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Friday, March 3, 2023

डूबता सूरज



           एक दिन कार्यालय का एक कर्मचारी पर्दा हटाकर ' में आई कम इन ?' कह कर सहसा कमरे में दाखिल हुआ। मैंने दीवार की ओर रखी विजिटर्स कुर्सियों की ओर संकेत देकर बैठने को कहा , फिर पूछा - 'बोलिए !'
उसने कहा -' सर यह जानना था कि आपको मेरे पिताजी की चिट्ठी मिल गई है या नहीं ?'
-' किस सम्बन्ध में ? फंड या पेंशन ?'
- ' यह सब नहीं सर, कुछ और होगा। मेरे पिताजी आपको या आपके पिताजी को जानते रहें होंगे ।'
- 'अच्छा बोलिए काम क्या है ?'
-'सर मेरे पिताजी का देहान्त हो गया है। कानपुर में बहन के ससुराल में तीन साल से थे। उन्होंने कभी आपके नाम एक पत्र लिखा था । पिताजी ने जब बिस्तर पकड़ लिया था, बहन के हाथ वह पत्र लगा , पिताजी से पूछने पर उन्होंने कहा कि वे पोस्ट करना भूल गए थे, वह बहुत जरूरी लेटर है, उसके बाद पिताजी ने बहन को याद भी दिलाया था किन्तु लिफ़ाफ़े पर आपका नाम, पदनाम, कार्यालय का अधूरा पता था । बहन ने मुझसे आपके घर का पता मांगा था, मैंने कलेक्ट कर भेज दिया था । लगभग एक महीना हो गया है। बहन ने मुझसे  पता करने को कहा कि आपको पत्र मिल गया है या नहीं ।'
- ' नहीं । कोई लेटर नहीं मिला। नाऊ यू में गो। '
                बड़ा अचरज लगा कि उसके पिताजी को कौन सा जरूरी काम था! किस वज़ह से पत्र लिखे होंगे। ऐसा क्या कि बेटे को भी मालूम नहीं था। वह बोला , चला गया, बाद ख़त्म।
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               महीनों बाद दीपावली से पूर्व घर की सफ़ई चल रही थी, मैं अपनी पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों  को अरेंज कर रहा था, तभी मेरे हाथ एक लिफ़ाफ़ा लगा जिसे खोला ही नहीं गया था। पत्र बांग्ला में था जिसका  अनुवाद --' महाशय, आपका रजिस्टर्ड लिफ़ाफ़ा मिल गया था। फ़ॉर्म जमा करने के तीन महीने बाद मुझे पेमेंट भी मिल गया था। आपका आभार। आप खूब उन्नति करें, सुखी रहें। एक पिता का आशीर्वाद ग्रहण करिएगा। पत्र का उत्तर देने की जरूरत नहीं।'
पत्र में न नाम और न ही ठिकाना था।
बड़ी हैरानी हुई। कुछ समझ में नहीं आया। तरह- तरह के कयास लगाने लगा। शायद इसी पत्र की जानकारी लेने आया था वह कर्मचारी । बहुत माथापच्ची के बाद याद आ गया एक वाक़या ।
उन दिनों मैं अस्वस्थ था । इलाज चल रहा था। रीढ़ की हड्डी का एक्सरे कराने सुबह-सुबह मैं 'कमला नेहरू अस्पताल ' पहुंचा था । कुछ लोग मेरे आने से पहले से ही डटे हुए थे। आठ बजे से काम शुरू होने वाला था। 
जिन्हें आठ नम्बर मिला था वे क़रीब अस्सी वर्ष के बुजुर्ग थे, स्मार्ट, आकर्षक। मेरे पास आकर बैठ गए। वे थोड़ी-थोड़ी देर बाद एक्सरे क्लिनिक में झांकते या फिर अस्पताल के कार्यालय में जाते, फिर वापस आकर अपनी जगह बैठ जाते। 
उनकी बेचैनी देख मैंने उनसे कहा -' चार नम्बर चल रहा है, अभी देर है। आप चाहें तो मेरे टर्न पर चले जाइएगा । मुझे सात नम्बर का टोकन मिला है। '
अब वे थोड़े इत्मिनान से मुझसे बात करने लगे।
' आप कहां के बंगाली हैं ? पूर्व बंगाल या पश्चिम बंगाल के ? 
- 'पता नहीं कहां का। मैं इलाहाबादी हूं। जन्म, शिक्षा, नौकरी सब यहीं।'
-' बांग्ला समझते हैं ? प्रवासी बंगाली तो बांग्ला से दूर हो गये हैं।'
-' जी। बांग्ला जानता हूं। अच्छी तरह। बांग्ला साहित्य भी खूब पढ़ा। किन्तु मैं पक्का इलाहाबादी हूं । हिन्दी जुबान पर पहले आती है मातृ भाषा की तरह।'
-'देश विभाजन के बारे में जानते हैं?' 
'-थोड़ा बहुत।'
-' मैं पूर्वी बंगाल का हूं। ' बांगाल' कहते हैं लोग।चट्टोग्राम का नाम तो जानते ही होंगे। वहीं का हूं। पार्टिशन के समय आया था रिफ्यूजी बन कर। ....... कठिन समय था । बहुत बड़ी आफ़त थी। चारों ओर लूटपाट आगजनी ।  अभूतपूर्व भगदड़ मची थी। हम पागलों की तरह दौड़ रहे थे घर दुआर छोड़ कर, कहां जा रहे थे पता न था, रास्ते में लोग छूट रहे थे, मर रहे थे। 
चट्टोग्राम, फरितपुर,बरिशाल,नोआखालि सब जल रहा था। गांधी जी बार बार शांति की अपील कर रहे थे, अब इतना उन्माद फैल चुका था कि उन्हें कोई सुनने वाला नहीं था। गांधी नोआखली में अनशन पर बैठ गए थे।
 पन्द्रह-सोलह लाख लोग मर गए थे। दो-ढाई करोड़ लोग  बेघर हो गए थे। शरणार्थियों को जगह-जगह स्थापित किया गया था, रिफ्यूजी कॉलोनियां बनाईं गई, लोगों को सरकारी नौकरियों  में रखा गया, गैर सरकारी नौकरियां भी मिलीं। फिर भी अनेक लोग संघर्षरत रहें, आज भी विस्थापित होने का दर्द झेल रहे हैं। '
-' छोड़िए जो होना था हो गया। अतीत लेकर पड़े रहने से कोई आगे नहीं बढ़ सकता।'
क्लिनिक से एक आदमी बाहर आकर बोला- 'टोकन नंबर सिक्स।'
अचानक वह बृद्ध उठ खड़े हुए। 
मैंने उनसे कहा - 'अभी नहीं। इसके बाद चले जाइएगा।'
मुझे अनसुनी कर वह आगे बढ़ गयें । नंबर बोलने वाला भीतर जा चुका था, तब भी वह बृद्ध भीतर झांक कर तुरन्त निकल आयें, फिर अस्पताल के भीतर झांककर लौट आएं ।
 बड़े गुस्से से बोलें -' एक तो लोग टाइम से नहीं आते फ़िर कुछ पूछो तो सीधे मुंह बात नहीं करते । मदद करना दूर उल्टे परेशान करते। लाटसाहेब हैं सब लाटसाहेब हैं। क्या दिन आ गए.... हमारे समय तो.....'
-' क्या हुआ कोई ख़ास प्रॉब्लम?'
उन्होंने जोश में कहा - ' हमारे समय कितना डिसिप्लिन था, लोग पंचुअल और रिस्पांसिबल थै। अब कौन किससे कहेगा, किस मुंह से कहेगा, वे भी तो उसी रंग में रंग गए हैं।' 
मैने बात काट कर कहा- 'ऐसी बात नहीं है, दो चार प्रतिशत हो सकते हैं किन्तु अधिकतर लोग हाथ पर हाथ धरे रहते हैं, डिमाक्रेसी जो है , चले न जायेंगे बाबू लोग किसी नेता को बुलाने, माइनारिटी कमीशन,एस सी एस टी कमीशन,किसी न किसी को शिकायत कर देंगे, कम्यूनल, कास्ट कोई चार्ज लगा देंगे, टोटल सिस्टम फेल।'
उनके अनर्गल प्रलाप से ऊब कर मैंने उनसे कहा-'अभी आपका नम्बर आएगा, शांति से बैठिए यहां। मैं भी सिस्टम का पुर्जा हूं, इसी सिस्टम में रहकर काम करना और काम करवाना पड़ता है, आपका कोई काम हो तो बताइए।'
-' में पेंशनर हूं, थोड़ी सी पेंशन मिलती है उसी मे से कुछ खर्च कर मेडिकल टेस्ट कराया, रुपया पाने के लिए मेडिकल क्लेम करना पड़ेगा मेडिकल क्लेम के लिए फार्म चाहिए जिसके लिए दर-दर भटक रहा हूं। '
--' यहां नहीं मिलेगा, सीजीएच डिस्पेंसरी में मिलेगा, वैसे मेरे कार्यालय में भी मिलता है।'
-'आप किस कार्यालय में हैं?'
-' आडिट आफिस में '
- 'वहीं तो मेरा बेटा है '।
-' क्या नाम है उसका ?'
ख़ामोश हो गये थे थोड़ी देर के लिए। फिर एक रुपए का सिक्का मेरे हाथ में रख कर बोलें-'मै अपने घर का पता लिख देता हूं, लिफ़ाफ़े में फ़ार्म भर कर कांइडलि भेज दीजिएगा।'
हालांकि मैं उनके चेहरे से जान गया था कि उनके साथ उनके बेटे का सम्बन्ध स्वाभाविक नहीं था फिर भी मेरे मुंह से अनचाहे ही निकल गया  ' आपके बेटे का नाम बताइए मैं उसे दे दूंगा।'
उनका चेहरा तमतमा उठा। कानों की बगल की नसें केंचुए जैसे चलने लगें।
 वे बोलें - 'तो फिर मैं आपसे क्यों कहता ? आप अगर भेज सकते तो बताइए मैं घर का पता लिख दूंगा।'
-' प्लीज़ नाराज़ न होइए, घर का पता लिख दीजिए, मैं भेज दूंगा ।'
अपने जेब से नोटबुक निकाल कर पता लिखकर कागज़ का टुकड़ा मुझे दे दिया और एक रुपए सिक्के को मेरे जेब में डाल दिया। सिक्के को मैं लौटाना चाहता था किन्तु उनकी हालत देख मैंने चुप रहना उचित समझा।
इतने में एक्सरे क्लिनिक से वही सहायक निकल कर जोर से बोला -' सात नम्बर ! सात नम्बर !'
मैंने उनसे कहा - ' आप जाइए! '
वह उठ खड़े हुए,चार कदम आगे चलकर फिर पलट कर देखा, आंखों की कोर हल्की गिली थी किन्तु चेहरे पर गम भरी मुस्कान, मेरे निकट आकर से बोलें -' डूबते सूरज को कौन पूजता ?'

 © सुभाषचंद्र गांगुली 
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* Published in October -December issue 1996 'दस्तक ' बहादुरगढ़, हरियाणा, सम्पादक - सूरत सिंह
* Re-written 29/2/2023--3/3/2023

Sunday, February 12, 2023

हस्ताक्षर का मूल्य


       
दफ़्तर से घर लौटते समय ' लुम्बिनी' हास्पिटल के सामने कम्पनीबाग के ॲपोजिट फुटपाथ पर लगी पुरानी किताबों को देख कर मैं चकित हुआ। स्कूटर खड़ी कर किताबें देखते-देखते मैंने पूछा - " यहां कब से दुकान लगाने लगे ? मैं तो तुम्हें वहीं सिविल लाइंस में ढूंढ रहा था बार-बार। इस अस्पताल के सामने बिकती भी है ?"
- " छः महीने से यहीं पर है। खूब बिकती है। इस अस्पताल के भीतर ट्रांजिस्टर, टीवी कुछ भी नहीं चला सकते। जिन्हें  कई-कई दिन ठहरना पड़ता है और जो मरीज़ पढ़ने की स्थिति में रहते हैं उनके लिए भी किताबें जाती हैं। "
- " सच ! जो लोग ठहरते हैं वे पढ़ते भी हैं ?"
-" क्यों नहीं। इस अस्पताल में मामूली लोग थोड़े ना आते हैं। यहां के रेट्स शायद सबसे हाई हैं, यहां सिर्फ़ हैसियत वाले और पढ़ें लिखे लोग आते हैं , वैसे तो अब पढ़े-लिखे लोग भी दूर होते जा रहे हैं। जब भी फ़ुर्सत मिले तो टीवी पर नज़र गड़ाए रहते हैं किन्तु यहां किताब पढ़ना उनकी मजबूरी हो जाती है । "
-"तुम यहां किताब केवल किराये पर देते हो या बेचते भी हो ?"
-" किराये पर क्यों दूं? एक किताब के लिए पचास पैसे या एक रुपया रोज़ से ज़्यादा कोई देना नहीं चाहता। क्या फ़ायदा जब पेट नहीं भरेगा उस तरह से। खरीदने वाले बड़े शौक से खरीद कर ले जाते हैं फ़िर अस्पताल छोड़ते समय हमें हाफ रेट पर बेच जाते हैं, जैसे नहान के अवसर पर एक गाय दिन में सौ-सौ बार बिक कर दान में चढ़ जाती है वैसे ही एक-एक किताब भी महीने में अनेक बार बिक जाती है।"
- " वाह भाई वाह ! क्या दिमाग है उस्ताद !‌‌
हम चलते हैं, हम तो किराये पर लेना चाहते थे। बराबर किराये पर ही लेता रहा।"
-" आप चाहेंगे तो भाड़े पर ही दे दूंगा, आखि़र आप  हमारे पुराने कस्टमर हैं ...... कौन सी किताब लेंगे सर ?" 
--" देखता हूं...... यह कितने में ‌‌‌बेचोगे ? "
- "पचास रुपए में ।"
-" पचास रुपए !!"
- " बाबूजी यह बहुत मशहूर उपन्यास है, इसकी कीमत इस समय चार सौ रुपए हैं। "
--" तुम्हें कैसे पता कि बड़ा अच्छा उपन्यास है और इस समय चार सौ की है। पढ़े थे किताब क्या ?"
-" अरे सर आप भी ख़ूब मज़ाक कर लेते है। मैं तो बस नाम-वाम पढ़ लेता हूं। बाबूजी इतनी जानकारी तो रखनी ही पड़ती है वर्ना धंधा कैसे करेंगे।"
-" मगर किताब तो काफ़ी पुरानी है, उस समय बारह रुपए की थी।"
-" उससे क्या? आज अगर आप इसे खरीदें तो आपको चारसौ देना होगा। "
- " लाओ देखें।"
किताब हाथ में लेकर जिल्द खोलते ही में दंग रह गया। उपन्यासकार ने अपने कर कमलों से         " सादर सप्रेम " लिख कर एक मशहूर साहित्यकार को भेंट किया था । आज की तारीख़ में भेंटकर्ता सिर्फ़ मशहूर ही नहीं बल्कि साहित्य के अभिन्न अंग हैं।
मुझे यह सोचकर हैरानी हुई कि जिस साहित्यकार को वह किताब भेंट की गई थी वह अब भी सक्रिय साहित्यकार हैं और वह उपन्यासकार अब इस दुनिया में नहीं हैं, उनके हस्ताक्षर को फुटपाथ पर पड़े रहने देने में मुझे अजीब कष्ट हो रहा था। इससे पहले कि वह पन्ना किसी दिन अलग हो जाए और किसी के जूते के नीचे आ जाए, मैंने उस किताब को पचास रुपए में ही खरीद लिया।

© सुभाषचंद्र गांगुली               
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पत्रिका ' दस्तक ' बहादुरगढ़ -सोनीपत
के नवम्बर 2001 अंक में प्रकाशित।

Saturday, January 28, 2023

कहानी: 'वेब कैम' में देखिए'



मोबाइल की रिंग बजी और भतीजे अविनाश का नाम देख चाचा अतुल कुमार उठ बैठे ।
-'हाँ बच्चा बोलो! '  
-'प्रणाम गुरुजी ।'
-'खुश रहो। शतायु भवः ! कब आ रहे हो ? इतवार को ही पोते के आने की खुशी में डिनर है। सारा बंदोवस्त हो गया है। गाना-बजाना भी रखा है। शहर की जानी-मानी आर्केस्ट्रा पार्टी को बुक किया है... भाई साहब और भाभी भी साथ आ रहे है ना ?'
-'गुरूजी ! वेरी सॉरी, हम लोगों का आना नहीं होगा।" 
-'क्या ???..... इतने सारे लोगों को दावत दे रखी है, सारे इनविटेशन कार्ड्स बँट गए हैं, जिसे जो एडवांस देना था दे चुका हूँ, और तुम कह रहे हो  नहीं आओगे ? ...इंडिया आने से बहुत पहले तुमसे बात कर ली थी, तुम्हारी रज़ामंदी के बाद ही मैंने सारा आयोजन किया है। पिछले हफ़्ते भाभी और भाई साहब से भी बात हुई थी, उन्हें एक-एक बात की जानकारी है। क्या हो गया अचानक? कौन सी आफ़त आ पड़ी है ?'
-' गुरुजी आपकी बहू सीमा इन दिनों मायके में है। वह कह रही थी कि आपका पोता अमन अपने नाना-नानी से ऐसा चिपक गया है कि नाना-नानी उसे छोड़ना नहीं चाह रहे हैं।' 
"भाईसाहब क्या कह रहे हैं?"
-'पापा कह रहे हैं तुम लोगों को क्या करना क्या नहीं करना तुम लोग तय करो, जो उचित लगे वही करो।'
-'और तुम्हें क्या उचित लगा ? यही कि चाचा से वेरी सॉरी कह दो ? यही कि बूढ़े चाचा-चाची के सेंटिमेंटस को पैरों तले रौंद दो ? ऐसा तो तुम्हारा संस्कार न था !.......कोलकाता से पटना है ही कितना दूर ?... रात को ट्रेन में बैठो और सुबह पहुँच जाओ फिर चाहे इतवार को ही रात की गाड़ी पकड़ लो या अगले दिन सुबह की गाड़ी।' 
- 'ऐसा ही प्रोग्राम बनाने के लिए मैंने आपकी बहू से कहा था मगर उसका मूड ही नहीं है। चाचा जी ! आपकी बहू बड़े घर की बेटी है, सारी सुख-सुविधाएँ भोगती आ रही है, उसके पचास नखरें हैं, मैं जोर-ज़बरदस्ती भी नहीं कर सकता...ये लीजिए सीमा आ गयी है, आप ज़रा उसे समझाइए, शायद आपकी बात मान जाए।'

-'चाचा जी प्रणाम ! मैं सीमा।'
-'खुश रहो। सदा सुहागिन रहो ! तुम लोग कब आ रहे हो ?'
 -"चाचा जी, इस बार आना नहीं होगा। अविनाश ने आपसे नहीं कहा था क्या ? मैंने तो पहले ही उसे बता दिया था कि आपको सूचित कर दें। मात्र पंद्रह दिन की छुट्टी बड़ी मुश्किल से मिल पायी है, छह दिन बीत गए हैं। सात साल बाद आयी हूँ । मायके में रहना जरूरी है, यहाँ रिश्तेदारों से भी मिलना हैं, कई जरूरी काम भी है, बच्चे के साथ इतना भागम-भाग मुझसे नहीं हो पाएगा।' 
-'हवाट ! अमेरिका से इंडिया आ सकती हो और कोलकाता से पटना के लिए भागम-भाग ?'
- 'चाचाजी, अमन रो रहा है, मैं इन्हें देती हूँ...'

- 'हाँ अविनाश ! बहू को सुना। तुम्हारा क्या कहना है ?? 
"मेरा मन तो जाने का था मगर...'
- मगर क्या? पंद्रह दिनों में एक दिन भी चाचा-चाची के लिए नहीं निकाल सकते हो?"
-'चाचा जी ! सीमा यह भी कह रही थी कि आपका छोटा सा दो बेडरूम का फ्लैट है, ए0सी0 भी नहीं है, मई की गर्मी एक ही कूलर अमन को तकलीफ़ होगी. ...मात्र एक साल का, बच्चा अभी तक गर्मी नहीं झेली, कहीं फोड़ा-फुंसी निकल आये या लू लग जाए। जरा सोचिए आप ही का पोता है, कहीं सचमुच कुछ हो जाए तो सीमा मेरी जान खा लेगी।'
-'ओ०के०फाइन। मैं तुम लोगों के लिए होटल 'लवकुश' में दो दिन के लिए लक्जरी रूम बुक करा देता हूँ, एक ए0सी0 कार भी तुम्हारे डिस्पोजल में रहेगी, अपने पोते के लिए, इतना करने का दमखम अभी भी इस बूढ़े में है।'
-'चाचा जी, प्रोग्राम तो आपके घर के सामने खुले पार्क में है ना? मई की गर्मी, रात तक गर्म हवा चलती है।'
- 'पचास बहाने बनाते शर्म नहीं आती तुमको ?... जाने कब से पोते की आस में बैठा हुआ हूँ, कुलदीपक को कलेजे से लगाने के लिए मैं व्याकुल हूँ... तुम्हारी चाची की निष्प्राण सी देह में जान आ जाने की एक आख़िरी उम्मीद भी है मेरा कुलदीपक। सम्भव है कि उसे गोद में लेते ही उसकी बंद जुबान में जुम्बिश आ जाए...मुझे कुछ नहीं सुनना है, बहुत बोल चुके हो, यू विल हैव टू कॅम, यह तुम्हारे गुरू का आदेश है। चाचा की बात नहीं माननी है तो न मानो, गुरु आज्ञा पालन करना तुम्हारा धर्म है। हिंदू धर्म में गुरु का क्या स्थान है यह तुम्हें उपनयन संस्कार के समय ही बता दिया गया था, भूल कैसे गये? तुम धर्म पथ पर रहो, गुरू का शतकोटि आशीर्वाद लो। ईश्वर तुम्हारा मंगल करेगा। कुलदीपक को रिसीव करने के लिए मैं स्टेशन में मौजूद रहूंगा।' अतुल कुमार ने फोन काट दिया।
गुरू होने के नाते चाचा अतुल कुमार भतीजे अविनाश पर कुछ ज़्यादा ही अधिकार जताते हैं और अधिकारपूर्वक बातें करते हैं।

                    पटना आने से पहले अविनाश के पिता और चाचा दोनों के परिवार एक ही मकान में एक साथ वर्षों रहे हैं। अविनाश का जन्म-कर्म सब कुछ चाचा की आँखों के सामने हुआ। विज्ञान के अध्यापक अतुल कुमार ने अविनाश को बचपन से इंटरमीडिएट तक नियमित गणित और विज्ञान विषयों को पढ़ाया, उसे इंजीनियर बनने के योग्य बनाया। उपनयन संस्कार में मंत्र देने के कारण अविनाश उन्हें 'गुरुजी' का सम्बोधन देता है। 
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गुरू होने के नाते चाचा ने अविनाश को अपनी संतान से कमतर कभी नहीं देखा।

            अतुल कुमार चार भाई हैं। चारों भाइयों के बीच अविनाश के पिता के ही दो बेटे हैं बाकी सभी की बेटियाँ है। बेटियाँ अपने-अपने ससुराल में हैं। अविनाश का भाई जो अविनाश से दस वर्ष का बड़ा है पिछले बीस वर्षों से अमेरिका में रह रहा है। उसकी एक ही बेटी है।

जब से अविनाश के घर बेटा जन्मा वह बच्चा अविनाश के ताऊ, चाचा, पिता सभी के आँखों का तारा बन गया। किंतु कुलदीपक अमन के आने की सबसे अधिक खुशी शायद चाचा की हुई है और अविनाश इस बात से अनभिज्ञ नहीं है।

पोते की जन्म की ख़बर पाकर महीने भर बाद अतुल कुमार ने 'अखण्ड रामायण पाठ करवाया, अपार्टमेंट में एक-एक घर जाकर मिठाइयाँ बाँटी मिठाइयाँ देते हुए उन सबों से कहा- "भगवान ने मेरी प्रार्थना सुन ली है, मेरा बेटा तो लौट नहीं सकता मगर भगवान ने मुझे मेरा पोता लौटा दिया है। आप लोग मेरे कुलदीपक को आशीर्वचन दीजिए, उसकी दीर्घायु की कामना करिए।'

महीनों से वे कहते रहे 'पोता आने वाला है। दादा-दादी से मिलने के लिए वह अमेरिका से आ रहा है। उसके आने पर हम खुशियाँ बांटेंगे, भव्य पार्टी देंगे बातें करते-करते खुशी के मारे उनकी आँखें भर आती, कंठ रूंध जाता।

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               अतुल जी का अपना एक बेटा था। बेटे की शादी के दो वर्ष बाद बहू ने पुत्र जन्म देकर खुशियाँ भी झोली में डाली थीं। पुत्र जन्म के एक महीने बाद मायके से लौट कर पोते को दादी की गोद में डालते हुए उसने बड़े दम्भ से कहा था- 'भगवान के लिए अब आप मेरे माता-पिता को कोसना छोड़ दीजिए। मेरे पिता जी मुँह माँगा दहेज तो न दे सके थे पर मैंने मांगी गयी दहेज को सूद समेत लौटा दिया है। मैं पराये घर की बेटी हूँ। यह लड़का तो आपके खानदान का है, सिर्फ़ इस कुल का । आपका वंशज ।

            मगर वंशज प्राप्ति का सुख अतुल कुमार के नसीब में न था । जब वह बच्चा तीन माह का था अतुल कुमार का बेटा अपनी साली की शादी में सपरिवार मीदनापुर गया हुआ था, वापसी में माओवादी हमले में उसकी बस चिथड़ी हो गयी थी, कोई भी न बचा था।
वह हादसा एक ऐसा बज्रपात था कि उसने अतुल कुमार की पत्नी के अस्तित्व को ही हिला कर रख दिया था। काफ़ी दिनों तक वह रोती-बिलखती बहू की बातों को दुहराती वह चीख उठतीं यह तुमने कैसा बदला लिया ? तुम कहती तो तुम्हारे पैरों पर मत्था टेककर माफ़ी मांग लेती। धीरे-धीरे उसकी दुर्बल देह निस्तेज, निष्क्रिय होती चली गई। एक दिन उन्हें तेज बुखार चढ़ा, दिमागी बुखार था। इलाज से बुखार तो उतर गया था किंतु उसकी जुबान हमेशा के लिए बंद हो गयी थी। एलोपैथी, होमियोपैथी, नैचुरोपैथी, वेद-हकीम, तंत्र-मंत्र, मंदिर-गिरजा सभी दुकानें सजी की सजी रह गयीं।

बेजान दीवारों को देखते और पत्नी का निरीह सा चेहरा और शब्दों भरी आँखों को निहारते हुए अतुल कुमार के जीवन के बीस वर्ष बीत गए थे।
पत्नी की दुर्दशा के लिए अतुल कुमार ख़ुद को कोसते हुए कहते हैं-प्रायः मैं उसे बेवज़ह डाँट कर कहता था क्या चपर-चपर करती रहती हो, जब देखो फ़ालतू  बकवक, इतनी बातूनी कि कान पक जाते है। अनावश्यक चिल्लाती रहती हो, धीरे से भी तो बोला जा सकता है। और वह नाराज़ होकर कहा करती आपको मालूम तो है मैं ऊँचा सुनती हूँ, आप चुप रहते हैं तो मुझे लगता आपने सुना ही नहीं, इसलिए जोर से बोलना पड़ता है...मेरे दोनों कान तरस गए हैं उसकी बोली सुनने के लिए एक चलती-फिरती लाश बन गयी है वह... पहले पता रहता तो उसकी आवाज़ टेप करके रख लेता, कितना अच्छा कंठ था उसका, कितना सुंदर गाना गाती थी, मैं अभागा उसके गाने की कदर न कर सका। मुझे प्रायश्चित करना ही था, सो कर रहा हूँ...फिर भी मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी है।'

अतुल कुमार की दर्द भरी दास्तान सुनने की आदी बन चुका था मैं। मार्निंग वाक् में हम दोनों साथ-साथ होते। उनके पास कहने के लिए एक ही कहानी थी। और मुझे मालूम था कि मुझे एक ही कहानी सुननी है फिर भी मैं सुनता क्योंकि मुझे यकीन था कि उसी से उनका जीवन गतिशील बना रहेगा।

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दो दिन बाद अतुल कुमार ने अविनाश को फोन मिलाया- -' हैलो ! अविनाश स्पीकिंग'...
-'चाचा बोल रहा हूं । परसो इतवार है। कब आ रहे हो ? किस गाड़ी से? '
- ' वेरी सॉरी, चाचा जी आपसे तो कह दिया था कि सम्भव नहीं है।' 
-"अरे! मैंने जो इतना सारा इंतज़ाम कर रखा है...'
-'बटन दबाइए मना कर दीजिए, और क्या करना? लोकल मामला ही तो है... बल्कि आप ऐसा करिए कि पटना लोकल न्यूज पेपर या 'विविध भारती' में विज्ञापन दे दीजिए कि विशेष कारणवश प्रोग्राम कैंसिल करना पड़ रहा है । आजकल कोई बुरा-उरा नहीं मानता बल्कि दावत-सावत एवैड करते हैं। टाइम ही किसके पास है, अधिकतर लोग लिफ़ाफ़ा में 'व्यवहार' भेजकर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा देते हैं।'
-'चलो वह मेरी समस्या है। मैं देखूंगा क्या करना, क्या नहीं करना... मगर यह बताओ शिष्य, क्या पोता देखने का मेरा सपना अधूरा रह जायेगा ?" 
-‘अगली मर्तबा आऊँगा तो जरूर मिलूँगा या फिर पहले से ख़बर कर दूँगा आपलोग यहीं आ जाइएगा।'
-'अगली मर्तबा ? शादी करके तुम चले गये फिर अब आये हो सात वर्ष बाद और तुम्हारा बड़ा भाई, शादी करके गया तो गया, अठ्ठारह वर्ष बीत गए।' 
-"नहीं चाचाजी, यहाँ माता-पिता है, आना तो होगा ही।
"कल क्या होगा किसने जाना ! अस्सी के क़रीब पहुँच रहा हूँ, पचास ठो रोग है, आँखों की रोशनी लगभग जा चुकी है और तुम्हारी चाची मुझसे पाँच साल की छोटी, पर लगती है मुझसे दस साल बड़ी... खैर ! कर ही क्या सकता हूँ, सब प्रभु की मर्जी । पोते का दर्शन हो जाता तो मन तृप्त हो जाता।'
-'अरे! अभी तक आपने पोते का दर्शन नहीं किया?'
-"क्या? क्या बोला?"
'फेसबुक' 'हवाटस ऐप पर पोते के सैकड़ों फोटो मैंने लगा रखा है, आप भी अपना एक प्रोफाइल बना लीजिए या फिर आप अपना 'मेल आइडी' बताइए मैं 'ई-मेल' कर दूंगा। आपके पास तो कम्प्यूटर होगा ही, नेट का कनेक्शन भी होगा।'
-'न मेरे पास कम्प्यूटर है और ना ही मुझे उसका ज्ञान है... और फिर जिसे कभी नहीं देखा उसका फोटो देखकर मन भी तो नहीं भरेगा....एक बार आ जाते मैं अपने लाल को देख लेता... तुमने गुरु आज्ञा भी नहीं माना...।'
-'चाचाजी, बुरा न मानिएगा, मेरे पापा मुझ पर इतना दबाव नहीं डालते जितना आप डाल रहे हैं...पापा तो 'फेस बुक' में फोटो देखकर मस्त रहते हैं। 
-"तुम्हारे पापा अमन के पैदा होने से पहले तुम्हारे पास चले गये थे, तीन महीने पहले ही लौटे हैं, पोते को दिन-ब-दिन बड़े होते देखे, उसे गोद में खिलाये, वे तो बिना फोटो देखे ही पोते को मन-मस्तिष्क में महसूस कर सकते हैं, मगर जरा मेरे बारे में सोचो मैंने उसे कभी नहीं देखा, उसका फोटो और किसी बच्चे का फोटो मेरे लिए एक बराबर, है कि नहीं?... आख़िर तुमने गुरू, की बात भी नहीं मानी... आई एम वेरी सॉरी माई सन। शायद मेरी ही गलती थी, मैं कुछ ज़्यादा ही 'गुरु दक्षिणा' पाने की उम्मीद कर रहा था।'
-'गुरू जी, प्लीज नाराज़ न होइए मै अमेरिका पहुँचकर आपको फोन करूंगा, टाइम बता दूंगा, आप किसी 'साइबर कैफे' में चले जाइएगा, मैं अमन को आपसे मिला दूंगा। उसे आप 'वेब कैम' में देखिएगा चलता-फिरता, जीता-जागता, शरारत करता हुआ, तुतलाता हुआ हर हरकत की झलक आप देख पायेंगे, आप उसे जी भर देखिएगा, जी भर बातें करिएगा।'
-"तुमने मेरे सारे अरमानों पर पानी फेर दिया, माठा कर दिया। होपलेस !'
-"पता नहीं क्यों आजकल के बूढ़े चीजों को समझना नहीं चाहते, खामख़ाह सेंटिमेंटल हो जाते हैं, वही घिसी-पिटी बातें, वही दकियानूसी सोच... पता नहीं मैंने क्या माठा कर दिया, बेवज़ह तिल का ताड़ बना रहे हैं। बी प्रैक्टिकल, लिव विद द टाइम चाचाजी ! लाइफ़ इज मूविंग वेरी फ़ास्ट़ मैंने कहा ना आपको अमन को देखने की इतनी इच्छा है तो 'वेब कैम' में देखिए।' 
अतुल कुमार की आँखों से आँसू बहने लगे, दिल की धड़कने तेज हो गयी, गला भर आया।

             शायद अविनाश ने फोन काट दिया था। आगे बोलने और सुनने के लिए कुछ शेष न था । मगर थरथराते होठों से अतुल कुमार अपनी बातें फोन पर मुँह लगाये कहते गये- 'मैं तुझे कैसे समझाऊँ दूधमुँहे पोते को इन बूढ़े हाथों में लेकर सीने से लगाकर कैसी सुखानुभूति होती है, पता नहीं कोई मुझसे ज्यादा पढ़ा-लिखा विद्वान आदमी या कोई कवि उस अनुभूति को शब्दों में कैद कर पाया है या नहीं, मैं तो इतना ही जानता हूँ कि दूध मुँह पोते के गालों में गाल लगाकर उसकी देह-गंध को जेहन में एक बार उतार लेता तो मेरे जर्जर क्षीण शरीर में एक दैविक ऊर्जा संचारित हो जाती... कुलदीपक का वह कोमल पावन स्पर्श मेरी अंतिम सांस तक मेरे अंतरमन में बना रहता...रुको रुको मेरी पत्नी को शायद दूसरा सदमा पहुँचा है, उसकी आँखों की पुतलियों कुछ क्षणों से स्थिर देख रहा हूँ..।' 

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© सुभाष चंद्र गाँगुली 
( "मोक्षदायिनी" कहानी संग्रह से, प्रथम संस्करण: 2021)
* ' साहित्य भारती ' उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की पत्रिका में 2011 में प्रकाशित।
'वैब कैम में देखिये' में  सुख, सुविधा ने सहजता को कितना बेदखल कर दिया है चाचा जो गुरु भी है, दुर्घटना में अपना सब कुछ खो चुके हैं और जीवन की इस रिक्तता को अमरीका में रह रहे भतीजे के बेटे  की साल गिरह अपने घर पर  मनाकर भरना चाहते है, उस पोते को हाथ से छूकर, गोद में बिठाकर जिस खुशी को पाना चाहते हैं उसे घर छोटा, समय नहीं है, पत्नी को मायके भी जाना है आदि अनर्गल कारण बताकर सारे आयोजन को ख़त्म कर देना, चाचा के प्रेम, पढाना लिखाना सब भूल जाना,उनके आग्रह पूर्ण निवेदन तक को अस्वीकार कर जन्मदिन को वैब कैमरा में देखने की बात कहकर मनोभावों पर आधात करता है ।
प्रोफेसर सुनीता त्यागी
( रिटायर्ड )
पीजी कॉलेज, बिजनौर