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Wednesday, April 12, 2023

नींबू का पेड़

                       
     इस समय मैं अपने प्रिय पार्क में हूं। कभी यहां से बहती रही एक नदी । एक दो पुराने मकानों पर ' रिवर  साइड '( नदी तट पर ) लिखा हुआ मिलता है । धीरे-धीरे नदी ने अपना रास्ता बदल लिया था कभी । कछार बना रहा बहुत दिनों तक । बीसवीं सदी में पचास-साठ के दशक में नगर निगम ने इस जगह पर दो-ढाई सौ वर्ग गज जमीन पर मकान बनवा कर सस्ते में मात्र सात-आठ हजार में बेच कर इस जगह को आबाद किया था । तीन-चार कॉलोनियां बनायी गयी थी। यहां से न्यायालय पास होने के कारण यहां जमीन की कीमतें बढ़ते-बढ़ते कहां से कहां पहुंच गई है । आज कोई मकान बेचता है तो उसे दो-ढाई करोड़ मिल जाता है। ज़्यादातर मकानें गिराकर दुबारा बनाये गये हैं । एक से एक ख़ूबसूरत मकान है इस एरिया में। जिनलोगों ने मकान खरीदा था आज उनकी तीसरी-चौथी पीढ़ी रह रही हैं जो काफ़ी सम्पन्न हो गये हैं ।  बड़े-बड़े वकिल, जजेस,  रिटायर्ड आईएएस, आईपीएस,कई बड़े बिजनेसमैन रहते हैं यहां । इस एरिया में छोटे बड़े कुल चार पार्क हैं, उनमें से सबसे बड़ा और सबसे ख़ूबसूरत पार्क है मेरा यह पार्क । बेशुमार पेड़ हैं बाउंड्री वॉल के चारों ओर । जिस किसी ने पेड़ लगाए थे बड़ी प्लैनिंग के साथ लगाये थे।
आम के दो पेड़, लीची के एक, जामुन के एक, एक साइड में तीन देवदार, एक नीम के पेड़, देवदार के दो; एक साइड में एक आंवला , दो गुलमोहर,अमलतास, अमरुद के चार ,नारंगी के दो , दो छोटे-छोटे नींबू के पेड़ और हैं दो बड़े-बड़े नींबू के पेड़ ।
बांउड्री के बाहर चारों ओर रहने वालों ने एक ' रेसिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन' बना रखा है जो पार्क की ख़ूबसूरती , फल-फूलों का हिसाब रखते हैं । 
        पार्क के अंदर-बाहर जगह-जगह लिखा हुआ है " फल-फूल तोड़ना मना है। अवज्ञा करने वालों को दंडित किया जाएगा - वेलफेयर एसोसिएशन " । पार्क के बाहर दो फाटक के पास नोटिस बोर्ड जमीन पर गाढ दिया गया है जिस पर लिखा है " पार्क के पास रहने वाले निवासियों द्वारा पार्क का रखरखाव किया जाता है इसलिए बाहरी लोगों का प्रवेश वर्जित है -- वेलफेयर एसोसिएशन "। जब भी इस पर मेरी नज़र पड़ती मुझे तकलीफ़ होती।
         सारे फल-फूल कहां जाते हैं मैंने जानने की कोशिश नहीं की। कभी-कभार सुनने में आता है कि फल-फूलों के हिसाब को लेकर वेलफेयर एसोसिएशन की मीटिंग में तू-तू मैं-मैं हो गई थी।
          किन्तु बडे-बड़े नींबू के दो पेड़ों को देखकर मुझे कौतूहल होता है कि इसके फल पेड़ों पर जस के तस क्यों लगे रहते हैं ? ये फल बच्चों के खेलने वाले छोटा फूटबाल का आकार ले लेता है । हरा रंग पीला होकर गिर जाता है, फिर सूख जाता है किन्तु कभी कोई हाथ नहीं लगाता। 
   मैंने जानने की कोशिश की कि ये कौन सा पेड़ है, किस तरह के फल निकलते हैं ? 
      मैंने जाना कि अधिकतर लोगों को पता ही नहीं क्या है किन्तु काफ़ी लोगों ने कहा था कि ये जंगली पेड़ हैं, इसका फल नहीं खाया जाता, मेरे एक मित्र जो अल्मोड़ा में रहता है ने कहा था कि यह पहाड़ी पेड़ है, खट्टा होता है, पहाड़ पर रहने वालों के लिए ठीक है, वे नमक, धनिया, मिर्चा, मूली के साथ खाया जाता हैं । किन्तु इसका फल यहां वालों को नुक्सान करेगा । फिर किसी ने कहा था यह 'चकोतरा' है बहुत ज्यादा खट्टा होता है,अमूमन लोग खाते नहीं ।
              मेरी जिज्ञासा बनी रही । अच्छे-अच्छे पेड़ों के बीच ये जंगली पहाड़ी अनुपयोगी पेड़ किसी ने क्यों लगाया होगा !
जाड़े में एक दिन मैं धूप लेने पार्क पहुंचा। 
बड़े नींबू के एक पेड़ के पास एक औरत बेंच पर बैठी थी । वो पेड़ों में लदे बड़े-बड़े नींबुओं को बड़े चाव से देख रही थी। मैं वहां रुक गया ।‌‌‌‌‌ मुझे देख वह सकपका गई और फिर नज़रें हटा ली। मैंने पूछा -" ये किस चीज का पेड़ है जानती हो ?"
उसने बांग्ला में उत्तर दिया " दादाजी ये नींबू का पेड़ है ।"
----" नींबू का पेड़ ? खाया जाता है क्या ? कुछ लोग इसे ' चकोतरा ' कहते हैं, यहां रहने वाले ज़्यादातर लोग इसे ' जंगली ' कहते हैं ।"
----"  ये बंगाल, बिहार में खूब पाया जाता है, इसका नाम है' बाताबी नींबू '। शरत काल में जब दुर्गा पूजा उत्सव का टाइम होता है तब फलता है, दो-ढाई महीना मिलता है । पीलिया रोगी के लिए यह रामबाण है। इसे खाने से कमजोर लिवर वालों का लिवर ठीक रहता है । इसे खाने से ब्लडप्रेशर कन्ट्रोल में रहता ।"
---"अच्छा इतना उपयोगी ?"
--" इससे दवा भी बनता है ।"
--" अच्छा !!"
--"तुम कहां की हो ? बांग्ला तो ठीक बोल लेती मगर बोली बांग्लादेश की है । बांग्लादेश की हो ?"
--"जी नहीं मैं इस देश की हूं । मेरे परदादा चट्टोग्राम से आये थे आजादी से पहले। शरणार्थी बनकर जब ' बंगाल' का विभाजन हुआ था और फिर यहीं के हो गए थे। मैं चौथी पीढ़ी की हूं ।"
-"जो बोली तुम बोल रही हो वह कहां की बोली है ? बंगाल की ?"
-" जी नहीं ये चट्टोग्राम की बोली है । चट्टोग्राम अब बांग्लादेश में है । हमारे घर के बड़े बुड्ढे लोग यही बोली बोलते हैं । हमारा भी इसका अभ्यास है । थोडा-थोडा हिन्दी बोल लेती हूं । " ( उसने सारी बातें चट्टोग्राम और बांग्ला भाषा मिश्रित में की थी )
---"बंगाल में कहां रहती हो ?"
---" नैहाटी में ।"
--" यहां कैसे ?"
  --"पूजा पंडाल बनाने । पति साथ में है । दुर्गा पूजा उत्सव के लिए ढेर सारे लोग आते हैं  ।"
--" हां हां हर साल हम देखते हैं ढेर सारे लोग आ जाते हैं शहर में, पूजा से पहले ।"
---" कहां-कहां से आते हैं सब ? "
---" पंडाल के लिए बांसबेरिया, नबोद्वीप, नैहाटी कृष्णनगर, हुगली से आते हैं । ढाकी वाले वर्धमान में एकत्र हो आते हैं, पूजा से पहले । वहीं पहुंच कर लोग ले आते हैं । लाइटिंग के लिए चन्दननगर मशहूर है। और मिदनापुर से पुरोहित आते हैं । मगर बाबू आप इतना क्यो पूछ रहे हैं? "
--" ऐसे ही अपनी जानकारी के लिए और लोगों को जानकारी देने के लिए। बहुत से लोग जानना चाहते हैं, पूछते हैं । "
--" तुम्हरा क्या नाम है ?"
--" अनिता नस्कर । शादी से पहले हम सरकार लिखते थे ।"
--"अच्छा।"
--" बाबू आप फौज में है या पुलिस में ?"
--" कहीं नहीं। मैं अध्यापक था। क्या मैं पुलिस लगता हूं ?"
--" जी । बड़ी-बड़ी ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌मूंछे जो हैं ।" 
---" हर बड़ी और मोटी मूंछों वाला फ़ौजी या पुलिस में हो यह जरूरी नहीं है। अच्छा हम चलते हैं, बहुत दिनों के बाद बांग्ला बोलने का मौका मिला सो तुमसे बोल लिया, मन खुश हो गया।  इस शहर में पहले अनेक बंगाली रहते थे, धीरे-धीरे नौकरी-चाकरी के चक्कर में महानगरों में या विदेशों में चले गए। अब तो उंगलियों पर है । अच्छा चलता हूं । तुमलोग हमेशा खुश रहो, कुशल रहो ! "
                  थोड़े दिनों के बाद मैं बीमार पड़ा, गम्भीर हालत में अस्पताल पहुंच गया । ग्यारह दिन बाद छुट्टी मिली। ढेर सारी हिदायतें दी गई ।
बेटी कोलकाता से आ गई और देखभाल करने के लिए हमें ले गयी ।
              वहां कामवाली बाई को जब पता चला कि मेरा लिवर काफ़ी डैमेज हो गया है और मैं नियमित दवाइयां ले रहा हूं तो वह एक दिन दो बड़े-बड़े नींबू ले आयी और बोली " काकू ये तुम्हारे लिए ले आयी हूं । इसे रोज एक खाया करो लिवर ठीक हो जाएगा ।"
-" यह क्या है देखे-देखे ! अरे यही फल तो हमारे पार्क में होता है । वहां किसी को मालूम ही नहीं है कि ये खाने की चीज़ है और उपकारी है ।"
वो बोली " यह लिवर ठीक रखने के लिए बहुत लाभकारी है । जो लोग स्वस्थ रहते हैं वे भी खाते हैं, उन्हें जान्डिस नहीं होता । ये फल जाड़े में ही मिलता है लगभग दो महीने । "
--" थैंक यू । आज पहला दिन तुम काटकर खिलाओ देखे कैसे खाया जाता है ।"
एक दिन कामवाली बाई एक अखबार कटिंग लाकर इस फल के बारे में पढ़ने को कहा - " चीनी लोग क्या तोड़कर इकट्ठा कर रहे हैं? ( बाताबी नींबू के पेड़) क्लू- बहुत ही शानदार स्वाद और खुशबू वाला फल है।
 हमारे यहां ये हमेशा बेकद्री का शिकार रहा मगर अब चीन से सुंदर पैकिंग में आकर 200 रुपये का एक बड़े मॉल्स में बिक रहा है,मैं पिछले साल 10 रुपये का एक लाया था । इस साल मिला नहीं। जैसा कि पता चला ये चकोतरा है जो प्रायः लड़कियों के स्कूलों के पास, इमली, बेर,अमरख, कैथा आदि के साथ बिकता देखा जाता रहा है।बेहतरीन खुशबूदार फल है, मीठा होता है । नींबू प्रजाति का सबसे बड़ा फल है।"
              मैं दवाइयां तो लेता ही रहा इस नींबू का भी सेवन किया जब तक मिला ।  महीनों बाद स्वस्थ होकर मैं घर लौट आया ।
हफ्त़ा-दस दिन बाद पार्क जाना हुआ । अभी दुर्गापूजा होने में दो माह बाकी था। पंडाल बनने का काम शुरू हो चुका था । पार्क के अंदर चारों ओर किनारे-किनारे पैदल चलने के लिए पगडंडी बनी हुई है। चार राउंड चलने पर एक किलोमीटर हो जाता है । दो राउंड चलने के बाद तीसरे राउंड में मैं धीरे-धीरे चलते-चलते एक एक पेड़ को निहारने लगा। अचानक मेरी निगाहें थम गईं । अरे ! नींबू के पेड़ कहां गए ? यहीं पर तो थे ! हां इसी बेंच के पीछे । नहीं दोनों नहीं है । अब वहां दो अन्य पेड़ बड़े हो रहे हैं।
   बेंच पर बैठे-बैठे मैं कभी पेड़ों को देखता तो कभी पंडाल बना रहे ऊपर बल्ली पर बैठे मजदूरों को देखता।
            किसी न किसी भाव ('कनसेप्ट ') पर हर साल पंडाल बनाया जाता है। पिछले साल बना था दक्षीणेश्वर, उससे पहले बना था रामकृष्ण परमहंस का गांव ' कामारपुकुर ', इस साल सुना है ' विवेकानंद मेमोरियल' बनेगा । इस साल दुर्गा पूजा का स्वर्ण जयंती समारोह है ।'
              मैं बैठें-बैठे सोच रहा था कि सारे के सारे पेड़ अपने स्थान पर है किन्तु नींबू के पेड़ क्यों उखाड़ दिए गए ?
              अचानक एक मज़दूर आकर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया फिर चरण स्पर्श किया ।
---" तुम्हें मैंने पहचाना नहीं ।"
----" अनिरुद्ध नस्कर । अनिता नस्कर का पति ।
पिछले साल आपने अनिता से नींबू के पेड़ के बारे में बात की थी । याद आया ?"
---" हां हां याद है। अनिता किधर है ? आज आई नहीं ?"
             वह रो पड़ा । रोते-रोते बोला --" अब वह कभी नहीं आएगी । मार डाला गुंडों ने । "
---" मार डाला ? क्यो ? कब ? कैसे ? क्या हुआ था ?"
---" बाबू यहां जो ' बाताबी नींबू ' के पेड़ थे वह दो दिन एक एक नींबू तोड़कर घर ले गयी थी । मेरे बेटे को कोरोना हो गया था तब से लिवर कमजोर हो गया था........ अनिता के मरने के पांच महीने बाद बेटा भी हमें छोड़कर मां के पास चला गया।"

       वह और भावुक हो गया । बोला -" तब यहां पंडाल बनना शुरू भी नहीं हुआ था । एक दिन  दोपहर को वो अकेली आयी थी । दो नींबू तोड़कर एक छोटी थैली में भर चुकी थी..." कहते-कहते वह फूट-फूट कर रोने लगा फिर कहा-" बोलो आगे बोलो ।"
उसने कहा-" पता नहीं उसी समय कहां से दस-बारह लड़के उसके पास पहुंच कर बोलें " तुम ससुरी बंग्लादेशी चोरी करती हो ? "
डांट-फटकार कर झोला छीन लिया फिर वह भीड़ हमलावर हो गई । वे अनिता को मारते-मारते बोले-" साली रोहिंग्या बांग्लादेश से आई है, गंदगी फैला रही है । एक मजदूर ने जो बांस बल्ली की रखवाली कर रहा था कई  बार कहा कि वह बंगाली है, बंग्लादेशी नहीं है किंतु किसी ने उसकी बात ही नहीं सुनी । अनिता थर-थर कांप रही थी । किसी तरह भाग निकली । किसी ने पीछे से उसे धक्का मारा, वह आठ सीढ़ी नीचे फुटपाथ पर जा गिरी थी । वे सब लात घुसा मारकर भाग गए थे। घंटों पड़ी थी वह सड़क किनारे । ख़बर पाकर हम जब पहुंचे तो वह मर चुकी थी।"
--" थाने में रिपोर्ट लिखवाई थी ?"
-- " पुलिस ने जन्म प्रमाण-पत्र मागा था ।"
--" मैंने कहा हमलोग काम पर निकलते हैं प्रमाणपत्र साथ नहीं रहता । आप रिपोर्ट लिखिए सर जांच करिए । वो बोला सबूत है तुम्हारे पास ?
मैंने कहा एक मजूर ने देखा था मगर वह कह रहा है कि वह किसी को नहीं पहचान पाएगा सब एक जैसे लग रहे थे, सब लाल लाल गमछा सर पर बांधे हुए थे । पुलिस ने हमें डांट कर भगा दिया। बोला भाग नहीं तो तेरे को अंदर कर दूंगा । तुने ही मारा होगा । "
मैं लगभग सदमे में पहुंच गया । मैंने कहा"ईश्वर अनिता की आत्मा को शांति दे !" 
--"‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌ बाबू पहले हम भी ईश्वर को बहुत मानते थे ।" 
वह फूट-फूट कर रोने लगा। उसका रुदन थमने का नाम नहीं ले रहा था । 
थोड़ी देर और मैं रुकता तो शायद मैं भी रो पड़ता।


© सुभाषचंद्र गांगुली 
31/03/2023
( 'कहानी कहानियां पार्क की'' के अंतर्गत 18/03/2023 से शुरू 20/04/2023को खत्म हुआ)
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Friday, March 3, 2023

डूबता सूरज



           एक दिन कार्यालय का एक कर्मचारी पर्दा हटाकर ' में आई कम इन ?' कह कर सहसा कमरे में दाखिल हुआ। मैंने दीवार की ओर रखी विजिटर्स कुर्सियों की ओर संकेत देकर बैठने को कहा , फिर पूछा - 'बोलिए !'
उसने कहा -' सर यह जानना था कि आपको मेरे पिताजी की चिट्ठी मिल गई है या नहीं ?'
-' किस सम्बन्ध में ? फंड या पेंशन ?'
- ' यह सब नहीं सर, कुछ और होगा। मेरे पिताजी आपको या आपके पिताजी को जानते रहें होंगे ।'
- 'अच्छा बोलिए काम क्या है ?'
-'सर मेरे पिताजी का देहान्त हो गया है। कानपुर में बहन के ससुराल में तीन साल से थे। उन्होंने कभी आपके नाम एक पत्र लिखा था । पिताजी ने जब बिस्तर पकड़ लिया था, बहन के हाथ वह पत्र लगा , पिताजी से पूछने पर उन्होंने कहा कि वे पोस्ट करना भूल गए थे, वह बहुत जरूरी लेटर है, उसके बाद पिताजी ने बहन को याद भी दिलाया था किन्तु लिफ़ाफ़े पर आपका नाम, पदनाम, कार्यालय का अधूरा पता था । बहन ने मुझसे आपके घर का पता मांगा था, मैंने कलेक्ट कर भेज दिया था । लगभग एक महीना हो गया है। बहन ने मुझसे  पता करने को कहा कि आपको पत्र मिल गया है या नहीं ।'
- ' नहीं । कोई लेटर नहीं मिला। नाऊ यू में गो। '
                बड़ा अचरज लगा कि उसके पिताजी को कौन सा जरूरी काम था! किस वज़ह से पत्र लिखे होंगे। ऐसा क्या कि बेटे को भी मालूम नहीं था। वह बोला , चला गया, बाद ख़त्म।
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               महीनों बाद दीपावली से पूर्व घर की सफ़ई चल रही थी, मैं अपनी पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों  को अरेंज कर रहा था, तभी मेरे हाथ एक लिफ़ाफ़ा लगा जिसे खोला ही नहीं गया था। पत्र बांग्ला में था जिसका  अनुवाद --' महाशय, आपका रजिस्टर्ड लिफ़ाफ़ा मिल गया था। फ़ॉर्म जमा करने के तीन महीने बाद मुझे पेमेंट भी मिल गया था। आपका आभार। आप खूब उन्नति करें, सुखी रहें। एक पिता का आशीर्वाद ग्रहण करिएगा। पत्र का उत्तर देने की जरूरत नहीं।'
पत्र में न नाम और न ही ठिकाना था।
बड़ी हैरानी हुई। कुछ समझ में नहीं आया। तरह- तरह के कयास लगाने लगा। शायद इसी पत्र की जानकारी लेने आया था वह कर्मचारी । बहुत माथापच्ची के बाद याद आ गया एक वाक़या ।
उन दिनों मैं अस्वस्थ था । इलाज चल रहा था। रीढ़ की हड्डी का एक्सरे कराने सुबह-सुबह मैं 'कमला नेहरू अस्पताल ' पहुंचा था । कुछ लोग मेरे आने से पहले से ही डटे हुए थे। आठ बजे से काम शुरू होने वाला था। 
जिन्हें आठ नम्बर मिला था वे क़रीब अस्सी वर्ष के बुजुर्ग थे, स्मार्ट, आकर्षक। मेरे पास आकर बैठ गए। वे थोड़ी-थोड़ी देर बाद एक्सरे क्लिनिक में झांकते या फिर अस्पताल के कार्यालय में जाते, फिर वापस आकर अपनी जगह बैठ जाते। 
उनकी बेचैनी देख मैंने उनसे कहा -' चार नम्बर चल रहा है, अभी देर है। आप चाहें तो मेरे टर्न पर चले जाइएगा । मुझे सात नम्बर का टोकन मिला है। '
अब वे थोड़े इत्मिनान से मुझसे बात करने लगे।
' आप कहां के बंगाली हैं ? पूर्व बंगाल या पश्चिम बंगाल के ? 
- 'पता नहीं कहां का। मैं इलाहाबादी हूं। जन्म, शिक्षा, नौकरी सब यहीं।'
-' बांग्ला समझते हैं ? प्रवासी बंगाली तो बांग्ला से दूर हो गये हैं।'
-' जी। बांग्ला जानता हूं। अच्छी तरह। बांग्ला साहित्य भी खूब पढ़ा। किन्तु मैं पक्का इलाहाबादी हूं । हिन्दी जुबान पर पहले आती है मातृ भाषा की तरह।'
-'देश विभाजन के बारे में जानते हैं?' 
'-थोड़ा बहुत।'
-' मैं पूर्वी बंगाल का हूं। ' बांगाल' कहते हैं लोग।चट्टोग्राम का नाम तो जानते ही होंगे। वहीं का हूं। पार्टिशन के समय आया था रिफ्यूजी बन कर। ....... कठिन समय था । बहुत बड़ी आफ़त थी। चारों ओर लूटपाट आगजनी ।  अभूतपूर्व भगदड़ मची थी। हम पागलों की तरह दौड़ रहे थे घर दुआर छोड़ कर, कहां जा रहे थे पता न था, रास्ते में लोग छूट रहे थे, मर रहे थे। 
चट्टोग्राम, फरितपुर,बरिशाल,नोआखालि सब जल रहा था। गांधी जी बार बार शांति की अपील कर रहे थे, अब इतना उन्माद फैल चुका था कि उन्हें कोई सुनने वाला नहीं था। गांधी नोआखली में अनशन पर बैठ गए थे।
 पन्द्रह-सोलह लाख लोग मर गए थे। दो-ढाई करोड़ लोग  बेघर हो गए थे। शरणार्थियों को जगह-जगह स्थापित किया गया था, रिफ्यूजी कॉलोनियां बनाईं गई, लोगों को सरकारी नौकरियों  में रखा गया, गैर सरकारी नौकरियां भी मिलीं। फिर भी अनेक लोग संघर्षरत रहें, आज भी विस्थापित होने का दर्द झेल रहे हैं। '
-' छोड़िए जो होना था हो गया। अतीत लेकर पड़े रहने से कोई आगे नहीं बढ़ सकता।'
क्लिनिक से एक आदमी बाहर आकर बोला- 'टोकन नंबर सिक्स।'
अचानक वह बृद्ध उठ खड़े हुए। 
मैंने उनसे कहा - 'अभी नहीं। इसके बाद चले जाइएगा।'
मुझे अनसुनी कर वह आगे बढ़ गयें । नंबर बोलने वाला भीतर जा चुका था, तब भी वह बृद्ध भीतर झांक कर तुरन्त निकल आयें, फिर अस्पताल के भीतर झांककर लौट आएं ।
 बड़े गुस्से से बोलें -' एक तो लोग टाइम से नहीं आते फ़िर कुछ पूछो तो सीधे मुंह बात नहीं करते । मदद करना दूर उल्टे परेशान करते। लाटसाहेब हैं सब लाटसाहेब हैं। क्या दिन आ गए.... हमारे समय तो.....'
-' क्या हुआ कोई ख़ास प्रॉब्लम?'
उन्होंने जोश में कहा - ' हमारे समय कितना डिसिप्लिन था, लोग पंचुअल और रिस्पांसिबल थै। अब कौन किससे कहेगा, किस मुंह से कहेगा, वे भी तो उसी रंग में रंग गए हैं।' 
मैने बात काट कर कहा- 'ऐसी बात नहीं है, दो चार प्रतिशत हो सकते हैं किन्तु अधिकतर लोग हाथ पर हाथ धरे रहते हैं, डिमाक्रेसी जो है , चले न जायेंगे बाबू लोग किसी नेता को बुलाने, माइनारिटी कमीशन,एस सी एस टी कमीशन,किसी न किसी को शिकायत कर देंगे, कम्यूनल, कास्ट कोई चार्ज लगा देंगे, टोटल सिस्टम फेल।'
उनके अनर्गल प्रलाप से ऊब कर मैंने उनसे कहा-'अभी आपका नम्बर आएगा, शांति से बैठिए यहां। मैं भी सिस्टम का पुर्जा हूं, इसी सिस्टम में रहकर काम करना और काम करवाना पड़ता है, आपका कोई काम हो तो बताइए।'
-' में पेंशनर हूं, थोड़ी सी पेंशन मिलती है उसी मे से कुछ खर्च कर मेडिकल टेस्ट कराया, रुपया पाने के लिए मेडिकल क्लेम करना पड़ेगा मेडिकल क्लेम के लिए फार्म चाहिए जिसके लिए दर-दर भटक रहा हूं। '
--' यहां नहीं मिलेगा, सीजीएच डिस्पेंसरी में मिलेगा, वैसे मेरे कार्यालय में भी मिलता है।'
-'आप किस कार्यालय में हैं?'
-' आडिट आफिस में '
- 'वहीं तो मेरा बेटा है '।
-' क्या नाम है उसका ?'
ख़ामोश हो गये थे थोड़ी देर के लिए। फिर एक रुपए का सिक्का मेरे हाथ में रख कर बोलें-'मै अपने घर का पता लिख देता हूं, लिफ़ाफ़े में फ़ार्म भर कर कांइडलि भेज दीजिएगा।'
हालांकि मैं उनके चेहरे से जान गया था कि उनके साथ उनके बेटे का सम्बन्ध स्वाभाविक नहीं था फिर भी मेरे मुंह से अनचाहे ही निकल गया  ' आपके बेटे का नाम बताइए मैं उसे दे दूंगा।'
उनका चेहरा तमतमा उठा। कानों की बगल की नसें केंचुए जैसे चलने लगें।
 वे बोलें - 'तो फिर मैं आपसे क्यों कहता ? आप अगर भेज सकते तो बताइए मैं घर का पता लिख दूंगा।'
-' प्लीज़ नाराज़ न होइए, घर का पता लिख दीजिए, मैं भेज दूंगा ।'
अपने जेब से नोटबुक निकाल कर पता लिखकर कागज़ का टुकड़ा मुझे दे दिया और एक रुपए सिक्के को मेरे जेब में डाल दिया। सिक्के को मैं लौटाना चाहता था किन्तु उनकी हालत देख मैंने चुप रहना उचित समझा।
इतने में एक्सरे क्लिनिक से वही सहायक निकल कर जोर से बोला -' सात नम्बर ! सात नम्बर !'
मैंने उनसे कहा - ' आप जाइए! '
वह उठ खड़े हुए,चार कदम आगे चलकर फिर पलट कर देखा, आंखों की कोर हल्की गिली थी किन्तु चेहरे पर गम भरी मुस्कान, मेरे निकट आकर से बोलें -' डूबते सूरज को कौन पूजता ?'

 © सुभाषचंद्र गांगुली 
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* Published in October -December issue 1996 'दस्तक ' बहादुरगढ़, हरियाणा, सम्पादक - सूरत सिंह
* Re-written 29/2/2023--3/3/2023

Sunday, February 12, 2023

हस्ताक्षर का मूल्य


       
दफ़्तर से घर लौटते समय ' लुम्बिनी' हास्पिटल के सामने कम्पनीबाग के ॲपोजिट फुटपाथ पर लगी पुरानी किताबों को देख कर मैं चकित हुआ। स्कूटर खड़ी कर किताबें देखते-देखते मैंने पूछा - " यहां कब से दुकान लगाने लगे ? मैं तो तुम्हें वहीं सिविल लाइंस में ढूंढ रहा था बार-बार। इस अस्पताल के सामने बिकती भी है ?"
- " छः महीने से यहीं पर है। खूब बिकती है। इस अस्पताल के भीतर ट्रांजिस्टर, टीवी कुछ भी नहीं चला सकते। जिन्हें  कई-कई दिन ठहरना पड़ता है और जो मरीज़ पढ़ने की स्थिति में रहते हैं उनके लिए भी किताबें जाती हैं। "
- " सच ! जो लोग ठहरते हैं वे पढ़ते भी हैं ?"
-" क्यों नहीं। इस अस्पताल में मामूली लोग थोड़े ना आते हैं। यहां के रेट्स शायद सबसे हाई हैं, यहां सिर्फ़ हैसियत वाले और पढ़ें लिखे लोग आते हैं , वैसे तो अब पढ़े-लिखे लोग भी दूर होते जा रहे हैं। जब भी फ़ुर्सत मिले तो टीवी पर नज़र गड़ाए रहते हैं किन्तु यहां किताब पढ़ना उनकी मजबूरी हो जाती है । "
-"तुम यहां किताब केवल किराये पर देते हो या बेचते भी हो ?"
-" किराये पर क्यों दूं? एक किताब के लिए पचास पैसे या एक रुपया रोज़ से ज़्यादा कोई देना नहीं चाहता। क्या फ़ायदा जब पेट नहीं भरेगा उस तरह से। खरीदने वाले बड़े शौक से खरीद कर ले जाते हैं फ़िर अस्पताल छोड़ते समय हमें हाफ रेट पर बेच जाते हैं, जैसे नहान के अवसर पर एक गाय दिन में सौ-सौ बार बिक कर दान में चढ़ जाती है वैसे ही एक-एक किताब भी महीने में अनेक बार बिक जाती है।"
- " वाह भाई वाह ! क्या दिमाग है उस्ताद !‌‌
हम चलते हैं, हम तो किराये पर लेना चाहते थे। बराबर किराये पर ही लेता रहा।"
-" आप चाहेंगे तो भाड़े पर ही दे दूंगा, आखि़र आप  हमारे पुराने कस्टमर हैं ...... कौन सी किताब लेंगे सर ?" 
--" देखता हूं...... यह कितने में ‌‌‌बेचोगे ? "
- "पचास रुपए में ।"
-" पचास रुपए !!"
- " बाबूजी यह बहुत मशहूर उपन्यास है, इसकी कीमत इस समय चार सौ रुपए हैं। "
--" तुम्हें कैसे पता कि बड़ा अच्छा उपन्यास है और इस समय चार सौ की है। पढ़े थे किताब क्या ?"
-" अरे सर आप भी ख़ूब मज़ाक कर लेते है। मैं तो बस नाम-वाम पढ़ लेता हूं। बाबूजी इतनी जानकारी तो रखनी ही पड़ती है वर्ना धंधा कैसे करेंगे।"
-" मगर किताब तो काफ़ी पुरानी है, उस समय बारह रुपए की थी।"
-" उससे क्या? आज अगर आप इसे खरीदें तो आपको चारसौ देना होगा। "
- " लाओ देखें।"
किताब हाथ में लेकर जिल्द खोलते ही में दंग रह गया। उपन्यासकार ने अपने कर कमलों से         " सादर सप्रेम " लिख कर एक मशहूर साहित्यकार को भेंट किया था । आज की तारीख़ में भेंटकर्ता सिर्फ़ मशहूर ही नहीं बल्कि साहित्य के अभिन्न अंग हैं।
मुझे यह सोचकर हैरानी हुई कि जिस साहित्यकार को वह किताब भेंट की गई थी वह अब भी सक्रिय साहित्यकार हैं और वह उपन्यासकार अब इस दुनिया में नहीं हैं, उनके हस्ताक्षर को फुटपाथ पर पड़े रहने देने में मुझे अजीब कष्ट हो रहा था। इससे पहले कि वह पन्ना किसी दिन अलग हो जाए और किसी के जूते के नीचे आ जाए, मैंने उस किताब को पचास रुपए में ही खरीद लिया।

© सुभाषचंद्र गांगुली               
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पत्रिका ' दस्तक ' बहादुरगढ़ -सोनीपत
के नवम्बर 2001 अंक में प्रकाशित।