज़ हमेशा के लिए बन्द हो जाता....... .. चूँकि किंग स्वयं मेरे रिकॉर्ड्स को हिफ़ाज़त से रखा करता था, इसने हाईस्कूल से बी० ए० तक के सारे दस्तावेज़ हटाकर एक नया एप्लीकेशन रख दिया था और साथ में एक ट्रांसफर सर्टिफिकेट (टी० सी०) जिसे एक गाँव के स्कूल से रुपये लेकर बना लाया था, लगा दिया था। उस टी० सी० के मुताबिक कैजुअल में ज्वाइन करते समय इसका डेट ऑफ बर्थ पच्चीस साल दो माह के बजाए बीस साल हो गया और इसका रास्ता साफ़ हो गया. इसकी ज़िन्दगी बेकार हो जाती, दो रोटी के लिए इसे दर-दर ठोकरें खानी पड़ती, ऐसे ही बेचारा किस्मत का मारा था। मैंने अलग से मारना नहीं चाहा इसलिए मैंने चुप्पी साध ली बल्कि यूँ समझिए कि मैंने इसकी मदद की थी, किन्तु ये 'असली बी० ए०' है....... आज तक यह राज़ ही है, आज आप दोनों की भलाई के लिए यह राज़ खोलना पड़ा। पिछले दो साल से ये हाई स्कूल का इम्तहान दे रहा है। पहली बार गणित में फेल हो गया था, पिछले साल आपकी तबियत ख़राब हो जाने के कारण दो पेपर में बैठ नहीं पाया था, जिस दिन हाई स्कूल पास हो जाएगा प्रमोशन हो जाएगा, उसके बाद अपने आप प्रमोशन होते रहेंगे !"

आशा की माँ की आँखें छलछला आयीं। उन्होंने कहा- "बेटी ! अब तू अपना गुस्सा थूक दे, इसे माफ़ कर दे। जो कुछ हुआ उसे तू अपना दुर्भाग्य मान ले, उसने भी तो कम दुःख नहीं झेला, भाग्य में जो लिखा रहता है वही होता है, भगवान् ने चाहा तो सब ठीक हो जाएगा, वह पढ़ा-लिखा समझदार लड़का है गणित में भी पास हो जाएगा।" 

आशा के पिता ने अपनी नाराज़गी जाहिर की- "इसके बाप को तो सच कहना चाहिए था, उसकी बेटी के साथ ऐसा हुआ होता तो उसे पता चलवा.........

घनश्याम बोल पड़ा - "बाबू जी ! इसके पिता को भी मालूम नहीं था, आपको सच कहता हूँ मेरे और इसके सिवा किसी को यह राज़ मालूम नहीं है, ढिंढोरा पीटने से इसकी नौकरी ख़तरे में पड़ सकती थी.....बेचारा सचमुच अभागा है, स्कूल की गलती के कारण हाईस्कूल सर्टिफिकेट में एक साल ज़्यादा लिख गया.......बेरोजगारी समस्या के चलते पच्चीस साल की उम्र तक नौकरी नहीं मिल पायी, कैजुअल लेबर में सात साल सड़ने के बाद जब चपरासी के पद पर रेगुलर होने हुआ तो पता चला ओवरएज है, नौकरी पाने के चक्कर में असली बी० ए० की डिग्री गँवानी पड़ी और कक्षा आठ दिखाना पड़ा। अब जो होना था हो गया. वह असली बी० ए० है, हाईस्कूल फिर से कर लेगा, प्रमोशन भी हो जाएगा।"

अपनी ख़ामोशी तोड़कर आशा ने कहा- "भाई साहब! आप सचमुच हमारे हितैषी हैं, हम आपके आभारी हैं, आपने इन्हें कम-से-कम एक दोष से मुक्त करा दिया........लेकिन नौकरी मिलने के बाद इन्हें 'किंग' बने रहने की क्या ज़रूरत थी! तुरन्त हाईस्कूल कर लेना चाहिए था । इन्होंने अपना अहंकार बरकरार रखा, झूठ दर झूठ बोला, मेरे साथ भी छल किया...अब इन्हें कहिए जल्दी से हाईस्कूल पास करके अपना प्रमोशन ले लें और 'असली बी० ए०' बोलना बन्द करें....मैं इन्तज़ार करूँगी।"
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© सुभाष चंद्र गाँगुली 
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( "कहानी की तलाश" कहानी संग्रह से, प्रथम संस्करण: 2006)
* पत्रिका ' तटस्थ' जून 2002 मे प्रकाशित ।

कहानी : लौटती धार


सुजाता के दिन अब फिरते हुए नज़र आने लगे। कुछ ही दिनों पहले उसकी शादी की बात पक्की हुई है। पहले मिहिर के माता-पिता ने देखा, कुण्डली मिलायी, फिर मिहिर, उसकी बहन और चाची ने देखा तथा तीसरी और अन्तिम बार मिहिर और उसके मित्रों ने जी भरकर देखा, फोटो खींचें, हँसी-ठिठोली की और जाते समय मिहिर ने स्वयं सुजाता और उसकी माँ से रिश्ता मंजूर है।" पुरोहित ने शुभ मुहूर्त्त देखा और अगले माघ यानी सात महीने बाद विवाह होना तय हुआ।

सुजाता के माता-पिता, भाई, छोटी बहन सभी बेहद खुश हैं। पूरे घर में उत्सव सा माहौल है। घर, आँगन, दालान सर्वत्र उत्सव की ख़ुशबू लहरा रही है। सुबह से रात तक सभी की जुबान पर सिर्फ़ शादी की बात, मिहिर की तारीफ़ और मिहिर से ज्यादा गुणगान सुजाता के, “जीजू सेर, तो हमारी दीदी सवा सेर....... हमसे सहेलियाँ पूछती हैं, दीदी को क्यों नहीं आगे बढ़ने दिया, कितनी तेज थीं, गाना-बजाना, खेलकूद, पढ़ाई लिखाई सब में अव्वल "....... "हमारी बेटी सुजाता क्या मिहिर से कम है? आपने उसे पढ़ने नहीं दिया, वर्ना अब तक वह किसी ऊँचे ओहदे पर होती। हमेशा फर्स्ट आयी है। कितनी अच्छी अंग्रेजी जानती है, बी० ए० में कितने नम्बर मिले थे..! भगवान् के घर देर है, अन्धेर नहीं । आख़रकार उसने अच्छा योग्य वर भेजा न!"....कल तक जो सुजाता सबकी आँखों की किरकिरी थी, आज वह आँखों की पुतली बन गयी।

सुजाता से अब घर का कोई भी काम नहीं लिया जाता है, उल्टा उसे आराम करने को कहा जाता है। कदाचित् छोटी बहन बिट्टू अगर उसे खाना परोसने या किसी काम में हाथ बँटाने बुलाती, तो उसकी माँ तत्काल कहतीं, "रहने दो, उसे मत तंग करो, मैं कर देती हूँ।"

-“अरे माँ, थोड़ा-बहुत काम करने से वह दुबली नहीं हो जाएगी, हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने से आलसी ही हो जाएगी।"

-"चुप कर तेरी दीदी इतनी मेहनती है, बहुत काम कर चुकी है। अब दो-चार दिन आराम कर लेने दे। ससुराल में तो काम ही काम, फुर्सत कहाँ मिल पाएगी, देख न हमें! कितने सारे लोग शादी में आएंगे, रंग-रूप ठीक रखना है......... चन्द दिनों की मेहमान है अब वह।"

पिता और भाई भी सिवाय पानी पिलाने के कोई आदेश नहीं देते।

 सुजाता को अपने घर पर अतिथि बने रहना बड़ा अजीब लगने लगा। इस अद्भुत अनूठे अनुभव को उसने सँजोए रखना चाहा और एक-एक दिन की घटना को, घर के सदस्यों की मीठी-मीठी बातों को, वह अपनी डायरी में दर्ज करने लगी।

सुजाता का आज का अनुभव उसके पिछले दो वर्षों के अनुभव के ठीक विपरीत है। सुबह उसकी आँख खुलती महरी के दस्तक देने पर दो-तीन आवाज़ के बाद अगर सुजाता ज़वाब नहीं देती, तो उधर से माँ की आवाज़ आती, "बुचिया, बुचिया !"

दरवाज़ा खोलकर भीतर आने की देर नहीं कि माँ का फ़रमान, "बुचिया! जल्दी से हाथ-मुँह धोकर पापा को चाय दे आ....... बबलू और बिट्टू को नींद से जगा उठ जायँ, तो चाय दे दे।"

सुजाता सबको चाय पहुँचाती फिर बाथरूम जाकर साफ-सुथरी होकर खुद अपनी चाय ले लेती। कभी-कभार उसकी चाय ठण्डी हो जाती और चूल्हे पर खाना पकने के कारण ठण्डी चाय दोबारा गर्म कर पाना सम्भव नहीं हो पाता या फिर उसके लिए चाय ही नहीं बचती, तो सुजाता नर्मी से विरोध जताती, "माँ मेरी चाय ? मेरा भी ख़्याल रखना चाहिए ?"

माँ की त्योरियाँ चढ़ जातीं, “तू क्या मेहमान है, जो तेरे लिये इंतज़ार करूँ ? दस घण्टा बाथरूम में रहोगी, तो चाय ठण्डी हो ही जाएगी। अब जैसी है, वैसी पी ले। रोज-रोज फ़ालतू गैस जलती है।" कभी कहतीं, "नहीं बची, तो नहीं बची, नशा बुरी चीज़ है।"

सुजाता चाय पी या ना पी, पिता की आवाज से चौंकती, "बुचिया ! अभी तक अख़बार नहीं लायी ? देख, जल्दी से ले आ, वरना कोई उठा लेगा।"

सुजाता अख़बार लेकर जाती, तो उसका भाई बबूल चिल्लाता, “ए बुचिया ! स्पोर्ट्सवाला पेज इधर दे जा। अभी थोड़ी देर में ले जाना, एक बात रोज-रोज कहनी क्यों पड़ती है ?"

इधर सब्जीवाला गुहार लगाता, “आलू, टमाटर, गोभी, बैंगन....दीदी !”
माँ चीखती, "बुचिया! जा सब्जी ले ले, सुन ! देख ले डलिया में क्या है, क्या नहीं है, बिना देख-सुनकर ले लेती है, तो ज़रूरत से ज़्यादा तरकारी बनानी पड़ती है, फ़ालतू खर्चा होता है। टमाटर देखकर लेना, लाल-लाल और थोड़ा कड़ा हो। उस दिन सारा फेंकना पड़ा था। रोज-रोज तरकारी खरीदती है, फिर भी ताज़ा-बासी, अच्छा-बुरा नहीं पहचान पाती, पैसा बेकार जाता है! और सुन ! मिर्चा अलग से माँग लेना। फोकट में देता है, फिर भी नहीं लेती।" माँ की इस तरह की बातें सुजाता एक कान से सुनती, दूसरे से निकाल देती है। आदत पड़ चुकी थी।

- "माँ ! ग्यारह रुपये पचास पैसे।"

-"ठीक से जोड़ लिया है न ? मिर्चा का तो जोड़ा नहीं ?"

उधर दूधवाले की सीटी बजने लगी।
दूधवाला तूफान मेल है, ज़रा-सा सब्र नहीं कर सकता, सीटी पर सीटी बजाता। खीझकर माँ कहती, "बुचिया वहाँ खड़े-खड़े क्या कर रही है? सुनायी नहीं देता ? क्या मैं दौड़ू ? जा, जल्दी से दूध ले ले, बर्तन ठीक से धो लेना।"

-"पहले रुपये तो दीजिए, सब्जीवाला कब से खड़ा है।" सुजाता झुंझलाती। 

- "दूधवाला एक घण्टा खड़ा रहेगा क्या ? अभी चला जाएगा तो हाय-हाय करना पड़ेगा। तू दूध ले ले, मैं सब्जीवाले को दे देती हूँ...साढ़े ग्यारह कैसे हुआ ? तुझे वह जो दाम बता देता है, तू वही मान लेती है, मोल-भाव करना पड़ता है! पता नहीं किस राजकुमार के घर जायगी, कैसे गृहस्थी संभालेगी !”

थोड़ी-सी फुरसत मिलती, तो सुजाता अख़बार लेकर बैठती। अभी पन्ना भी नहीं पलट पाती कि बबलू का हुक्म होता, “बुचिया ! मेरी कमीज़ प्रेस कर दे। कल तूने बनियान साफ़ नहीं की थी, आज कर देना।" 
कमीज़ पर आयरन चलाती, तो माँ की आवाज़ सुनायी देती, "बुचिया! पापा की पैंट-शर्ट निकाल दे और टिफिन तैयारकर बैग में रख देना।"

इसी तरह दिन-भर चरखी जैसी चक्कर काटती बुचिया। कहने को तो उसकी माँ की गृहस्थी माँ ही सँभालती, हिसाब-किताब भी वहीं रखती, लेकिन अनगिनत छोटे-बड़े काम, जिन पर शायद ही किसी का ध्यान जाता हो, बुचिया को करना पड़ता। सुबह से रात तक इतनी मर्तबा 'बुचिया बुचिया' सुनती कि सुनते-सुनते कान थक जाते, हाथ पैर दुखने लगते। थककर चूर होकर जब बुचिया बिस्तर पर निढाल होती, तो एकदम शव-सी पड़ी रहती। कदाचित् सपने में 'बुचिया' सुनकर एकबारगी नींद से उठ बैठती। किन्तु तब भी बेचारी को सुनना पड़ता, "बुचिया कुछ नहीं करती, जब देखो, तब रिकार्ड प्लेयर बजाकर गाना सुनती है या टी० वी० के सामने बैठी रहती है। सिलाई-बुनाई कर सकती है, घर का दो पैसा बच सकता है।"

बुचिया को ताने- उलाहने सुनने, घरवालों की रूखाई देखने और सुनने की आदत पड़ चुकी थी। सुजाता करे, तो क्या करे, कहे तो किससे कहे, कुछ नहीं समझ पाती। वह तो बस भाग्य को कोसती और भगवान् के सामने गिड़गिड़ाती, "हे भगवान ! मुझे लड़की का जन्म क्यों दिया ? लड़की बनाया, तो उस घर में क्यों भेजा, जहाँ लड़की के हाथ पीले करने के लिए ढेर रुपए खर्च करने पड़ते हैं ? उस घर में क्यों भेजा, जहाँ हिटलर जैसा बाप है, जिसके आगे किसी की नहीं चलती ? उस घर में क्यों भेजा, जहाँ बेटियों को थोड़ा-बहुत पढ़ने तो दिया जाता है, लेकिन आगे बढ़ने नहीं दिया जाता है।"

सुजाता ने अपनी भावनाओं को, मन की पीड़ाओं को डायरी में दर्ज़ कर रखा है। सुजाता ने लिखा कि जब वह स्टूडेण्ट थी, उसकी हर प्रगति व प्रशस्ति पर उसके माता-पिता बल-बल खाते, उसकी बातों को गम्भीरता से लेते, उसे बढ़ावा देते, मगर अब जब पढ़ाई-लिखाई छोड़, दो वर्ष से बिन ब्याही बैठी हुई थी, उसकी स्थिति अपने ही घर में दासी की हो गयी थी, जिसे तन ढँकने के कपड़े और दो टाइम खाना खाने के एवज़ में कोल्हू जैसा खटना पड़ता। अब वह सुजाता नहीं, बेजुबान आज्ञाकारी 'बुचिया' बन चुकी थी। सुजाता ने लिखा था कि जब वह एम० ए० में थी और आगे बढ़ने के लिए भरपूर मेहनत कर रही थी, तभी अचानक उसके पिता ने उसे कॉलेज जाने से मना कर दिया था।

उसके पिता के कान भरनेवाला था उसका अपना भाई बबलू। बबलू ने कई बार सुजाता से कहा था कि वह अपने क्लास के लड़कों से बातें न किया करे, मगर सुजाता ने हर बार जवाब में कहा था, "इसमें कौन-सी बुराई है भइया ? हम साथ-साथ पढ़ते हैं, दिन-भर क्लास-रूम में रहते हैं, बातें यूँ ही हो जाती हैं, मैं अकेली थोड़े ना हूँ। सभी लड़कियाँ लड़कों से बातें किया करती हैं।"

मगर जिस दिन बबलू घर पर बेतुकी बात करने लगा था और राजीव नाम के एक लड़के के साथ ख़ामख़्वाह उसका नाम जोड़ा था, उस दिन सुजाता ने अपना आपा खो दिया था और कहा था, "भइया, तुमने तो यूनिवर्सिटी का मुँह नहीं देखा है, को-एजूकेशन क्या होती है, तुम क्या जानोगे ?” उस दिन बबलू ने धमकी देकर कहा था, “खूब समझता हूँ और तुम्हें भी अच्छी तरह से समझाऊँगा बहुत उड़ रही है, तेरे पर काटने पड़ेंगे।”

बबलू ने सुजाता के जीवन में जो जहर घोला था, उसकी ख्वाहिश को जिस तरह लिए सुजाता उससे घृणा करती है। किन्तु यह अजीब-सी विडम्बना है कि घृणा के बावजूद से कुचल दिया था, जिस ढंग से उसकी ज़िन्दगी के अमन-चैन को छीन लिया था, उसके सुजाता को बबलू के हाथ में राखी बाँधनी पड़ती है। राखी बाँधकर जब बबलू बहन को आशीर्वाद देता है, तो सुजाता मन ही मन कहती, "भइया, तुम जुग-जुग जीओ, सुखी रहो। पर तुमने मेरे साथ जो कुछ किया है, उसके लिए मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करूँगी, कभी नहीं। अगले जन्म में तुम जैसा मनहूस भाई भगवान मुझे ना दे, यही कामना हर रक्षाबन्धन के दिन करूँगी।"

शादी तय हो जाने से सुजाता खुश है। खुश है कि उसे इस दमघोटू वातावरण से मुक्ति मिलेगी, खुश है कि उसे उसके भाई की सूरत नहीं देखनी पड़ेगी, खुश है कि अब उसे 'बुचिया, ए बुचिया' करके कोई नाक दम नहीं करेगा। खुश है कि मोहल्ले की चाची जी, ताई जी, नानी जी, बुआ जी उसे कनखियों से नहीं देखेंगी और अब वे लोग उसकी मौज़ूदगी में उसकी माँ से शादी की इंक्वायरी नहीं करेंगी और सुजाता खुश है कि उसके रिश्तेदार अब खतों के अन्त में नहीं लिखेंगे, सुजाता की शादी का क्या हुआ ?

सुजाता नवीन सपनों की उधेड़बुन में लग गयी। उसके होनेवाले जीवनसाथी ने उसके सर्टिफिकेट व मार्कशीट देखकर उसकी प्रतिभा की तारीफ़ तो की ही थी, साथ ही साथ अचरज भी व्यक्त किया था कि उसने अपने कैरियर को मँझधार में डूबने क्यों दिया। मिहिर ने उससे कहा था कि उसे पढ़-लिखकर नौकरी करनी चाहिए। उत्तर में सुजाता ने कहा था कि उसके खानदान में बेटियों को अधिक पढ़ाने की प्रथा नहीं है, सिर्फ़ अच्छी व कुशल गृहिणी बनने की तालीम दी जाती है। घरवाले नौकरी चाकरी के विरोधी है। मिहिर ने उससे कहा था कि अगर वह लिख-पढ़कर कुछ बनना चाहेगी, तो वह पूरा साथ देगा, क्योंकि उसकी इच्छा है कि उसकी बीबी कमाऊ हो, ताकि दोनों की आमदनी से जीवन का स्तर बेहतर हो ।

सुजाता के मन की अतृप्त इच्छा अचानक जाग उठी। अति उत्साह के साथ उसने सारे सर्टिफिकेट, मार्कशीट, प्रशस्ति-पत्रों तथा तमाम नोट्स व किताबों को बटोरकर इकट्ठा किया। धूल की परतों को हटाकर सारी पुस्तकों पर कवर चढ़ाया और अलमारी में सजा दीं। अब वह सुबह अपनी मर्ज़ी से माँ के साथ काम में थोड़ा-बहुत हाथ बँटाती, फिर किताब खोलकर बैठ जाती। उसे पढ़ते देख उसकी माँ उत्साहित हो उठी, उन्होंने बेटी की पीठ थपथपायी और ब्याह के बाद पढ़ाई चालू करने की बात कही। सुजाता ने माँ के आग्रह को देख पढ़ाई शुरू करने की इच्छा जाहिर की। थोड़े दिनों की बाद वह यूनिवर्सिटी जाने लगी। वह मन लगाकर पठन-पाठन करने लगी और साथ-साथ नौकरी पाने के लिए कम्पीटिशन की तैयारी करने लगी।

मगर जब चार-पाँच महीने बाद सुजाता का इम्तहान निकट था, सुजाता ने अचानक गौर किया कि उसके अध्ययन में किसी को कोई दिलचस्पी नहीं है, बल्कि उसके पिता और भाई दोनों ही उसे यूनिवर्सिटी जाने से मना करने लगे। उसकी माँ ने जुबान पर ताला लगा दिया था। उनके चेहरे पर ना पहले जैसी खुशी थी और ना ही गम था। वह ज्यादातर गुमसुम रहतीं, चुपचाप अपने काम में लीन रहती और मन ही मन बुदबुदातीं।

सुजाता ने गौर किया कि उसके माता-पिता जब कभी आपस में बात करते, उस दौरान अगर वह दाख़िल हो जाती, तो तुरन्त बातचीत का विषय बदल जाता या फिर सन्नाटा पसर जाता। सुजाता को लगा कि शायद घरवाले उसकी शादी की बात उसके सामने नहीं करना चाहते।

फिर धीरे-धीरे उसके पिता और भाई हुक्म चलाने लगे। सुबह होते ही शुरू हो जाता 'बुचिया' 'बुचिया'। सुजाता वज़ह ढूँढ़ती। यूनिवर्सिटी में शीतकालीन अवकाश था। सुजाता दिन-रात पढ़ना चाहती, किन्तु बार-बार किताब बन्द कर हुक्म का पालन करना पड़ता। एक दिन परेशान होकर वह झुंझला उठी, "आप लोगों ने मेरा जीना दूभर कर रखा है। सिर पर इम्तहान सवार है, जब तब डिस्टर्ब करते हैं।"

-"किसके लिए पढ़ रही है तू ? मैं तो कहती हूँ यह पढ़ाई बढ़ाई बन्द कर घर बैठ। ज़्यादा लिख-पढ़ लेगी, तो तेरी शादी नहीं हो पायेगी।" माँ ने हताशा व्यक्त की। 

- "क्या ?" सुजाता स्तब्ध, हतप्रभ। किसी ने कुछ नहीं कहा।

सुजाता ने जब काफ़ी कुरेदा, तब उसकी माँ कमरे के भीतर जाकर लिफ़ाफ़ा ले आय और सुजाता को थमा दिया।

लिफ़ाफ़ा खोलते ही सुजाता सातवें आसमान से गिरी। उसकी तस्वीर और साथ में था एक पत्र । पत्र में लिखा था

"अत्यन्त दुःखी होकर मैं आपको आपकी बेटी की तस्वीर लौटा रहा हूँ। आपका घर-द्वार, आपके घर के लोग हमें बहुत अच्छे लगे थे। सुजाता बेटी की जितनी प्रशंसा करूँ, नाकाफ़ी होगी। किन्तु क्या बताऊँ, मेरे बेटे ने अभी पिछले हफ़्ते फोन पर बताया कि वह वर्किंग गर्ल से शादी करना चाहता है। उसने एक लड़की की सूचनी भी दी है। ऐसी स्थिति में मैं नहीं समझता कि बेटे को जोर-जबर्दस्ती राजी करवाना उचित होगा। आपकी बेटी सुजाता के लिए मंगल कामनाएँ करता हूँ।”

पत्र पढ़ते-पढ़ते सुजाता रूआँसी हो गयी। सुजाता ने देखा उसकी माँ पलंग पर बैठकर सुबक रही हैं, आँसुओं को रोकने की कोशिश कर रही हैं। अपना मनोबल मजबूत कर सुजाता ने कहा, "माँ! ऊपरवाला जो कुछ करता है, भलाई के लिए ही करता है। कहावत है शादियाँ स्वर्ग में तय होती हैं...... आप लोग बेवज़ह दिल छोटा न करें। मैं अपनी पढ़ाई जारी रखूँगी, इम्तहान दूँगी। मैं नौकरी की तलाश करूँगी, नौकरी कर लूँगी, तो किसी के भरोसे नहीं रहना पड़ेगा। किसी के आगे झुकना पड़ेगा, न दहेज का लफड़ा और ना लोगों की बेतुकी बातें।" बगलवाले कमरे से पिता ने कर्कश स्वर में कहा, "बुचिया! ज़्यादा बोलने लगी है। हम तेरे लिये फिर से लड़का ढूंढ़गे। कल से पढ़ाई-लिखाई बन्द । यह मेरा आदेश है।"

सुजाता पिता के सम्मुख जाकर दृढ़ता से बोली, “पापा! पिछली मर्तबा जब मैं घर बैठ गयी थी, उस समय सर्टिफिकेट के मुताबिक मैं अट्ठारह की नहीं थी। अब मैं अपना निर्णय लेने में सक्षम हूँ.. ...मै पीछे लौटनेवाली नहीं हूँ। आप अगर मेरा खर्च नहीं उठाएँगे, तो ना सही। मैं स्वयं अपना रास्ता ढूँढ़ लूँगी। यह मेरा फैसला है।" सुजाता के उत्तर से माता-पिता दोनों स्तब्ध रह गये।

सुजाता की शादी क्यों कैंसिल हो गयी, इसका जवाब देते-देते सुजाता के माता पिता तंग आ गये। पूरे मोहल्ले में, रिश्तेदारों में तरह-तरह की बातें होने लगीं। हर रोज कभी भाई या कभी बहन किसी से कुछ सुनकर घर आकर कहते और तत्काल घर का वातावरण गर्म हो जाता। लोगों को जवाब देने के भय से सुजाता की माँ ने घर से बाहर निकलना बन्द कर दिया। जाने-अनजाने उनका आचरण सुजाता के प्रति ख़राब होने लगा। छोटी-छोटी बातों पर वे रूठ जातीं और सुजाता पर गुस्सा उतारती बहुत दिनों तक सुजाता ने यह सोचकर माँ से कुछ नहीं कहा कि माँ की निराशा और बेटी की चिन्ता उनके आचरण में झलकती है, लेकिन एक दिन जब सुजाता दूध गैस पर चढ़ाकर पढ़ने लगी थी और दूध गाढ़ा होते-होते जलकर राख हो गया था और सुजाता दौड़कर किचन में खड़े-खड़े 'च्च-च्च' करके अफ़सोस करने लगी थी, उस समय उसकी माँ पीछे से आकर बरस पड़ी थी, "पता नहीं तेरा मन कहाँ पड़ा रहता है! तेरे कारण कितना नुकसान हुआ है!” तब सुजाता ने अपना धीरज खो दिया था, "माँ! मेरी तस्वीर क्या लौट आयी, आप सबों ने मेरा जीना दूभर कर दिया है... . अच्छा होता वे लोग तस्वीर ना लौटाकर थोड़ी-सी मोहलत माँग लिए होते, कम से कम और कुछ दिनों तक मैं सुजाता तो बनी रहती। माँ! मेरी तस्वीर लौट आयी है, तो इसमें मेरा क्या क़सूर ?. ..अब से अपनी गृहस्थी आप खुद सँभालिए, सब लोग अपना-अपना काम खुद किया करें। सभी सक्षम हैं.... .. अब मैं और बुचिया नहीं बनूँगी।"

माहौल गर्म हो उठा। माँ का चेहरा तमतमा उठा, होंठ फड़फड़ाने लगे, कटाक्ष दृष्टि से बेटी को देखने लगीं। फनफनाती हुई सुजाता कमरे से बाहर निकलने लगी कि उसके पिता हाथ में एक पैकेट मिठाई लेकर प्रसन्नचित्त मुद्रा में कमरे के भीतर दाख़िल हुए और उल्लसित होकर बोले, "अभी-अभी इण्टरनेट में रिजल्ट देखकर आ रहा हूँ, सुजाता को बैंक की नौकरी मिल गयी है। वेल डन माई गर्ल, खूब तरक्की करो! मे गॉड ब्लेस यू।"

खुशी के मारे सुजाता उछल पड़ी। उसने माता-पिता का चरण स्पर्श किया। माँ ने बेटी को गले से लगाया। अपार खुशी का इज़हार करते हुए पिता बोले, “मुझे नाज़ है बेटी तुम पर, तुमने चमत्कार कर दिखाया। तुमने मेरी सोच बदल डाली। मुझे अब तुम्हारी शादी के लिए चप्पलें नहीं घिसनी पड़ेंगी, रिश्ते खुद चलकर आएँगे।" कुछ शर्मिन्दगी से सुजाता बोली, "पापा बस । मैंने इतना कमाल नहीं किया है। आजकल तो यह आम बात है, लड़कियाँ क्या कुछ नहीं कर रही हैं।”

अगले दिन सुबह-सुबह फोन की घण्टी बजी। सुजाता की माँ ने रिसीवर उठाकर कुछ सुना, कुछ कहा, फिर सुजाता की ओर रिसीवर बढ़ाकर कहा, "लो बेटी, एक और खुशखबरी.."

- "बधाई हो! मैं बहुत खुश हूँ......... बधाई !!”

-“हैलो! हैलो........ . सुजाता खुश हूँ....... बधाई !!"

-"हैलो! हैलो!........सुजाता न ?”

-“जी! मैं सुजाता।”

-" मेरी बधाई क़बूल नहीं करोगी ?. ...मैं मिहिर ।"

- "सॉरी रांग नम्बर !" सुजाता ने गुस्से से रिसीवर पटक दिया। सुजाता के माता-पिता बेटी की आँखों में एक चमकती धार को लौटता देख रहे थे।
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© सुभाष चंद्र गाँगुली
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( "कहानी की तलाश" कहानी संग्रह से, प्रथम संस्करण: 2006)
* पत्रिका ' वनिता ' अगस्त 2010 मे प्रकाशित ।