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Thursday, January 12, 2023

कहानी- फकीर


अपने कार्यालय के भीतर प्रवेश करते समय मैंने देखा कि पंडित की चाय की दुकान पर बहुत भीड़ है, हो-हल्ला हो रहा था। भीड़ देख पास से गुजरने वाले रुकते जा रहे थे। लंच के समय हम उसी दुकान पर मजमा लगाते। राजनीतिक चर्चायें
करते, हँसी-मजाक करते। हमने उस जगह का नाम 'नुक्कड़' रखा था। मुझे दफ्तर के भीतर लगी बायोमैट्रिक मशीन पर अंगूठे का निशान देकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की जल्दी थी। यह मशीन हाल ही में आयी थी। सुबह-शाम उसे अंगूठा दिखाना होता और टाइम नोटिंग के साथ हमारी उपस्थिति दर्ज हो जाती।

हाजिरी वाच करने के लिए मशीन हमारी बॉस बन गयी थी और हम सब अंगूठाछाप । मशीन से छुटकारा पाते ही मैं दो-चार साथियों के साथ 'नुक्कड़' पहुँचा। देखा कि बेंच पर फकीर का मृत शरीर पड़ा हुआ हैं।

चाय की दुकान पर एक फकीर क़रीब साल भर से आने लगा था। शुरू-शुरू में वह किसी से बात न करता, चुपचाप एक कोने बैठा रहता। कभी-कभार दिन-दिन भर बैठा रहता। कोई चाय पिलाता तो पी लेता, कोई कुछ खाने देता तो खा लेता फिर चला जाता। वह कहाँ से आता, कहाँ जाता इसकी जानकारी किसी को नहीं थी। हम सब उसे 'फकीर' कहते। आज जब उसकी लाश लावारिस पड़ी हुई थी तो उसका ठिकाना जानना सबके लिए आवश्यक हो गया।

एक बार हमारी किसी राजनीतिक चर्चा में वह फकीर टपक पड़ा था और शिक्षा सुधार पर उसने अपनी बात बहुत अच्छी तरह से रखी। तब हमें पता चला कि वह एक पढ़ा-लिखा, ज्ञानी आदमी है। नाटा कद, थुलथुल शरीर, आँखें सुर्ख लाल, नाखून बड़े-बड़े और गंदै, पान की पीक लम्बी-बेतरतीब दाड़ियों में चिपकी हुई, तेल-चिट्टा वस्त्र पहना हुआ, कंधे पर एक मैला झोला लटकाया वह आधा बूढ़ा अक्लमंद और पढ़ा-लिखा भी हो सकता है यह सभी के लिए हैरानी की बात थी।

उस दिन के बाद से जब कभी वह आता, हमारे ग्रुप के पास ही बैठता, हमारी बातों को दिलचस्पी से सुनता। अमूनन वह चुप रहता, पर जब कभी बोल पड़ता तो हम सब उसे ध्यान से सुनते। उसके बारे में किसी को सटीक जानकारी नहीं थी। हमारे नुक्कड़ के साथी कॉमरेड सुरेश को पता चला था कि वह फ़कीर स्टुडेंट लाइफ से कम्यूनिस्ट था। बहुत अच्छा स्टुडेंट था। किसी कॉलेज में पॉलिटिकल साइंस का लेक्चरर बन गया था। उस कॉलेज के स्टुडेंटस को प्रेरित कर स्टुडेंटस यूनियन बनवाया था। यूनियन बन जाने के बाद विद्यार्थियों को उकसाने के आरोप में पहले निलम्बित हुआ था फिर दो साल बाद उसे बर्खास्त कर दिया गया था। उसने कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाकर नौकरी हासिल कर ली थी। किन्तु थोड़े समय बाद दूसरे आरोपों के आधार पर उसे बर्खास्त कर दिया गया था। उसने दुबारा कोर्ट की शरण ली थी। लम्बे समय तक मुकदमा चला था। वह मुकदमा जीत गया था। कोर्ट के आदेश के मुताबिक बीते वर्षों के देय राशि उसे प्राप्त हुई थी। सुरेश ने यह भी जानकारी दी कि उस फकीर ने समस्त प्राप्ति रकम अनाथालयों, विकलांग केन्द्रों, कुष्ट रोगी संस्थानों, में दान कर दिया था। आगे की जानकारी सुरेश को नहीं थी।

सुरेश की बातों को फ़कीर ने दो-दो बार यह कह कर काट दिया था कि उसे कोई भ्रम हुआ है। उसने यही कहा था कि वह फ़कीर है थोड़ा बहुत पढ़ लेता है, अख़बार पढ़ना उसकी पुरानी आदत है उसीसे उसे देश के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी है। सुरेश भी बहुत श्योर नहीं था कि यह वही आदमी है। सुरेश की बात आयी और गयी, हमारा कौतुहल बना रहा।

फकीर की लाश लावारिस पड़े रहने की सूचना 100 नम्बर पर थाने में दे दी गयी थी।

मैंने पंडित से पूछा-'फ़कीर कब आया था? कब मरा? कैसे मरा?' पंडित ने कहा- 'कल शाम को। मैंने चाय पिलायी, उसने बिस्किट और समोसा माँगकर खाया। करीब आठ बजे जब हम दुकान बंद करने लगे तो हमसे बोला दो बेंच छोड़ दो आज हम यहीं सोयेंगे, हमने बेंच छोड़ दी....आज सुबह जब हम आये तो वह सोया हुआ मिला, हमने उसे आवाज़ दी, कई-कई बार बुलाया, हिलाया-डुलाया, फिर हमें शक हुआ... देखा उसकी साँसें नहीं चल रही है।'

'नुक्कड़' पर जो कोई आ रहा था फकीर को एक नज़र देख पंडित से वही सवाल पूछता और पंडित भी एक ही उत्तर देता जा रहा था। पंडित बहुत ज्यादा परेशान था। उसने कहा-'लाश देखकर लगता इसने आधी रात को दम तोड़ा होगा। कल अमावश की काली रात थी, पंचाग के हिसाब से आज का दिन भी ठीक नहीं है, इस आदमी ने चतुष्पाद दोष पाया है। पता नहीं अब पुलिस वाले मुझे कितना परेशान करेंगे... मियाँ को यहीं आकर मरना था, मेरा बेंच खराब हो गया,... धंधा चौपट हो गया, पता नहीं आगे और क्या नुकसान होगा।

एक ने चुहल लिया- 'पंडित तुम्हारी किस्मत अच्छी है, फकीर को तुम इतना मानते थे तुम्हारे पास आकर मरा। हो सकता है पिछले जनम में तुम्हारे साथ इसका कोई रिश्ता रहा हो।'

पंडित तिलमिला उठा-'यहाँ साला दिमाग खराब हो रहा है और इनको मजाक सूझ रही है। आपके दुआरे कभी कोई मरेगा तब समझ में आयेगा... आप ही लोगों ने इसे सिर चढ़ाया था, इससे गपियाते बतियाते रहे, अब आप ही लोग सम्हालिए । पंडित को गरम होते देख मैंने कहा-'पंडित जाने दो उसकी बात। यह बताओ कि कल जब फकीर आया था तुमसे कुछ बातचीत हुई थी? काफी दिनों से नहीं आया था कुछ बोला था कहाँ गया था?' पंडित ने कहा-' लँगड़ी को पूछ रहा था। कह रहा था लँगड़ी भाग गयी है। बहुत दुखी था।'

दुबली-पतली सावली, एक पैर जरा सा छोटा, लाठी के बल चलती, चौतरफा टुकुर-टुकुर ताकती एक भिखारिन वर्षो से 'नुक्कड़' पर आती रही। कभी लगातार कई दिनों तक तो कभी पंद्रह-बीस रोज़ के अंतर पर उसके दो-तीन दाँत टूटे हुए थे जब वह मुँह खोलती उसकी आधी जीभ बाहर निकल आती। उसकी बोली वही समझ पाता जो उसे सुनने का आदि हो चुका था। उसे सब 'लँगड़ी अम्मा' कह कर पुकारते। उसके साथ लोगों का अजीब सा लगाव हो गया था। उसके न रहने पर लोग उसे याद करते और रहने पर उसके पीछे पड़ जाते, छेड़खानी करते।

'नुक्कड़' पर एक-एक झुंड के पास वह पहुँचती और 'ए बाबू' 'ए बाबू' की रट लगाती। कोई न कोई उससे कहता 'राम राम बोलो तो पैसा मिलेगा' और वह मुँह विचका कर कहती 'अल्लाह' 'अल्लाह'। कुछ देर तक यह सिलसिला चलता फिर शुरू हो जाती असली छेड़खानी। लोग कहते 'राम राम बोलो दस रूपए देंगे'

'राम बोलो तभी पैसा मिलेगा' कोई नोट लहराकर कहता 'राम बोलो तभी यह नोट मिलेगा' और उत्तर में वह कहती 'अल्लाह, अल्लाह।' चिढ़ाते चिढ़ाते कभी कोई कहता 'भाग लँगड़ी राम नहीं बोलेगी तो भाग' और वह लाठी उठाकर हवा में लहराकर
कहती 'नहीं बोलना। धत् धत्।' जब वह बुरी तरह से चीढ़ जाती तब जाकर कोई उसे एकाध रूपया निकाल कर दे देता।

लोगों के लिए यह तमाशा एक खेल था और उसे इस खेल की आदत पड़ चुकी थी। जब कभी वह नुक्कड़ खाली देखती निराश होती। पंडित से पूछती 'कहाँ गए बाबू लोग? आज कोई मेरे पीछे पड़ने वाला नहीं है?"

-एक बार किसी ने कहा था 'यह लंगड़ी हिंदू है।'

-'अरे नहीं। यह कट्टर मुसलमान है।' उसकी बात किसी ने नहीं मानी। उसने फिर कहा- ऐसा ही है। इसे हम पहचानते हैं। रायबरेली स्टेशन में हमने इसे दो-तीन बार देखा था। पहले तंदरूस्त थी, दाँत टूटे हुए नहीं थे।'

-'हिंदू होती तो भला राम का नाम क्यों न लेती?'

- इसी खेल से ही उसका पेट भर जाता है। भले ही लोग उसके पीछे पड़े पैसा तो निकाल देते हैं वर्ना आगे बढ़ो कह कर भगा देते। भीख माँगने के लिए भी नाटक करना पड़ता है।'

कभी-कभार हँसी-हँसी में कोई न कोई उसकी लाठी पकड़ लेता या छीन लेता, कभी-कभार उसे चोट लग जाती, पट्टी बाँधनी पड़ती।

एक बार नुक्कड़ से थोड़ी दूरी पर छेड़खानी करते हुए किसी लड़के ने जब लाठी छीन ली थी तो वह औंधे मुँह गिर पड़ी थी, वह चीखने-चिल्लाने लगी थी। उसे बिलख-बिलख कर रोते देख लड़के खिसक गए थे। 

नुक्कड़ पर बैठा फकीर चीख उठा था 'अरे जालिमों ज़रा सा रहम किया करो? किसी गरीब को इस कदर न सताया करो कि वह भीख माँगने लायक भी न रह जाए।' फकीर ने सहारा देकर उसे उठाने की कोशिश की मगर वह दर्द से कराहती रही। फिर एक रिक्शेवाले की मदद से उसने उसे रिक्शे पर बिठाया, खुद भी बैठा और उपचार के लिए कहीं ले गया।

उसके बाद काफी दिनों तक न फकीर दिखा और न ही वह 'लँगड़ी अम्मा' दिखी। एक दिन जब फ़कीर आया तो पता चला था कि 'लँगड़ी अम्मा' के बाँये हाथ में फ्रैक्चर हो गया था, कमर में चोट पहुँची थी। अब वह उसके चोटिल हो जाने की वजह से फ़कीर बेहद अपसेट हो गया था ।

'लँगड़ी अम्मा' के न आने से पंडित खुश था। उसने कहा 'चलो पिंड छूटा। रोज-रोज के तमाशे से छुट्टी मिली। साली राम-राम नहीं बोलेगी, हिंदुओं के आगे हाथ फैलायेगी। जाए ससुरी नखासकोना, अटाला, जहाँ मियाँ लोग रहते। पंडित की दुकान पर अल्लाह, अल्लाह... ।'

मैंने कहा था- 'पंडित फकीर भी तो मुसलमान है, उसे क्यों फोकट में चाय पीलाते हो? रोटी भी क्यों देते हो?" पंडित ने कहा था- 'वह फकीर सचमुच फकीर है, फकीरी के कारण उसके चेहरे पर रौनक है। साधु-संतों की जात नहीं होती।

पुलिस को सूचित किए हुए आठ घंटे बीत चुके थे। अचानक एक टैम्पो नुक्कड़ पर आकर रूकी। टैम्पो से चार-पाँच युवक उतरे और वे सब लाश के सामने खड़े हो गए। फिर हमारी तरफ देख उन सबों ने एक-एक करके पूछा-फकीर कब मरा? कैसे मरा?'... 'यहाँ कब आया था? यहीं रहता था क्या? 'यह बीमारी से मरा या कि आत्महत्या की? 'किसी ने मार तो नहीं डाला इसे?'... 'थाने में रिपोर्ट लिखायी गयी की नहीं?"

हम सबको बड़ा क्रोध आया। टेंशन भी होने लगा, पता नहीं कौन लोग हैं। कॉमरेड सुरेश ने गुस्सा झाड़ा-'अमा यार पुलिसिया पूछताछ पुलिस के लिए छोड़ो। हम लोगों का चाय का अड्डा है। एक भिखारी से हमें क्या मतलब? तुम लोग कौन हो? इससे तुम लोगों का क्या सम्बन्ध था? इससे कोई रिश्तेदारी?'

एक ने उत्तर दिया- 'नहीं। हमसे कोई रिश्तेदारी नहीं। मेरा नाम है रामदास, यह मेरा छोटा भाई और ये हैं हमारे दोस्त... फाफामऊ में मेरा लकड़ी का टाल है। 1 यह फकीर है। ये दिनभर इधर-उधर घूमता फिर रात को टाल पर लौट आता। वहीं ठहरता, कभी नहीं भी लौटता, कहाँ रात बीताता, हमें मालूम नहीं। पूछने पर जवाब नहीं देता था।'

'मतलब कि तुम्हारा किरायेदार था ? -'जी नहीं फ़कीर था। नेक इन्सान था इसलिए हमने रहने दिया था। दो साल पहले टाल के बाहर चाय की दुकान पर आया था, रात का वक्त, तेज बारीश होने लगी थी, यह चाय की दुकान पर फँसा रहा, मैंने टाल पर ठहरने दिया था। तब से वह टाल पर ठहरने लगा था।'

शाम ढलते-ढलते पुलिस आ पहुँची। पुलिस की जीप देखते ही कई लोग खिसक गए। गाड़ी से उतरकर दरोगा ने पंडित से पूछताछ की। कॉमरेड सुरेश ने कहा-'यह रामदास और इसके साथी लोग हैं, फकीर रात को इसके यहाँ रूकता था।" दरोगा ने रामदास से कहा- 'क्यों?' रामदास ने वही सारी बातें दुहरायी जो वह हमें बता चुका था और कहा-'पिछले चार महीने में वह हमारे यहाँ तीन-चार बार आया। इसका एक झोला हमारे यहाँ बहुत दिनों से टंगा हुआ था, आज जब इसके मरने की ख़बर मिली तो मैंने झोला खोलकर देखा। दो-चार कपड़ा-लत्ता, फालतू चीजें, कुछ कागज मिले... हाथ का लिखा यह कागज भी झोले में था। इसके हिसाब से इसने अपना रूपया-पैसा अपने गाँव की जमीन और मकान अपनी बीबी के नाम से कर 'दिया है।'

दरोगा ने कहा- 'क्या ? बीबी? बीबी भी रहती है? हम सब एक दूसरे का मुँह ताकने लगे।

रामदास नर्वस होकर बोला-'अकेला रहता था। अकेला ही आया करता था।' 

दरोगा ने पूछा-'रूपया पैसा कहाँ है? झोले में कितने रूपए थे?' रामदास सकते में आ गया। वह बोला 'हुजूर, एक पैसा नहीं था उसमें ... भगवान कसम एक सिक्का तक नहीं था।... अता-पता जानने के लिए मैंने उसका झोला टटोला था।' 'यहाँ क्या करने आये?'

- "यह कहने के लिए कि यह मुसलमान है। यह अपना जात-धर्म किसी से बोलता नहीं था। न पूजा-पाठ करता, न नमाज़ पढ़ता। हमने सोचा हिंदू समझकर कोई जला देगा तो अधर्म हो जाएगा।'

शक की निगाहों से दरोगा उसे देखता रहा। काफी देर तक ज़िरह करने के बाद दरोगा ने सिपाहियों को निर्देश दिया 'इसे जाने न देना पकड़ कर रखो।' फिर दरोगा ने फकीर की तलाशी ली। उसकी सदरी और लम्बी कमीज़ की जेबों से बैंक खाता, पेंशन भुगतान पुस्तिका मिली। 

पेंशन की किताब खोलकर बोला-'डॉक्टर वाजिद अली, स्थायी पता-मुजफ्फरपुर... तीन महीने पहले इसने शादी की थी।'
हम सब एक दूसरे का मुँह ताकने लगे। दरोगा बोला-'आप में से कोई इसकी बीबी को पहचानता है?"

कॉमरेड सुरेश ने कहा-'हम लोग यही जानते कि ये अकेला था, न कभी किसी को साथ लाया, न ही कभी किसी का जिक्र किया था।'
दरोगा उठ खड़ा हुआ। हमारी ओर घूमकर बोला-'इसकी बीबी का नाम है विमला देवी, उम्र पचास। फिर पेंशन किताब का पन्ना हमें दिखाकर पूछा- देखिए आप लोग इस तस्वीर को, इस औरत को कभी देखा हैं इसके साथ? 

लगभग सामूहिक स्वर में हम चीख उठे-'अरे! यह तो अपनी लँगड़ी अम्मा है।

© सुभाष चंद्र गाँगुली 
( "मोक्षदायिनी" कहानी संग्रह से, प्रथम संस्करण: 2021)

Wednesday, January 11, 2023

कहानी- आखिरी उम्मीद



बहुत देर से मकान ढूँढते ढूँढ़ते जया को मकान मिल ही गया। बाउन्ड्रीवाल के फाटक पर नेमप्लेट पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था- अमर परिहार-एडवोकेट स्ट्रीट लाइट की मध्यिम रोशनी में नाम पढ़ा जा रहा था, फिर भी जया ने करीब से जाकर देख लिया।

दस कदम की दूरी पर वकील साहब का चेम्बर। काम में तल्लीन थे ये वकील साहब। आहिस्ता से फाटक खोल तीन सीढ़ी चढ़कर जया ने चिक हटाकर झाँका, हाँ, अमर परिहार ही है। कुछ अकुलाहट से जया ने गला खखारा, हाथ हिलने से चूड़ियाँ भी खनक उठी। अमर ने सिर उठाकर देखा फिर कहा-'आइए अन्दर ।

बैठिए।" भीतर दाखिल होते ही जया को देख अमर जरा सा विचलित हो उठा। सहमी, सकपकायी, सिर पर पल्लू डाली उस औरत को कुछ पल देखने के बाद उसने कहा- 'आज का काम ख़त्म। ऐसा करिए आप अपना नाम और फोन नम्बर लिख दीजिए, कल मैं आपको टाइम दूँगा।'

-'मैं ज्यादा टाइम नहीं लूँगी सर ।'

- नहीं आज नहीं होगा, कल जरूरी केस है। मैं थका हुआ हूँ. सोने का टाइम भी हो गया है।'

- प्लीज सर। मात्र दस मिनट मुझे सुन लीजिए। बहुत जरूरी है।... शायद मैं कल न आ पाऊँ।' जया ने अपना घुंघटा हटाते हुए कहा। घुँघट हटते ही अमर उसको अपलक देखता रह गया। वह शब्द ढूँढ़ने लगा। 

जया ने कहा-'आपने ठीक ही पहचाना। मैं जया... जया चन्द्रा थी पहले।'

कोलाहल विहीन रात किन्तु उन दोनों के मन में अजीब सा कोलाहल । जया बहुत कुछ बोलना चाहती और अमर यह जानने के लिए बेताब था कि परायी स्त्री इतनी रात को अकेली क्यों मिलने आयी है?

वर्षों पहले वे दोनों यूनिवर्सिटी में एक ही क्लास में थे। इसी जया को वह दिलोजान से चाहता था। उसकी एक अदा पर उसके मन के सारे तार झनझना उठते। अमर हमेशा उससे बात करने का बहाना ढूँढ़ता। बड़ी कोशिश के बाद उससे दोस्ती करने में वह कामयाब हो गया था। करीब साल भर बाद एक दिन अमर ने अवसर देख कर अपने प्रेम का इज़हार कर दिया था किन्तु उत्तर में जया ने जो कुछ कहा था उससे अमर इतना मर्माहत हुआ था कि वह अभी भी उस सदमे से उबर नहीं पाया था। जया ने कहा था कि उसका मेलजोल महज एक दोस्ती थी जो एक ही क्लास में साथ-साथ उठने बैठने से हो जाता है। जया ने यह भी कहा था कि अमर का प्यार एकतरफा प्यार था जो यंग लड़कों को अक्सर हो जाता है।

आज जब जया परायी स्त्री है और मुसीबत के मारे आयी हुई है तो अमर को हमदर्दी होने लगी। उसका पुराना प्रेम सामने आकर खड़ा हो गया। अकेली इतनी रात को क्यों आयी है जान लेना उचित होगा। 

उसने पूछा- 'इतनी रात तुम अकेली आयी हो?"

-‘जी। अकेली हूँ।'

'तुम परायी स्त्री.... अकेली? मेरे घर? क्या चाहती हो? किस काम से आयी ?... तुम्हें पता मैं अनमैरिड हूँ अकेला हूँ हाँ, साथ में मेरी माँ और मेरी बुआ रहती है।

- मालूम है। मुझे तुम्हारे बारे में सब कुछ मालूम है। 

-'मालूम है? अच्छा बोलो अपनी बात किस काम से आयी हो?" 

जया बोली- 'सोचा मरने से पहले तुमसे एक बार मिल लेना चाहिए। मन के भीतर बहुत घुटन है, मन की बात कह देनी जरूरी है... मन का बोझ हल्का हो जाने से चैन से मर पाऊँगी।' जया की आँखों से अविरल आँसू बहने लगे। कंठ सँघ गया। अमर आसमान से गिरा। 

वह चीख कर बोला- 'क्या ? मरने की बात कहाँ से आ गयी? केस क्या है? क्या तुम बीमार हो? कोई लाइलाज बीमारी हो गयी है क्या?.
...क्या हुआ? क्या प्राबलम जल्दी से बोलो।' 

-'बीमारी शरीर में नहीं, मन में है, बल्कि मेरे जीवन में, लाइलाज बीमारी, मौत से ही मुक्ति मिलेगी।'

"मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है, सीधा-सीधा बोलो क्या बात है ?.... तुम्हारी शादी किसी अच्छे आदमी के साथ हुई थी न?

-खाक अच्छी शादी के बाद पाँच साल बड़ी मुश्किल से मैंने झेला, जैसे-तैसे मन मारकर एडजस्ट करने की कोशिश की, तमाम अत्याचारें सही मगर हालात बद से बदतर होती चली गयी। अब वह घर, घर नहीं नरक है। आत्महत्या के सिवा अब कोई उपाय नहीं है।'

- क्या? क्यों? आत्महत्या के सिवा कोई उपाय क्यों नहीं? उपाय ढूँढना पड़ता है। मैं वकील हूँ, हम लोग हार नहीं मानते कभी भी।

नहीं कोई उपाय नहीं। उस नीच, दुराचारी के हाथ से बचने का कोई और उपाय नहीं है। जिन्दा रहूंगी तो वह मुझे वेश्या बना देगा या जान से मार डालेगा।' अमर स्तब्ध, हतप्रभ। उसकी जिज्ञासा बढ़ती गयी। उसने कहा- 'तुम्हारा पति ऐसा क्यों करेगा? मेरा मतलब उसने तुम्हारे साथ ऐसा क्यों करना चाहा ? मुझे साफ-साफ बताओ शायद मैं तुम्हारे लिए कुछ कर सकूँ।'

जया का क्रोध फूट पड़ा 'एकदम नीच, कमीना, दुराचारी। रातोरात धनवान बन जाना चाहता था। जब मेरी शादी हुई थी, उसकी एक जनरल स्टोर की दुकान थी। ज्यादा कमाने के फेर में उसे बंद कर मोटर सायकिल, स्कूटर पार्टस की दुकान खोली। घाटा हुआ। फिर भारी कर्जा लेकर टी0वी0 की दुकान खोली। उसमें भी घाटा हुआ। फिर दूसरा धन्धा । इस क्रम में खड़े होने की जगह वह बैठने लगा, कर्ज पर कर्ज़ फिर इतनी कम रकम रह गयी कि वह कहीं का नहीं रहा। मैंने दफ्तर से लोन लेकर दिया, मैंने कहा आप फिर से जनरल स्टोर की दुकान खोल लीजिए, जब मेरी शादी हुई थी मैं खुश थी, मुझे ज्यादा पैसा नहीं चाहिए, मैं खुद भी तो कमाती हूँ।'

उसने कहा 'मैं जोरू का गुलाम नहीं हूँ, अपना निर्णय खुद ले सकता हूँ। मुझे धन बटोरना है, सारा सुख भोगना है, अभी इसी वक्त, बुढ़ापे में नहीं।.... मेरे पिताजी ने बुरे दिन के लिए जो रकम बचाकर रखा था, हड़कम्प मचाकर, मुझ पर अत्याचार कर, और अधिक अत्याचार करने की धमकी देकर पिताजी से सब ले लिया। फिर एक बड़ी सी दवाई की दुकान खोली, थोड़े दिनों के बाद फिर पैसा, पैसा करने लगा, मेरे सारे गहने बिक गए, मैंने सोचा चलो अब खत्म होगा बवाल...उसकी दवाई की दुकान ठीक-ठाक चलने लगी, मगर उसने दुकान को दौड़ाना चाहा। हमसे कहा दफ्तर से छुट्टी लेकर या चाहे बिना वेतन दुकान पर बैठो, तुम्हारी खूबसूरती कैश करनी है... मैंने आपत्ति की। मैं हरगिज़ नहीं बैठना चाहती थी, मगर वह भी हाथ धोकर पीछे पड़ गया, कहा-सुनी हुई, नोक-झोक हुई, हफ्तों बोलचाल बंद था...मेरे बीमार पिता ने उसे समझाया पर उसने उनके साथ बदसलूकी की... फिर उसने मुझे घर पर कैद कर दिया, बात-बेबात लात-जूता मारने लगा, किसी से मिलने नहीं देता, बात नहीं करने देता, मुझ पर निगरानी रखने के लिए एक नौकरानी को लगा दिया... मैंने हालात के साथ समझौता कर लिया, सोचा अगर इसी में मेरी मलाई हो...दुकान पर बैठने लगी, दुकान की आमदनी सचमुच बढ़ती गई। मगर उसकी जरूरतें और बुरी आदतें भी बढ़ती गई। वह हमेशा एक ही बात लेकर परेशान रहता था, कैसे धन जुटाया जाय, किधर से पैसा आये। उसके सिर पर हमेशा धन का भूत सवार रहता था। डुप्लिकेट दवाइयां भी बेचता था। जब में उससे कहती कि डुप्लीकेट दवाई से जानें जा सकती, बीमारियाँ ठीक नहीं होगी तो वह कहा करता कि धन की कदर सब जगह होती है, धन बटोरने का हरेक तरीका सही है, धनी आदमी का कोई ऐब नहीं ढूँढ़ता, धनी आदमी की बुराई कोई नहीं देखता

अमर ने आश्चर्य व्यक्त किया-'मकान, दुकान, तुम्हारी खुद की कमाई सब कुछ तो था फिर....

जया और उत्तेजित हो गई। उसने कहा- 'पिशाच था वह, पिशाच। उसने मेरी कोख में पल रहा बच्चा गिरवा दिया। उसने कहा पहले धन बटोर ले बच्चा-बच्चा बाद में देखा जाएगा। उसने कहा तुम अपनी खूबसूरती से दसियों लाख कमा सकती हो, उन पैसों से हम फैक्ट्री खोल लेंगे, करोड़ों बना लेंगे, दुनिया हमारी जूती के नीचे फिर तुम रानी बनकर ऐश करोगी।'

- अमर ने पूछा 'क्या?... तुम्हारे घर वालों ने शादी से पहले खोज-खबर नहीं ली थी?' अमर ने पूछा।

जया ने कहा- 'ली थी। क्यों नहीं लेते, मगर किसी के मन के भीतर कैसी-कैसी बदइच्छाएं रहती, किसके मन के भीतर कितना पाप है यह कौन जान सकता?... मैंने उसे छोड़ देने की ठान ली, घर से निकल रही थी कि नशे में धूत उस शैतान ने मुझे दबोच लिया। मेरी चोंटी पकड़ कर धमकी दी 'अगर तूने चालाकी करने की तो कोशिश की मैं तुझे और तेरे माँ-बाप को जान से मार डालूँगा', फिर दो-चार दिन बाद उसने कहा 'कल रात पूरे मेकअप में रहना, खूब सज-धज कर अपना मूड भी ठीक रखना, एक नेता के घर जाना है, बहुत बड़ा नेता है, उसने कहा है कि गैस एजेन्सी या पेट्रोल पम्प खुलवा देगा। हमारे बहुत अच्छे दिन आ जायेंगे। ड्राइवर लेने आयेगा, चुपचाप चली जाना उसके साथ.... नेताजी के साथ किसी प्रकार की बेहूदी हरकत न करना। अगर तूने बदतमिजी की तो अंजाम बुरा होगा।'

रात को ड्राइवर आया था, मैं गाड़ी पर सवार हुई थी, रास्ते में टॉयलेट जाने के बहाने अपने कार्यालय के सामने मैंने गाड़ी रुकवाई। कार्यालय में घुसकर पीछे के दरवाज़े से भाग निकली, भागते-भागते एक टेम्पो में बैठकर रेलवे स्टेशन पहुँची किसी ट्रेन के नीचे मर जाने के लिए, देखा बनारस आने वाली ट्रेन सामने खड़ी है, एक बारगी तुम्हारा ख्याल आया... एक आखिरी उम्मीद... शायद तुम कोई रास्ता फिर मुझे यह भी लगा कि मरने से पहले मुझे तुमको अपनी सफाई देनी चाहिए नहीं तो मरने के बाद भी तुम मुझे माफ़ नहीं करोगे....।' अमर की चिन्ता और जिज्ञासा लगातार बढ़ती जा रही थी। उसने अवाक होकर पूछा- 'माफी! किस बात की माफी ?*

मुझे मालूम था कि तुम मुझे बहुत चाहते हो, मैं भी तुम्हें प्यार करने लगी थी पर मैं क्या करती... तुम मुझसे तीन साल के छोटे हो। बीबी उम्र में बड़ी नहीं हो सकती, कोई स्वीकार नहीं करता, जिन्दगी में कई तरह की दिक्कतें भी आती है... मैंने अपना प्यार मन में ही दबा लिया था...शायद मेरे जीवन की सबसे बड़ी गलती यही थी कि मैंने इस सच्चाई को तुमसे छिपायी थी, पहले ही कह दी होती तो सालों से मेरे मन में गुनहगार होने का बोझ न रहता...न ही तुम्हारे मन में मेरे प्रति कोई घृणा होती... मैंने तुम्हें धोखा नहीं दिया था... अब मेरे मन का बोझ उतर गया...मुझे अब चलना चाहिए...।' -'कहाँ ठहरी हो? कहाँ जाओगी?'

-'कहीं नहीं। पता नहीं कहाँ जाऊँगी...अब तक मेरे सुइसायड नोट को लेकर कोहराम मच गया होगा।'

-'सुइसायड नोट?"

'घर से निकलते समय सुइसायड नोट रख लिया था। दफ्तर के दरवाजे से निकलते वक्त चौकीदार को लिफाफा देकर कहा था कि मेरे अधिकारी को वह लिफाफा अगले दिन दे दे।' वापस जाने के लिए जया चिक हटाकर कमरे से निकली ही थी कि अमर ने उसकी कलाई पकड़ ली। उसने कहा- 'कायर, बुजदिल आत्महत्या करते हैं... पढ़ी-लिखी लड़कियों के साथ भी इतना अमानवीय अत्याचार और तुम उसे छोड़ दोगी? क्या लड़कियाँ इसी तरह सतायी जाती रहेगी? तुम्हें हार नहीं मानना चाहिए, लड़ना चाहिए। उसे उसके किए की सजा भुगतनी पड़ेगी, तुम्हें इंसाफ मिलेगा, मैं तुम्हारी मदद करूँगा, तुम्हारी लड़ाई में मैं साथ रहूँगा । हिम्मत न हारो।'

जया शान्त हो गई। अमर के सीने में सिर रख कर रोते-रोते बोली, 'अमर! मुझे बहुत डर लग रहा है।' अमर ने कहा, 'मन से भय निकाल कर फेंक दो। तुम्हें अत्याचार के खिलाफ लड़ना होगा....सब ठीक हो जाएगा... मुझ पर भरोसा रख सकती हो...तुमसे तीन साल का छोटा सही, मैं तुम्हें संभाल सकता हूँ।"

© सुभाष चंद्र गाँगुली 
( "मोक्षदायिनी" कहानी संग्रह से, प्रथम संस्करण: 2021)

कहानी- बुड्ढे को मरने दो


उस रोज अपने मोहल्ले में चम्पा की शादी थी।

शादी घर में दूर-दूर से रिश्ते-नाते आये हुए थे। सुबह से स्टीरियो फुल वॉल्यूम में बज रहा था। घर के बाहर खुली जगह लड़के-लड़कियाँ गाने के साथ-साथ तालियों पीट कर डान्स कर रहे थे।

उधर सामने बगल वाले घर में नब्बे वर्ष के वृद्ध दादाजी की हालत बहुत खराब थी। मौत दरवाज़े पर दस्तक दे चुकी थी। वे अन्तिम साँसें ले रहे थे। बाहर के रिश्तेदारों, शहर के परिचित लोगों को तबियत ख़राब होने की ख़बर दे दी गयी थी, फिर भी परिवारजन हिम्मत नहीं हारे थे। दादाजी को बचाने का पुरजोर कोशिश कर रहे थे। डॉक्टर नर्स घर पर थे। दादाजी को आक्सीजन दिया जा रहा था।

पड़ोस का शोरगुल पड़ोसी को रास नहीं आ रहा था। दादाजी ने भी दो-दो बार विरक्ति प्रकट किया था। घर की बहू ने एक बार रिक्वेस्ट किया था कि साउन्ड बन्द कर दे। मगर उन लोगों ने अनसुना कर दिया था। आखिरकार दादाजी के पोते और कई लोगों ने मिलकर स्टीरियों बन्द करने का अनुरोध किया।

कहने की देर नहीं कि लड़की का भाई चीख कर बोला 'नहीं बन्द होगा।' उसके ना बोलते ही दादा जी का पोता भड़क उठा। बहस होने लगी। लड़की का भाई झगड़ने लगा। डान्स करने वाले लड़के भी झगड़े में शामिल हो गये। काँव-काँव में किसी को किसी की बात सुनाई नहीं दे रही थी। भीड़ देखकर भीड़ बढ़ने लगी। बाजा बजाने वाला भी स्टीरियो बन्द कर भीड़ में खड़ा हो गया। तब कहीं समझ में आया मामला क्या है। पाँच-सात मिनट बाद ही दादाजी के पोते निराश होकर वापस घर के भीतर चले गये। उनके साथ भीतर से निकले अन्य दो लोग तमाशा देख रहे थे।

फिर लड़की का भाई, नाचने गाने वाले बच्चों तथा एकत्रित भीड़ आपस में ही उलझ गए। सबकी राय अलग-अलग थी। किसी ने कहा बाजा बजाना चाहिए किन्तु साउन्ड धीरे कर दिया जाए। एक ने कहा 'अभी बन्द कर दिया जाए बाद में बजाना।' एक ने कहा 'दिन भर के लिए बन्द रखो रात को जब बारात आयेगी तब बजा लेना किसी ने कहा 'अमे यार छोड़ो पास पड़ोसी के दर्द का ख्याल रखना चाहिए फिर वे तो पूरे मोहल्ले के दादाजी हैं। एक बूढ़े ने कहा, 'हमारे टाइम में ये सब शोर मचाने वाले बाजे नहीं थे, शहनाई बजती थी शान्ति से शादियों होती रही। जितना-जितना पैसा होता जा रहा है, दिखावा बढ़ता जा रहा है।' बुड्ढ़ा बीमार या जवान बीमार, कौन मरा कौन जी रहा किसी को फर्क नहीं पड़ता। कितना बुरा वक्त आ गया। 'हे राम'

इस बूढ़े की बात सुन कर लड़की के भाई गुस्से से बोला- 'स्टीरियो किसने बन्द किया? बजाओ नहीं थमेगा कौन रोज-रोज शादी होती है। धूमधाम से शादी होगी. ...बुड्ढे को मरने दो!"

लगभग आधा घण्टा अनावश्यक हो हल्ला हुआ। पता नहीं क्यों लोग गुस्सैल और झगड़ालू होते जा रहे हैं। असहिष्णुता बढ़ रही है। अपने बचपन में मैंने ऐसी घटना न घटते देखा था और न ही सुना था बल्कि मुझे याद है एक बार ऐसा हुआ था कि दुर्गा पूजा मैदान के पास एक बुजुर्ग महिला का देहान्त हो जाने के कारण एक दिन दिन भर लाउडस्पीकर नहीं बजा था, रात को नाटक भी नहीं खेला गया था। ऐसा ही कहीं न कहीं हुआ करता था।

दोपहर बारह बजे दादा जी ने प्राण त्याग किया। दो बजे तक अर्थी उठने की बात हुई। चूंकि दादा जी प्रतिष्ठित व्यक्ति थे तथा उस मोहल्ले के पुराने वाशिन्दे थे, उनकी मौत की ख़बर आग की तरह फैल गई और देखते-देखते सैकड़ों लोग श्रद्धान्जलि के लिए आ पहुँचें। भीड़ लगातार बढ़ती जा रही थी। छोटा सा मैदान पूरा भर गया। कहाँ शादीघर, कहाँ स्टीरियो डान्स कुछ अता-पता न था।

दादाजी के पोतों ने अपने प्रिय दादाजी की अन्तिम यात्रा को स्मरणीय बनाने के लिए ताम-झाम किया। दादाजी के शव को एक खुले वाहन पर रखा गया। मिनटों में फूलों और फूल मालाओं से लाश ढक गया। गाजे-बाजे के साथ राम-नाम सत्य है, हरि का नाम सत्य है नारों के साथ शव यात्रा शुरू हुई। अपार जनसमूह लम्बी कतार में पीछे-पीछे चलने लगा। बीच-बीच में आहिस्ता-आहिस्ता चलती मिनी ट्रक के ऊपर से दो लोग फल-फूल, मखाने, बतासे, खजूर, चौअन्नी, अठन्नी, एक रूपए के सिक्के लुटाते रहे। लूट की चीजों को बटोरने की होड़ में लड़को बच्चों में आपस में छीना झपटी, हाथापाई भी होती रही।

दाह-संस्कार सम्पन्न होते ही मैं अपने घर के लिए रवाना दिया। मेरा घर दादाजी के मकान से कुछ ही 'दूर था। रात आठ बजे का समय था। गली में प्रवेश करते ही अजीब सा सन्नाटा देख में सिहर उठा। शादीघर में किसी प्रकार का हलचल नहीं, कुछ झालर जरूर जल रहे थे मगर गाना-बजाना गायब। एक कुत्ता बार-बार जबड़ा फैलाकर रोने जैसा आवाज निकाल रहा था जिससे एक लड़का इतना चिढ़ रहा था कि वह बार-बार ढेला मारकर उसे भगाने की कोशिश कर रहा था। कुल मिलाकर अजीब सा गमगीन वातावरण था जनमानव शून्य कोलाहल विहीन निस्तब्ध कफ्यू-ग्रस्त रातों की तरह लगने वाली एक रात।

अकुलाहट से मेरे दिल की धड़कने तेज हो गयी। तेज उगों से में चम्पा के घर पहुंचा। मैंने घंटी बजायी। एक अपरिचित व्यक्ति बाहर निकले। उससे मालूम हुआ कि चम्पा के पिता को ब्रेन हैमरेज हो गया था। गम्भीर हालत में उन्हें अस्पताल ले जाया गया था। आईसीयू में रखा गया था। थोड़ी देर पहले उन्होंने दम तोड़ दिया था। उनकी उम्र मात्र पैंतालीस वर्ष थी।

© सुभाष चंद्र गाँगुली 
( "मोक्षदायिनी" कहानी संग्रह से, प्रथम संस्करण: 2021)